Newzfatafatlogo

(साक्षात्कार) छत्तीसगढ़ में बाल तस्करी पर प्रहार की पुराेधा बनीं राज्य बाल आयोग की अध्यक्ष डा. वर्णिका शर्मा

 | 
(साक्षात्कार) छत्तीसगढ़ में बाल तस्करी पर प्रहार की पुराेधा बनीं राज्य बाल आयोग की अध्यक्ष डा. वर्णिका शर्मा


डॉ. वर्णिका शर्मा की मुहिम से बच्चों के अधिकार हो रहे सुरक्षित

रायपुर, 05 अक्टूबर (हि.स.)। छत्तीसगढ़ में बस्तर के अंदरूनी इलाकों से लेकर राजधानी के व्यापारिक केंद्रों तक, बाल अधिकारों की रक्षा और बाल तस्करी पर सीधे 'ग्राउंड जीरो' पर राज्य बाल आयोग की अध्यक्ष डा. वर्णिका शर्मा के किए जा रहे प्रयोग और कार्य आज देश भर में एक मिसाल बन रहे हैं।

बाल तस्करी पर प्रहार की पुराेधा राज्य बाल आयोग की अध्यक्ष डा. शर्मा बच्चों के अधिकारों की रक्षा, एक संवेदनशील और प्रगतिशील समाज की सबसे बड़ी पहचान हैं। वे इन दिनों छत्तीसगढ़ में इसी सोच को धरातल पर उतारने और व्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव लाने का कार्य करने में जुटी हैं।

सैन्य मनोविज्ञान की अध्येता, कुशल मनोवैज्ञानिक और वार स्ट्रेटजिस्ट के रूप में अपनी पहचान रखने वाली डॉ. वर्णिका शर्मा ने 16 अप्रैल 2025 को छत्तीसगढ़ बाल आयोग की कमान संभाली। उन्हें राज्य में राज्य मंत्री का दर्जा प्राप्त है। पदभार ग्रहण करने के बाद से ही उन्होंने कागजी औपचारिकताओं को दरकिनार कर सीधे 'ग्राउंड जीरो' पर मोर्चा संभाला है। बस्तर के अंदरूनी इलाकों से लेकर राजधानी के व्यापारिक केंद्रों तक, बाल अधिकारों की रक्षा के लिए उनके द्वारा किए जा रहे प्रयोग आज देश भर में एक मिसाल बन रहे हैं।

हाल ही में उनके नवाचारी 'रक्षक' मॉडल को देश के प्रतिष्ठित स्काॅच गाेल्डन अवार्ड से भी नवाजा गया है। डॉ. वर्णिका शर्मा के हाल ही में किए गए साहसिक रेस्क्यू ऑपरेशन्स और भविष्य के रोडमैप पर हिन्दुस्थान समाचार ने उनसे विशेष बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस साक्षात्कार के प्रमुख अंश-

प्रश्न : आपके काम करने की शैली में एक खास तरह की रणनीतिक आक्रामकता और संवेदनशीलता दोनों दिखती है। इसके पीछे की पृष्ठभूमि क्या है?

उत्तर : देखिए, किसी भी समस्या का समाधान आप तब तक नहीं कर सकते, जब तक आप उसके मूल कारण को न समझें। बाल आयोग की जिम्मेदारी संभालने से बहुत पहले, वर्ष 2008 से ही मैं बस्तर संभाग के माओवाद प्रभावित और अत्यंत संवेदनशील क्षेत्रों में सक्रिय रही हूँ। एक मनोवैज्ञानिक के तौर पर मैंने दंतेवाड़ा, सुकमा और बीजापुर के उन अंदरूनी गांवों में काम किया है, जहाँ बुनियादी सुविधाएं भी मुश्किल से पहुंचती थीं।

मैंने वहाँ देखा कि माओवाद के साये में जी रहे जनजातीय समुदायों के बच्चे और युवा किस प्रकार के मानसिक तनाव और भटकाव से गुजरते हैं। हमने वहाँ युवाओं को डिप्रेशन से बचाने और उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने के लिए 'कारण अनुरूप निदान' और 'मार्केट साइकोलॉजी' जैसे प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए थे। जब आप बस्तर के सुदूर जंगलों में जमीन पर बैठकर किसी बैगा या गोंड बच्चे की आंखों में छिपे डर और उसकी उम्मीदों को पढ़ लेते हैं, तो आपकी संवेदनशीलता स्वतः ही बढ़ जाती है। वही जमीनी अनुभव आज आयोग में त्वरित और सटीक निर्णय लेने में मेरी सबसे बड़ी ताकत बना हुआ है।

प्रश्न : छत्तीसगढ़ में बाल तस्करी हमेशा से एक बड़ी और दर्दनाक चुनौती रही है। हाल ही में आपके नेतृत्व में दंतेवाड़ा में एक बड़ा ऑपरेशन हुआ, जिसमें 120 बच्चों को बचाया गया। उस पूरे घटनाक्रम और आयोग की रणनीति के बारे में कुछ बताएं।

उत्तर : बाल तस्करी मानवता के खिलाफ क्रूरता है। हमें खुफिया सूचनाएं मिल रही थीं कि बस्तर के सुकमा, बीजापुर, कोंटा और ओडिशा के सीमावर्ती इलाकों से बच्चों को बहला-फुसलाकर या उनके परिवारों की लाचारी का फायदा उठाकर दूसरे राज्यों में भेजा जा रहा है।

तस्करों के नेटवर्क को ध्वस्त करने के लिए हमने खुद इन क्षेत्रों का दौरा किया और स्थानीय नेटवर्क को सक्रिय किया। दंतेवाड़ा में जो ऑपरेशन हुआ, वह बेहद चुनौतीपूर्ण था। तस्कर बच्चों को एक बड़े समूह में बाहर भेजने की तैयारी में थे। खुफिया इनपुट मिलते ही हमने पुलिस और स्थानीय प्रशासन के सहयोग से आधी रात को एक संयुक्त और साहसिक रेस्क्यू ऑपरेशन प्लान किया। वह रात बेहद तनावपूर्ण थी, लेकिन हमारी टीम के हौसले बुलंद थे। उस एक रात में हमने लगभग 120 मासूम बच्चों को तस्करों के चंगुल से मुक्त कराया। जब उन बच्चों को सुरक्षित उनके रोते हुए माता-पिता से मिलाया गया, तो उनके चेहरों पर जो मुस्कान और सुकून था, वह मेरे जीवन की सबसे बड़ी पूंजी है। इस कार्रवाई से हमने तस्करों के पूरे इकोसिस्टम को एक कड़ा संदेश दिया है कि छत्तीसगढ़ में अब बच्चों का सौदा बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। आयोग अब अंतर-राज्यीय सीमाओं पर पुलिस के साथ मिलकर एक स्थायी मॉनिटरिंग ग्रिड तैयार कर रहा है।

प्रश्न : शिक्षा के अधिकार (आरटीई) को लेकर अक्सर निजी स्कूलों की मनमानी की शिकायतें आती हैं। 'तोसुराम और कृष्णा' का मामला हाल ही में काफी चर्चा में रहा, जिसमें आयोग ने बेहद कड़ा रुख अपनाया। वह मामला क्या था?

उत्तर : शिक्षा देश के हर बच्चे का मौलिक और संवैधानिक अधिकार है। तोसुराम और कृष्णा का मामला हमारे पास आया, तो मुझे बेहद दुख और आश्चर्य हुआ। शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत पात्रता होने के बावजूद इन बच्चों का दाखिला एक प्रतिष्ठित निजी स्कूल द्वारा पिछले 10 महीनों से लटका कर रखा गया था। तकनीकी खामियों और पोर्टल बंद होने का बहाना बनाया जा रहा था।

मैंने इस मामले में सीधे हस्तक्षेप किया। शिक्षा विभाग के उच्च अधिकारियों को तलब किया गया। आयोग के सख्त निर्देश पर विशेष रूप से बंद पोर्टल को दोबारा खुलवाया गया और दोनों बच्चों का दाखिला सुनिश्चित कराया गया। इतना ही नहीं, उस स्कूल ने अभिभावकों से जो अवैध फीस वसूल की थी, उसे भी पाई-पाई वापस कराया गया।

प्रश्न : उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के तहत स्कूलों में किशोरियों के स्वास्थ्य और हाइजीन के लिए 'शुचिता योजना' संचालित है। जमीनी हकीकत को लेकर आपके अनुभव क्या हैं?

उत्तर : 'शुचिता योजना' हमारी बेटियों के सम्मान और उनके स्वास्थ्य से जुड़ी एक बेहद महत्वाकांक्षी योजना है। छत्तीसगढ़ के 400 से अधिक शासकीय स्कूलों में सैनिटरी पैड वेंडिंग मशीनें और इंसिनरेटर स्थापित किए गए हैं ताकि माहवारी के दिनों में स्वच्छता की कमी के कारण किसी भी बेटी को अपनी पढ़ाई न छोड़नी पड़े। जब मैंने प्रदेश के कई स्कूलों और कन्या छात्रावासों का औचक निरीक्षण किया, तो एक कड़वी हकीकत सामने आई। कई बड़े और नामी स्कूलों में मशीनें तो लगी थीं, लेकिन वे या तो खराब थीं, उनमें पैड का स्टॉक नहीं था, या फिर उनका संचालन सही ढंग से नहीं हो रहा था। यह घोर लापरवाही है। आयोग ने इस पर कड़ा संज्ञान लिया है। अब हर स्कूल से मासिक रिपोर्ट मंगाई जा रही है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि हर वेंडिंग मशीन चालू हालत में रहे।

प्रश्न : अक्सर देखा जाता है कि बच्चे रेस्क्यू होने के बाद आर्थिक मजबूरी में दोबारा उसी काम में लौट जाते हैं। बालश्रम के रोकथाम के लिए बाल आयोग क्या कदम उठा रहा है?

उत्तर : आपने बिल्कुल सही और संवेदनशील नब्ज पकड़ी है। हमने बाल श्रम उन्मूलन के लिए एक नया 'मास्टर प्लान' तैयार किया है। इस प्लान के तहत दो स्तरों पर काम हो रहा है। पहला यह कि हर तीन महीने में सात-सात दिनों के लिए पूरे प्रदेश में एक व्यापक, गोपनीय और अचानक छापेमारी का अभियान चलाया जाता है। दूसरा, यह कि रेस्क्यू किए गए बच्चे को हम तुरंत अनिवार्य शिक्षा से जोड़ते हैं। इसके साथ ही, उसके माता-पिता को राज्य सरकार की विभिन्न रोजगार और कल्याणकारी योजनाओं (जैसे मनरेगा, आजीविका मिशन, या राशन कार्ड योजना) का लाभ प्राथमिकता के आधार पर दिलाया जाता है। जब परिवार को घर चलाने के लिए कानूनी जरिया मिल जाता है, तो वे खुद अपने बच्चों को स्कूल भेजने लगते हैं।

प्रश्न : आपके 'रक्षक' कार्यक्रम को राष्ट्रीय स्तर पर स्कॉचगोल्डनअवार्डमिला है। इस कोर्स की रूपरेखा और युवाओं के लिए इसके महत्व के बारे में विस्तार से बताएं।

उत्तर : यह आयोग और पूरे छत्तीसगढ़ के लिए एक गौरवशाली क्षण है कि बाल अधिकारों के क्षेत्र में अभिनव कार्य के लिए राज्य को देश का पहला स्कॉच गोल्डन अवार्ड मिला। जब मैंने पद संभाला, तो पाया कि बाल संरक्षण के क्षेत्र में काम करने के लिए हमारे पास कानूनी और व्यावहारिक रूप से प्रशिक्षित मानव संसाधन की भारी कमी है। पुलिस, एनजीओ और बाल कल्याण समितियों में ऐसे लोगों की जरूरत थी जो बच्चों के प्रति संवेदनशील हों और कानून को भी गहराई से जानते हों।

इसी कमी को दूर करने के लिए हमने 'रक्षक' (पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा इन प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स) नामक एक वर्षीय (दो सेमेस्टर) डिप्लोमा पाठ्यक्रम का डिजाइन तैयार किया। वर्तमान में यह पाठ्यक्रम छत्तीसगढ़ के छह प्रमुख विश्वविद्यालयों (3 शासकीय और 3 निजी) में सफलतापूर्वक संचालित किया जा रहा है। इस कोर्स की सबसे बड़ी खासियत इसका प्रैक्टिकल मॉडल है। छात्र केवल किताबों से पोक्सो एक्ट, जुवेनाइल जस्टिस एक्ट, बाल विवाह और बाल श्रम विरोधी कानूनों को नहीं पढ़ते, बल्कि वे सीधे बाल कल्याण समितियों, किशोर न्याय बोर्डों और चाइल्ड केयर इंस्टीट्यूशंस में जाकर फील्डवर्क और केस स्टडीज करते हैं। इस कोर्स को पूरा करने वाले युवाओं को जिला बाल संरक्षण इकाइयों (डीसीपीयू) और स्वयंसेवी संस्थाओं में रोजगार के बेहतरीन अवसर मिल रहे हैं। यह बाल अधिकारों की रक्षा के लिए विशेषज्ञों की एक समर्पित फौज तैयार करने का हमारा सबसे सफल प्रयोग है।

प्रश्न : डॉ. शर्मा, आप छत्तीसगढ़ के बच्चों को आने वाले वर्षों में किस रूप में देखना चाहती हैं?

उत्तर : शिक्षा, सुरक्षा और सम्मान- ये तीन चीजें छत्तीसगढ़ के हर बच्चे का अधिकार हैं और इन्हें सुनिश्चित करने के लिए मैं और मेरा पूरा आयोग प्रतिबद्ध है। हम नीतियों को हर एक मासूम की मुस्कान में तब्दील करके ही दम लेंगे, यही हमारा प्रयास है।

हिन्दुस्थान समाचार से बातचीत करने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।

---------------

हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी