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अंतरराष्ट्रीय योग दिवस : 12 वर्षों की कुछ ऐसी रही भारत में योग यात्रा

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अंतरराष्ट्रीय योग दिवस : 12 वर्षों की कुछ ऐसी रही भारत में योग यात्रा


डॉ. मयंक चतुर्वेदी

आज यानी 21 जून को मनाया जाने वाला अंतरराष्ट्रीय योग दिवस अब वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य, संतुलन और सकारात्मक जीवनशैली का जन-आंदोलन बन चुका है। वर्ष 2015 में इसकी शुरुआत हुई थी और अब 12 वर्षों की यात्रा तय करते हुए यह दुनिया के सबसे बड़े सहभागी आरोग्य अभियानों में शुमार हो चुका है। वर्ष 2026 की थीम ‘स्वस्थ आयु के लिए योग’ इस बात का संकेत है कि अब योग को व्यायाम मानने से अधिक जीवन भर स्वस्थ और सक्रिय बने रहने के माध्यम के रूप में देखा जा रहा है।

भारत की धरोहर से विश्व का आरोग्य मंत्र

योग भारत की हजारों वर्षों पुरानी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत है। इसकी जड़ें सिंधु-सरस्वती सभ्यता तक पहुंचती हैं। संस्कृत के ‘युज’ धातु से बने योग शब्द का अर्थ है, जोड़ना या एकत्व स्थापित करना। यही कारण है कि योग शरीर, मन और आत्मा के बीच संतुलन स्थापित करने का माध्यम माना जाता है।

योग का उल्लेख वेदों, उपनिषदों, महाभारत, रामायण तथा बौद्ध और जैन परंपराओं में मिलता है। महर्षि पतंजलि ने योग सूत्रों के माध्यम से इसकी व्यवस्थित व्याख्या की और इसे एक वैज्ञानिक एवं दार्शनिक स्वरूप प्रदान किया। सदियों तक ऋषि-मुनियों और योगाचार्यों ने इस ज्ञान परंपरा को सुरक्षित रखा और दुनिया तक पहुंचाया।

संयुक्त राष्ट्र की मान्यता और ऐतिहासिक शुरुआत

योग के वैश्विक महत्व को स्वीकार करते हुए संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 11 दिसंबर 2014 को 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र के 69वें अधिवेशन में इसका प्रस्ताव रखा था, जिसे 175 देशों का अभूतपूर्व समर्थन मिला। यह संयुक्त राष्ट्र के इतिहास में सबसे अधिक समर्थन प्राप्त प्रस्तावों में से एक था।

21 जून 2015 को पहला अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाया गया। नई दिल्ली के राजपथ पर आयोजित मुख्य कार्यक्रम में 35,985 लोगों ने एक साथ योगाभ्यास कर दो गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाए। इसके बाद योग ने विश्व मंच पर नई पहचान हासिल की। वर्ष 2016 में यूनेस्को ने योग को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में शामिल कर इसकी वैश्विक प्रतिष्ठा को और मजबूत किया।

राजपथ से देश के कोने-कोने तक

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का मुख्य आयोजन हर वर्ष देश के अलग-अलग शहरों में आयोजित किया जाता रहा है। नई दिल्ली के बाद चंडीगढ़, लखनऊ, देहरादून, रांची, मैसूरु, जबलपुर, श्रीनगर और विशाखापत्तनम जैसे शहर इस आयोजन के साक्षी बने। वर्ष 2026 में कोलकाता मुख्य राष्ट्रीय कार्यक्रम की मेजबानी कर रहा है।

इन आयोजनों ने योग को महानगरों से निकालकर गांवों, कस्बों और दूरदराज के क्षेत्रों तक पहुंचाया। स्कूलों, विश्वविद्यालयों, सशस्त्र बलों, स्वास्थ्य संस्थानों, कॉर्पोरेट कार्यालयों और सामाजिक संगठनों की बढ़ती भागीदारी ने इसे एक व्यापक सामाजिक आंदोलन का स्वरूप दे दिया।

कॉमन योग प्रोटोकॉल : वैश्विक एकता का सूत्र

योग दिवस की सबसे बड़ी विशेषता ‘कॉमन योग प्रोटोकॉल’ (सीवाईपी) है। वर्ष 2015 में आयुष मंत्रालय ने प्रमुख योग संस्थानों और विशेषज्ञों के सहयोग से 45 मिनट का यह मानकीकृत योग क्रम तैयार किया। इसमें शिथिलीकरण अभ्यास, विभिन्न योगासन, कपालभाति, प्राणायाम, ध्यान और विश्राम तकनीकों को शामिल किया गया है।

दरअसल, यह ऐसा प्रारूप है जिसे किसी भी आयु वर्ग का व्यक्ति आसानी से कर सकता है। संयुक्त राष्ट्र की छह आधिकारिक भाषाओं में उपलब्ध यह प्रोटोकॉल दुनिया भर के लोगों को एक समान योग अनुभव प्रदान करता है। यही कारण है कि न्यूयॉर्क से लेकर टोक्यो और रियाद से लेकर जोहान्सबर्ग तक लाखों लोग एक ही समय पर एक समान योगाभ्यास कर पाते हैं।

महामारी में भी नहीं टूटा योग का सिलसिला

कोविड-19 महामारी के दौरान जब दुनिया सामाजिक दूरी और लॉकडाउन की चुनौती से जूझ रही थी, तब योग ने लोगों को मानसिक और शारीरिक मजबूती प्रदान की। सार्वजनिक कार्यक्रमों पर प्रतिबंध के बावजूद अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का आयोजन डिजिटल माध्यमों से जारी रहा।

“घर पर योग, परिवार के साथ योग” और “आरोग्य के लिए योग” जैसी थीमों ने यह संदेश दिया कि कठिन परिस्थितियों में भी योग व्यक्ति को तनाव, चिंता और अकेलेपन से उबरने में मदद कर सकता है। इस दौर ने योग की प्रासंगिकता को पहले से कहीं अधिक बढ़ा दिया।

एक दशक में जन-आंदोलन का रूप

पिछले 12 वर्षों में योग दिवस का स्वरूप लगातार व्यापक हुआ है। वर्ष 2025 इसका एक महत्वपूर्ण पड़ाव था, जब अंतरराष्ट्रीय योग दिवस ने अपनी दस वर्ष की यात्रा पूरी की। “एक पृथ्वी, एक स्वास्थ्य के लिए योग” थीम के साथ आयोजित इस संस्करण में देशभर में 13 लाख से अधिक कार्यक्रम हुए और 26 करोड़ से अधिक लोगों ने भागीदारी की।

विशाखापत्तनम में आयोजित मुख्य कार्यक्रम में तीन लाख से अधिक लोगों की उपस्थिति ने यह साबित कर दिया कि योग अब एक स्वास्थ्य गतिविधि तक सीमित नहीं रह गया है, यह भारत समेत संपूर्ण विश्व के लिए उसकी सामाजिक चेतना का हिस्सा बन चुका है। इस दौरान सबसे बड़ी योग कक्षा और सबसे बड़े सामूहिक सूर्य नमस्कार प्रदर्शन के नए रिकॉर्ड भी बने।

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस 2026 : स्वस्थ आयु के लिए योग

वर्ष 2026 का विषय ‘स्वस्थ आयु के लिए योग’ है। आज दुनिया की बड़ी आबादी उम्रदराज हो रही है और जीवनशैली संबंधी रोग तेजी से बढ़ रहे हैं। ऐसे में केवल जीवन की अवधि बढ़ाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि स्वस्थ और सक्रिय जीवन जीना अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।

योग इस लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रभावी माध्यम माना जा रहा है। ताड़ासन, त्रिकोणासन और भुजंगासन जैसे आसन शरीर की लचक, संतुलन और रीढ़ की मजबूती बढ़ाते हैं। वहीं अनुलोम-विलोम, भ्रामरी और ध्यान जैसी प्रक्रियाएं मानसिक शांति, एकाग्रता और भावनात्मक संतुलन को मजबूत करती हैं। यही कारण है कि योग को स्वस्थ आयु की आधारशिला माना जा रहा है।

योग 365 : एक दिन नहीं, पूरे वर्ष का संकल्प

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस 2026 की सबसे महत्वपूर्ण पहल ‘योग 365’ है। इसका उद्देश्य योग को वर्ष के 365 दिनों का अभ्यास बनाना है। सरकार और विभिन्न संस्थाएं लोगों को घर, विद्यालय, कार्यस्थल और समुदाय स्तर पर नियमित योग अपनाने के लिए प्रेरित कर रही हैं। ‘वाई-ब्रेक’ जैसे छोटे कार्यस्थलीय योग मॉड्यूल कर्मचारियों को तनावमुक्त बनाने में मदद कर रहे हैं। वहीं ‘योग फॉर एयर ट्रैवल’ जैसी नई पहलें आधुनिक जीवनशैली की आवश्यकताओं के अनुरूप योग को ढालने का प्रयास हैं।

स्वास्थ्य चुनौतियों के समाधान में योग

वर्ष 2026 में गैर-संचारी रोगों के लिए विशेष योग प्रोटोकॉल भी विकसित किए गए हैं। मधुमेह, उच्च रक्तचाप, अस्थमा और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के लिए तैयार ये मॉड्यूल योग को निवारक स्वास्थ्य सेवा के रूप में स्थापित कर रहे हैं। इसके अलावा बच्चों, किशोरों, महिलाओं, गर्भवती महिलाओं, वरिष्ठ नागरिकों और नशा मुक्ति की प्रक्रिया से गुजर रहे लोगों के लिए भी अलग-अलग योग कार्यक्रम तैयार किए गए हैं। इससे योग की उपयोगिता और समावेशिता दोनों बढ़ी हैं।

दुनिया को जोड़ता योग

आज अंतरराष्ट्रीय योग दिवस 190 से अधिक देशों में मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय, ऐतिहासिक स्मारकों, विश्वविद्यालय परिसरों, खेल मैदानों और सार्वजनिक स्थलों पर योग कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। भारतीय दूतावास और सांस्कृतिक केंद्र दुनिया भर में हजारों कार्यक्रमों का समन्वय करते हैं। योग की यही वैश्विक स्वीकार्यता भारत की सांस्कृतिक शक्ति का प्रमाण है। यह एक ऐसा माध्यम बन चुका है जो भाषा, संस्कृति, धर्म और सीमाओं से ऊपर उठकर मानवता को स्वास्थ्य और शांति के सूत्र में बांधता है।

योग की असली विरासत

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की 12 वर्षों की यात्रा इस बात की साक्षी है कि एक प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा आधुनिक विश्व की आवश्यकताओं का समाधान बन सकती है। राजपथ से शुरू हुआ यह अभियान आज करोड़ों लोगों की दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है। अत: इस वर्ष का संदेश स्पष्ट है- यह योग किसी विशेष दिन का आयोजन नहीं है, यह तो जीवन जीने की कला है। इसकी वास्तविक सफलता इस बात में निहित है कि कितने लोग इसे अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बनाते हैं, इसलिए आज कहना यही है कि जब योग 365 दिनों तक जीवन में उतरेगा, तभी स्वस्थ, संतुलित और सुखी समाज का सपना साकार होगा।

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी