हैदराबाद से हिंद महासागर तक सुनामी पर नजर,कुछ ही मिनट में तैयार होता है संभावित खतरे का आकलन
-दो दर्जन देशों को भेजे जाते हैं चेतावनी संदेश-समुद्र की हलचल से भूकंपीय गतिविधियों तक चौबीसों घंटे निगरानी-मछुआरों के लिए भी समुद्री जानकारी
हैदराबाद, 07 सितंबर (हि.स.)। समुद्र के भीतर आने वाला शक्तिशाली भूकंप कब सुनामी का रूप ले ले, इसका सटीक अनुमान लगाना चुनौतीपूर्ण है। ऐसे में समय पर चेतावनी तटीय आबादी के लिए महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच बन जाती है। भारत ने इस चुनौती से निपटने के लिए हैदराबाद स्थित भारतीय राष्ट्रीय महासागर सूचना सेवा केंद्र (आईएनसीओआईएस) में अत्याधुनिक सुनामी पूर्व चेतावनी तंत्र विकसित किया है। इसके तहत संचालित भारतीय सुनामी प्रारंभिक चेतावनी केंद्र (आईटीईडब्ल्यूसी) समुद्र और भूकंपीय गतिविधियों पर चौबीसों घंटे नजर रखता है और संभावित खतरे की स्थिति में भारत समेत हिंद महासागर क्षेत्र के करीब 24 देशों को सुनामी संबंधी चेतावनी और परामर्श उपलब्ध कराता है।
आईटीईडब्ल्यूसी समुद्र के भीतर होने वाली भूकंपीय गतिविधियों की लगातार निगरानी करता है। भूकंप आने की स्थिति में उसके केंद्र, गहराई और तीव्रता समेत विभिन्न वैज्ञानिक आंकड़ों का तत्काल विश्लेषण किया जाता है। इसके साथ समुद्र के जलस्तर में होने वाले बदलाव और अन्य वास्तविक समय के आंकड़ों को भी निगरानी तंत्र में शामिल किया जाता है। इन आंकड़ों के आधार पर यह आकलन किया जाता है कि संबंधित भूकंप से सुनामी उत्पन्न होने की संभावना है या नहीं। आधिकारिक जानकारी के अनुसार केंद्र सुनामी पैदा करने वाले भूकंप का करीब 10 मिनट के भीतर पता लगाने की क्षमता रखता है।
पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अधीन आईएनसीओआईएस समुद्र से संबंधित विभिन्न वैज्ञानिक एवं वास्तविक समय की सूचनाएं उपलब्ध कराता है। सुनामी चेतावनी व्यवस्था में भूकंपीय नेटवर्क, समुद्र के जलस्तर को मापने वाले सेंसर और ज्वार मापक केंद्रों से प्राप्त आंकड़ों का इस्तेमाल किया जाता है। इन सूचनाओं के आधार पर संभावित सुनामी के खतरे और उसके प्रभाव का आकलन किया जाता है।
वैज्ञानिक डॉ. एन. श्रीनिवासन राव ने बताया कि भूकंप और उससे समुद्र में होने वाली हलचल पर वैज्ञानिक 24 घंटे नजर रखते हैं। संभावित सुनामी की स्थिति में चेतावनी संदेश संबंधित एजेंसियों और देशों तक विभिन्न संचार माध्यमों से पहुंचाए जाते हैं। इनमें ई-मेल, एसएमएस, फैक्स, ग्लोबल टेलीकम्युनिकेशन सिस्टम (जीटीएस) और वेबसाइट शामिल हैं। इस व्यवस्था का उद्देश्य संभावित खतरे की सूचना जल्द से जल्द संबंधित तटीय प्रशासन और आपदा प्रबंधन एजेंसियों तक पहुंचाना है, ताकि समय रहते सुरक्षात्मक कदम उठाए जा सकें।
डॉ. राव ने बताया कि आईएनसीओआईएस का काम केवल सुनामी चेतावनी तक सीमित नहीं है। संस्थान समुद्र से जुड़ी विभिन्न वैज्ञानिक सेवाएं उपलब्ध कराता है। इनमें मछुआरों के लिए समुद्री परिस्थितियों और संभावित मछली पकड़ने वाले क्षेत्रों से संबंधित उपयोगी सूचनाएं भी शामिल हैं। आईएनसीओआईएस के अनुसार, मछुआरों को समुद्र में अधिक मछली वाले संभावित क्षेत्रों की जानकारी देने वाली दैनिक सलाह उपलब्ध कराई जाती है, जिससे उन्हें मछली खोजने में लगने वाले समय और ईंधन को बचाने में मदद मिलती है।
वैज्ञानिक अजय कुमार ने बताया कि भारत की सुनामी पूर्व चेतावनी व्यवस्था हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री आपदा के जोखिम को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। उन्होंने बताया कि भूकंप की जानकारी मिलने के बाद उसके संभावित प्रभाव का तेजी से आकलन किया जाता है और खतरे के स्तर के अनुसार संबंधित क्षेत्रों एवं एजेंसियों को अलर्ट भेजा जाता है। सुनामी जैसी आपदा में कुछ मिनट भी बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। ऐसे में भूकंप का पता लगाने से लेकर समुद्र के जलस्तर में बदलाव की निगरानी और फिर संबंधित क्षेत्रों तक चेतावनी पहुंचाने की पूरी प्रक्रिया अहम होती है।
वर्ष 2004 में हिंद महासागर में आई विनाशकारी सुनामी ने पूरे क्षेत्र में प्रभावी पूर्व चेतावनी व्यवस्था की आवश्यकता को रेखांकित किया। इसके बाद भारत ने सुनामी पूर्व चेतावनी प्रणाली विकसित करने की दिशा में तेजी से काम किया। आईटीईडब्ल्यूसी को 15 अक्टूबर 2007 से परिचालन में लाया गया। आज यह केंद्र भारत के साथ हिंद महासागर क्षेत्र के अन्य देशों को भी सुनामी संबंधी वैज्ञानिक सूचना और परामर्श उपलब्ध कराने वाले महत्वपूर्ण क्षेत्रीय केंद्र के रूप में काम कर रहा है। सुनामी का प्रभाव भूकंप के स्रोत और प्रभावित क्षेत्र की दूरी पर निर्भर करता है। ऐसे में शुरुआती कुछ मिनटों में भूकंप की पहचान, वैज्ञानिक आंकड़ों का विश्लेषण, संभावित खतरे का आकलन और चेतावनी का प्रसार तटीय आबादी की सुरक्षा में निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
आईएनसीओआईएस की क्षेत्रीय सुनामी सेवा के तहत भारत के अलावा हिंद महासागर क्षेत्र के देशों को सुनामी संबंधी वैज्ञानिक सूचना और परामर्श उपलब्ध कराया जाता है। इनमें ऑस्ट्रेलिया, बांग्लादेश, कोमोरोस, इंडोनेशिया, ईरान, केन्या, मेडागास्कर, मलेशिया, मालदीव, मॉरीशस, मोजाम्बिक, म्यांमार, ओमान, पाकिस्तान, सेशेल्स, सिंगापुर, दक्षिण अफ्रीका, श्रीलंका, तंजानिया, थाईलैंड, तिमोर-लेस्ते, संयुक्त अरब अमीरात और यमन समेत हिंद महासागर क्षेत्र के देश शामिल हैं।-----------
हिन्दुस्थान समाचार / राजेश कुमार पांडेय
