जीपीआई 2026 का भारत के साथ छलावा, 150 करोड़ की आबादी वाले राष्ट्र की तुलना 3-5 लाख आबादी वाले देशों से!
- डॉ. मयंक चतुर्वेदी
ग्लोबल पीस इंडेक्स (जीपीआई) 2026 ने भारत को 127वें स्थान पर रखा है। दूसरी ओर ऐसे कई देश, जिनकी जनसंख्या भारत के किसी बड़े महानगर से भी कम है, भारत से कहीं अधिक शांतिपूर्ण घोषित किए गए हैं। रिपोर्ट सामने आते ही एक बार फिर यह संदेह तेज हो गया है कि रिपोर्ट तैयार करने वाले विशेषज्ञ एक विशेष नजरिया रखकर देशों का तुलनात्मक अध्ययन करते हैं । क्या दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र और लगभग 150 करोड़ आबादी वाले भारत का मूल्यांकन उसी पैमाने पर किया जा सकता है जिस पैमाने पर तीन लाख आबादी वाले आइसलैंड या पचास लाख आबादी वाले न्यूजीलैंड का किया जाता है?
दरअसल प्रश्न सिर्फ भारत की रैंकिंग का नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या शांति को मापने का वर्तमान वैश्विक मॉडल वास्तव में निष्पक्ष, संतुलित और सभी देशों की परिस्थितियों के अनुरूप है? अब जरा इस ग्लोबल पीस इंडेक्स के बारे में भी जान लेते हैं । वस्तुतः इसका प्रकाशन प्रतिवर्ष “इंस्टीट्यूट फॉर इकोनॉमिक्स एंड पीस” द्वारा किया जाता है। इसमें 163 देशों का मूल्यांकन 23 संकेतकों के आधार पर किया जाने का दावा किया गया है।
https://www.economicsandpeace.org/global-peace-index/
इन संकेतकों को तीन प्रमुख श्रेणियों में बांटा गया है- सामाजिक सुरक्षा और संरक्षा, आंतरिक एवं बाहरी संघर्ष और सैन्यीकरण का स्तर। सिद्धांत रूप से यह मॉडल व्यापक दिखाई देता है, लेकिन कई विशेषज्ञ इसके आरंभ काल से ही कहते रहे हैं कि इसकी संरचना छोटे देशों को स्वाभाविक लाभ पहुंचाती है।
ग्लोबल पीस इंडेक्स 2026 के मुताबिक दुनिया के सबसे सुरक्षित देशों की लिस्ट, टॉप-10 में देश क्रमशः आइसलैंड, न्यूजीलैंड, स्विट्जरलैंड, स्लोवेनिया, आयरलैंड, ऑस्ट्रिया, पुर्तगाल, सिंगापुर, फिनलैंड और जापान हैं। यदि इसे भारत के संदर्भ में देखें तो ग्लोबल पीस इंडेक्स (जीपीआई) में पिछले कई साल से भारत को निशाना बनाया जा रहा है। वह सुरक्षित 100 देश के अंदर नहीं आ रहा, जबकि कई इस्लामिक देश हैं जिनमें लगातार हिंसा, बलात्कार, अत्याचार चल रहा है, इसके बाद भी यह इंडेक्स उन्हें भारत से आगे रखता है।
रिपोर्ट में कई वैश्विक ताकतों की रैंकिंग ने भी लोगों का ध्यान खींचा है। रूस, जोकि लंबे समय से भारत का रणनीतिक सहयोगी रहा है, इस बार सबसे नीचे के देशों में शामिल है। रूस को सीरिया और अफगानिस्तान जैसे संघर्षग्रस्त देशों से भी नीचे रखा गया है। दुनिया के सबसे कम शांतिपूर्ण देशों की सूची में रूस के साथ सूडान, कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य, यूक्रेन और इजराइल भी शामिल हैं। सूची में ईरान को 144वां और अमेरिका को 134वां स्थान मिला है।
भारतीय उपमहाद्वीप में भारत के पड़ोसी देशों में भूटान सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाला देश है। भूटान को इस साल 16वां स्थान मिला है। लेकिन आश्चर्य है, जहां अल्पसंख्यक हिन्दुओं एवं ईसाइयों पर लगातार भयंकर अत्याचार हो रहे हैं, वह बांग्लादेश जीपीआई रिपोर्ट तैयार करने वालों के नजरिए से भारत से अधिक शांतिप्रिय देश है, उसे इस सूची में 117वें स्थान पर रखा गया है। चीन 118वें क्रमांक पर है। नेपाल को 111 नंबर मिला है। श्रीलंका 67वें स्थान पर है। मलेशिया 12वें नंबर पर है। पाकिस्तान को इस साल 152वां स्थान मिला है। इस जीपीआई की सूची का आप गंभीरतापूर्वक अध्ययन करें, ध्यान में आएगा कि कई देश जिनकी हर तरह से स्थिति भारत से भी खराब है, वह इसमें भारत से आगे दर्शाए गए हैं!
भारत बनाम आइसलैंड: क्या यह तुलना उचित है?
भारत की जनसंख्या आज 2026 में लगभग 150 करोड़ के आसपास मानी जा रही है, जबकि आइसलैंड की आबादी लगभग चार लाख है। अर्थात भारत की जनसंख्या आइसलैंड से लगभग 3,700 गुना अधिक है। यहाँ ध्यान देने योग्य है कि प्रख्यात राजनीतिक वैज्ञानिक ‘सैमुअल पी. हंटिंगटन’ ने अपनी पुस्तक “पॉलिटिकल ऑर्डर इन चेंजिंग सोसाइटीज” (1968) में लिखा हुआ कि किसी समाज में व्यवस्था और स्थिरता का मूल्यांकन उसकी संस्थागत क्षमता तथा जनसंख्या के दबाव के संदर्भ में किया जाना चाहिए।
यदि इस सिद्धांत को आधार बनाया जाए तो भारत जैसी विशाल और विविधतापूर्ण जनसंख्या वाले देश में शांति बनाए रखना स्वयं में एक असाधारण उपलब्धि है। यहां सैकड़ों भाषाएं, अनेक मत, पंथ, धर्म, हजारों जातीय समुदाय और विविध सांस्कृतिक समूह एक लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत साथ रहते हैं।
ग्लोबल पीस इंडेक्स (जीपीआई) में कई संकेतक ऐसे हैं जिनमें घटनाओं की कुल संख्या को महत्व दिया जाता है। भारत जैसे विशाल देश में स्वाभाविक रूप से घटनाओं की संख्या अधिक दिखाई देगी। यदि किसी देश में अपराध, हिंसा या संघर्ष की घटनाओं का मूल्यांकन प्रति लाख जनसंख्या के आधार पर किया जाए तो परिणाम काफी भिन्न हो जाएंगे। यही कारण है कि कई सामाजिक वैज्ञानिक मानते हैं कि केवल कुल संख्या के आधार पर देशों की तुलना भ्रामक निष्कर्ष दे सकती है।
दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है भारत
भारत में 2024 के आम चुनावों में 64 करोड़ से अधिक मतदाताओं ने मतदान किया। यह विश्व इतिहास की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक प्रक्रिया थी। राजनीतिक वैज्ञानिक ‘रॉबर्ट ए. डाहल’ ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “पॉलीआर्की”(1971) में लोकतांत्रिक सहभागिता और राजनीतिक स्थिरता को शांति का महत्वपूर्ण संकेतक बताया है। ऐसे में यदि किसी देश में नियमित चुनाव, स्वतंत्र न्यायपालिका, सक्रिय मीडिया और सत्ता परिवर्तन की लोकतांत्रिक व्यवस्था मौजूद है, तब यह भी सामाजिक शांति का एक महत्वपूर्ण आयाम माना जाना चाहिए, जिसमें कि इस पुस्तक की माने तो वह है भी, किंतु यह इंडेक्स यहां इस संदर्भ में पूरी तरह चुप है!
छोटे देशों को मिलने वाला संरचनात्मक लाभ
आइसलैंड, न्यूजीलैंड, स्लोवेनिया और फिनलैंड जैसे देशों की जनसंख्या सीमित है। छोटे देशों में प्रशासनिक निगरानी आसान होती है, सामाजिक असमानताएं अपेक्षाकृत कम होती हैं और कानून-व्यवस्था पर नियंत्रण अधिक प्रभावी रहता है। यहां उल्लेखित है कि हार्वर्ड विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध विद्वान ‘रॉबर्ट डी. पुटनम’ एवं उनके साथ सह-लेखक रॉबर्ट लियोनार्डी और राफेला वाई. नैनेटी की पुस्तक “'मेकिंग डेमोक्रेसी वर्क: सिविक ट्रेडिशन्स इन मॉडर्न इटली”(1993, प्रिंसटन यूनिवर्सिटी प्रेस)।
किताब में इस विषय पर विस्तार से लिखा गया है। पुस्तक में सामाजिक विश्वास और छोटे समुदायों के बीच संबंधों को स्थिर शासन का प्रमुख कारण बताया है। इसमें सामाजिक पूंजी और नागरिक सहभागिता के महत्व पर गहराई से प्रकाश डाला गया है। ऐसे में छोटे देशों और महाद्वीपीय आकार वाले देशों को एक ही तराजू में तौलना स्वाभाविक रूप से विवाद पैदा करता है और पूरी तरह से अनुचित है।
क्या आतंकवाद से लड़ने की कीमत भी भारत की रैंकिंग घटाएगी?
वास्तव में यह प्रश्न इस संदर्भ में और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि भारत दशकों से सीमा पार आतंकवाद का सामना कर रहा है। जम्मू-कश्मीर, पूर्वोत्तर और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा चुनौतियां रही हैं। आज भी कई जगह मौजूद हैं, जहां आतंकवाद है, जबकि ग्लोबल पीस इंडेक्स (जीपीआई) में सैन्यीकरण और सुरक्षा गतिविधियों को भी नकारात्मक संकेतक माना जाता है। परिणामस्वरूप जिन देशों को अपनी सुरक्षा के लिए अधिक सैन्य संसाधन लगाने पड़ते हैं, उनकी रैंकिंग प्रभावित की जाती है।
यहां सवाल उठता है कि क्या आतंकवाद से लड़ने वाले राष्ट्र को उसी दृष्टि से देखा जाना चाहिए, जिस दृष्टि से ऐसे देश को देखा जाता है जिसे कोई बाहरी सुरक्षा चुनौती नहीं है?
भारत के लिए अधिक न्यायपूर्ण मॉडल कैसा हो सकता है?
दिल्ली विश्वविद्यालय में लॉ की प्रोफेसर एवं सामाज वैज्ञानिक डॉ. सीमा सिंह, जीवाजी विश्वविद्यालय, मप्र शासन संबंध समाजशास्त्र की प्रो. विमलेश अग्रवाल, सप्रा. समाज शास्त्र डॉ. वासुदेव सिंह जादौन जैसे कई विशेषज्ञ मानते हैं कि भविष्य में शांति सूचकांक तैयार करते समय निम्नलिखित मानदंड जोड़े जाने चाहिए-
1. जनसंख्या समायोजित शांति सूचकांक : जिसमें कि प्रति लाख आबादी के आधार पर हिंसा, अपराध और संघर्ष का मूल्यांकन किया जाए।
2. लोकतांत्रिक स्थिरता सूचकांक, जिसके अंतर्गत चुनाव, न्यायपालिका, प्रेस स्वतंत्रता और संस्थागत मजबूती को अधिक महत्व दिया जाए।
3. सामाजिक विविधता प्रबंधन : धार्मिक, भाषाई और सांस्कृतिक विविधता के बीच शांति बनाए रखने की क्षमता को मापना भी जरूरी है, इसके लिए होना यह चाहिए कि किसी भी देश में जब वहां क समाज का अध्ययन किया जाए और इस प्रकार से उसे किसी साचें में रखा जाए तब यह जरूरी हो कि वहां सामाजिक विविधता प्रबंधन के माध्यम से आंकलन हो।
4. आतंकवाद प्रतिरोध क्षमता के तहत आतंकवाद से प्रभावित देशों के लिए अलग मूल्यांकन मॉडल होना चाहिए। इस संबंध में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विद्वान ‘जॉन जे. मीयरशाइमर’ अपनी पुस्तक “द ट्रेजेडी ऑफ ग्रेट पावर पॉलिटिक्स” (2001) में लिखते भी हैं कि बड़े राष्ट्रों की सुरक्षा चुनौतियां छोटे राष्ट्रों की तुलना में कहीं अधिक जटिल होती हैं। इसी प्रकार ‘केनेथ वॉल्ट्ज’ ने “थ्योरी ऑफ इंटरनेशनल पॉलिटिक्स” (1979) में कहा है कि किसी राज्य के व्यवहार और उसकी सुरक्षा आवश्यकताओं को उसके भू-राजनीतिक परिवेश से अलग करके नहीं समझा जा सकता।
5. आर्थिक अवसर और सामाजिक गतिशीलता एक अलग आंकलन का बिन्दु रहे, जिसमें कि रोजगार, शिक्षा और सामाजिक समावेशन को भी शांति के घटक के रूप में शामिल करना चाहिए। इन विचारों से स्पष्ट है कि भारत जैसे विशाल, परमाणु शक्ति संपन्न और अनेक सुरक्षा चुनौतियों से घिरे देश का मूल्यांकन विशेष संदर्भ में होना चाहिए।
ऐसे में अर्थशास्त्री प्रोफेसर एस. के. सिंह कहते हैं कि ‘ग्लोबल पीस इंडेक्स’ को हम अपने लिए सिर्फ इतना ही समझें कि यह विश्व की सुरक्षा स्थिति को समझने का एक प्रयास है, किंतु यह अध्ययन भारत जैसे विशाल, बहुसांस्कृतिक और जटिल राष्ट्र की तुलना आइसलैंड, स्लोवेनिया या न्यूजीलैंड जैसे छोटे देशों से करना कई गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
वे कहते हैं, “भारत को 127वें स्थान पर रखना यह सिद्ध नहीं करता कि भारत दुनिया का 127वां सबसे असुरक्षित देश है। यह सिर्फ बताता है कि जीपीआई की वर्तमान कार्यप्रणाली में भारत का स्कोर इतना आया है, इसलिए बहस भारत की रैंकिंग पर नहीं, बल्कि उस पद्धति पर होनी चाहिए जो 150 करोड़ लोगों वाले लोकतांत्रिक राष्ट्र और कुछ लाख लोगों वाले छोटे देशों को एक ही पैमाने पर मापती है।”
प्रो. सिंह कहते हैं, “शायद समय आ गया है कि वैश्विक शांति को मापने के लिए ऐसी नई पद्धति विकसित की जाए जो सिर्फ घटनाओं की संख्या को ही आधार न बनाए, बल्कि देशों की जनसंख्या, विविधता, लोकतांत्रिक क्षमता और सुरक्षा चुनौतियों को भी समान महत्व दे। तभी भारत जैसे देशों के साथ वास्तविक न्याय संभव होगा।
https://www.economicsandpeace.org/wp-content/uploads/2026/06/Global-Peace-Index-2026-Report.pdf
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी
