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आस्था, परंपरा और लोकविश्वास से सजा नौ दिवसीय शारदीय नवरात्र

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आस्था, परंपरा और लोकविश्वास से सजा नौ दिवसीय शारदीय नवरात्र


आस्था, परंपरा और लोकविश्वास से सजा नौ दिवसीय शारदीय नवरात्र


-शारदीय नवरात्र 11 अक्टूबर से शुरू होगा, गज पर आएंगी मां दुर्गा,20 को विजयादशमी

चतरा, 25 सितंबर (हि.स.)। शरद ऋतु की दस्तक के साथ वातावरण में भक्ति का रंग घुलने लगा है। मां दुर्गा के आगमन की प्रतीक्षा में मंदिरों की घंटियां और पूजा पंडालों की तैयारियां एक साथ आकार लेने लगी हैं। शक्ति की अधिष्ठात्री मां दुर्गा की आराधना का महापर्व शारदीय नवरात्र इस वर्ष 11 अक्टूबर से शुरू होगा। नौ दिनों तक चलने वाली देवी आराधना के बाद 20 अक्टूबर को विजयादशमी मनाई जाएगी।

इस बार नवरात्र पूरे नौ दिनों का होगा। पंचांग की गणना के अनुसार, नवरात्र का आरंभ रविवार को हो रहा है। धार्मिक एवं ज्योतिषीय मान्यताओं में रविवार को देवी का आगमन गज यानी हाथी पर माना जाता है। हाथी पर देवी के आगमन को शुभ संकेत के रूप में देखा जाता है। लोकमान्यता है कि इससे अच्छी वर्षा, हरियाली और कृषि के लिए अनुकूल परिस्थितियों का संकेत मिलता है। दूसरी ओर मंगलवार को विजयादशमी होने के कारण देवी के गमन की सवारी मुर्गा मानी गई है, जिसे पारंपरिक मान्यताओं में प्रतिकूल माना जाता है।

चतरा के आचार्य पंडित चेतन पाण्डेय बताते हैं कि देवी की सवारी से जुड़ी ये मान्यताएं सदियों से पंचांग परंपरा और लोकविश्वास का हिस्सा रही हैं। इनके माध्यम से प्रकृति, वर्षा, कृषि, स्वास्थ्य और सामाजिक जीवन को लेकर शुभ-अशुभ संकेतों की व्याख्या की जाती रही है।

11 अक्टूबर को कलश स्थापना से होगा शक्ति आराधना का शुभारंभ

नवरात्र का पहला दिन 11 अक्तूबर होगा। आश्विन शुक्ल प्रतिपदा को कलश स्थापना के साथ मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की पूजा की जाएगी। आचार्य पाण्डेय के अनुसार, श्रीहृषीकेश पंचांग में इस दिन कलश स्थापना के लिए दिनभर समय प्रशस्त बताया गया है।

कलश स्थापना नवरात्र की धार्मिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण आरंभ माना जाता है। कलश में जल भरकर उसके ऊपर नारियल और आम्रपल्लव स्थापित किए जाते हैं। इसके साथ देवी का आह्वान कर नौ दिनों की पूजा का संकल्प लिया जाता है। अनेक घरों में इसी दिन अखंड दीप प्रज्ज्वलित किया जाता है, जो विजयादशमी तक निरंतर जलता रहता है।

देश के अन्य प्रांतो की तरह झारखंड में चतरा जिले के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में नवरात्र को लेकर तैयारियां शुरू हो गई हैं। मंदिरों की साफ-सफाई, रंग-रोगन और सजावट के साथ पूजा समितियां पंडाल निर्माण की तैयारियों में जुट गई हैं। प्रतिमा निर्माण का काम भी कई स्थानों पर अंतिम चरण में पहुंचने लगा है।

नौ दिनों में देवी के नौ स्वरूपों की आराधना

शारदीय नवरात्र का सबसे विशिष्ट पक्ष देवी के नौ स्वरूपों की आराधना है। पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा से शुरू होने वाला यह क्रम नौवें दिन मां सिद्धिदात्री की आराधना तक चलता है। मां शैलपुत्री को पर्वतराज हिमालय की पुत्री माना गया है। नवरात्र के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा होती है, जो तप और संयम की प्रतीक हैं। तीसरे दिन मां चंद्रघंटा, चौथे दिन मां कूष्मांडा और पांचवें दिन मां स्कंदमाता की आराधना की जाती है। छठे दिन मां कात्यायनी, सातवें दिन मां कालरात्रि, आठवें दिन मां महागौरी और नवें दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा का विधान है। धार्मिक मान्यता में इन नौ स्वरूपों को शक्ति के अलग-अलग रूपों का प्रतीक माना गया है।

नवरात्र के दौरान दुर्गा सप्तशती का पाठ, मंत्र जाप, आरती, भजन-कीर्तन और हवन जैसे धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। कई श्रद्धालु नौ दिनों तक उपवास रखते हैं और सात्विक जीवनचर्या का पालन करते हैं।

16 अक्टूबर से बढ़ेगा दुर्गोत्सव का उत्सवी रंग

नवरात्र की पूजा के साथ दुर्गोत्सव की तैयारियां भी क्रमशः तेज होंगी। 16 अक्टूबर को बेलवरण पूजा होगी। इसके बाद 17 अक्टूबर को नवपत्रिका प्रवेश पूजन के साथ मूल नक्षत्र में पूजा पंडालों में देवी की स्थापना की जाएगी। नवपत्रिका पूजा दुर्गोत्सव की महत्वपूर्ण परंपराओं में शामिल है। इसके साथ प्रकृति और कृषि से जुड़े तत्वों का भी धार्मिक संबंध दिखाई देता है। इसी दिन कालरात्रि दर्शन एवं पूजन होगा। 18 अक्टूबर को महाष्टमी मनाई जाएगी। इस दिन मां महागौरी की पूजा के साथ महाष्टमी व्रत रखा जाएगा। दुर्गापूजा के दौरान महाष्टमी को विशेष महत्व प्राप्त है। मंदिरों और पूजा पंडालों में इस दिन श्रद्धालुओं की विशेष भीड़ उमड़ती है। इसके अगले दिन 19 अक्टूबर को अष्टमी-नवमी की संधि बेला में संधिबलि पूजन होगा। आचार्य पाण्डेय के अनुसार, संधिबलि का समय सुबह 6.53 बजे निर्धारित है। अष्टमी के अंतिम क्षण और नवमी के आरंभ के संधिकाल को धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इसके बाद 20 अक्टूबर को विजयादशमी मनाई जाएगी। इसी के साथ नौ दिवसीय नवरात्र और दुर्गोत्सव का धार्मिक क्रम अपने चरम पर पहुंचेगा।

गज पर आगमन की मान्यता क्यों है खास?

देवी के आगमन और गमन की सवारी को लेकर भारतीय धार्मिक परंपरा में अलग-अलग मान्यताएं मिलती हैं। नवरात्र किस वार से शुरू हो रहा है और विजयादशमी किस वार को पड़ रही है, इसके आधार पर देवी की सवारी निर्धारित करने की परंपरा है।

इस वर्ष नवरात्र रविवार से शुरू हो रहा है। इसलिए देवी का आगमन गज पर माना गया है। भारतीय संस्कृति में हाथी शक्ति, स्थिरता, समृद्धि और वर्षा से भी जुड़ा प्रतीक रहा है। ग्रामीण जीवन में वर्षा और कृषि का सीधा संबंध होने के कारण हाथी पर देवी के आगमन को विशेष रूप से शुभ संकेत माना जाता है।

लोकविश्वास में यह धारणा केवल धार्मिक संकेत तक सीमित नहीं है। मानसून, खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के बीच गहरे संबंध के कारण पुराने समय में प्राकृतिक परिस्थितियों को धार्मिक प्रतीकों से जोड़कर देखने की परंपरा विकसित हुई। यही कारण है कि देवी की सवारी से जुड़ी मान्यताएं आज भी ग्रामीण समाज में चर्चा का विषय रहती हैं।

मुर्गे पर देवी का गमन और लोकमान्यता

विजयादशमी मंगलवार को होने के कारण इस वर्ष देवी के गमन की सवारी मुर्गा मानी गई है। पारंपरिक धार्मिक मान्यताओं में मुर्गे पर देवी के गमन को शुभ नहीं माना जाता। इसे रोग-शोक, जनस्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव और सामाजिक अस्थिरता जैसी परिस्थितियों से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि ये मान्यताएं धार्मिक और ज्योतिषीय परंपराओं पर आधारित हैं। इन्हें वैज्ञानिक पूर्वानुमान के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय पंचांग परंपरा और लोकविश्वास के हिस्से के रूप में देखा जाता है।

देवी महात्म्य में शक्ति की विजय का आख्यान

शारदीय नवरात्र का महत्व केवल पूजा-पाठ और व्रत तक सीमित नहीं है। इसके पीछे शक्ति और अधर्म पर धर्म की विजय का व्यापक धार्मिक आख्यान जुड़ा है। मार्कंडेय पुराण के देवी महात्म्य तथा दुर्गा सप्तशती में देवी की महिमा और असुर शक्तियों के विनाश का विस्तृत वर्णन मिलता है। धार्मिक कथा के अनुसार, महिषासुर के अत्याचार से देवता परेशान थे। देवताओं की सामूहिक शक्ति और स्तुति से आदिशक्ति का प्राकट्य हुआ। देवी ने महिषासुर का वध कर देवताओं को भयमुक्त किया।

इसी तरह शुंभ और निशुंभ जैसे असुरों के साथ देवी के युद्ध का भी वर्णन मिलता है। इन आख्यानों में देवी को केवल युद्ध की शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि सृजन, संरक्षण और संहार की समग्र शक्ति के रूप में चित्रित किया गया है।

नवरात्र में देवी के विभिन्न स्वरूपों की पूजा इसी व्यापक शक्ति-परंपरा की अभिव्यक्ति है। एक ओर मां को करुणा, मातृत्व और सृजन का प्रतीक माना जाता है, तो दूसरी ओर वे अन्याय और आसुरी प्रवृत्तियों के विनाश की शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित हैं।

चतरा में धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक उत्सव

चतरा में दुर्गापूजा धार्मिक आयोजन के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक उत्सव का भी रूप लेती है। पूजा पंडालों की सजावट, प्रतिमाओं की स्थापना, रोशनी और विभिन्न धार्मिक कार्यक्रमों के कारण पूरे शहर और आसपास के क्षेत्रों में उत्सवी वातावरण बनता है।

नवरात्र के दौरान परिवारों में पूजा-पाठ के साथ रिश्तेदारों और मित्रों के मिलने-जुलने का सिलसिला भी बढ़ जाता है। बाजारों में भी त्योहार की तैयारियों का असर दिखाई देने लगता है। कपड़ों, पूजा सामग्री, फल-फूल और सजावटी सामान की खरीदारी तेज होती है।

ग्रामीण क्षेत्रों में दुर्गापूजा का स्वरूप और भी सामुदायिक दिखाई देता है। कई जगह पूजा समितियां सामूहिक रूप से आयोजन करती हैं। मंदिरों और पंडालों में सुबह-शाम आरती के साथ भजन-कीर्तन होते हैं। विजयादशमी के अवसर पर देवी विसर्जन और अन्य पारंपरिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

आस्था के नौ दिन और आत्मसंयम का संदेश

नवरात्र को केवल बाहरी उत्सव के रूप में नहीं, बल्कि आत्मसंयम और साधना के अवसर के रूप में भी देखा जाता है। उपवास, मंत्र जाप, ध्यान, पाठ और सात्विक आहार के माध्यम से श्रद्धालु अपनी दिनचर्या को अनुशासित करने का प्रयास करते हैं।

कई परिवारों में नवरात्र के दौरान कन्या पूजन की परंपरा भी निभाई जाती है। अष्टमी या नवमी के दिन कन्याओं को देवी का स्वरूप मानकर उनका पूजन किया जाता है और भोजन कराया जाता है। इस परंपरा में नारी शक्ति के सम्मान का भाव निहित माना जाता है।

नवरात्र की यही विशेषता इसे केवल धार्मिक पर्व नहीं रहने देती। यह भारतीय समाज में शक्ति, प्रकृति, नारीत्व, कृषि, सामुदायिक जीवन और सांस्कृतिक स्मृति को एक सूत्र में जोड़ने वाला पर्व बन जाता है।

बदलते समय के बीच कायम है परंपरा

समय बदला है, पूजा के तौर-तरीके बदले हैं और उत्सवों का स्वरूप भी बदला है, लेकिन मां दुर्गा की आराधना के प्रति आस्था कायम है। आधुनिक रोशनी और आकर्षक पंडालों के बीच आज भी कलश स्थापना, दुर्गा सप्तशती पाठ, आरती, हवन, कन्या पूजन और विसर्जन जैसी परंपराएं उसी श्रद्धा के साथ निभाई जाती हैं।

चतरा में भी इस वर्ष नवरात्र का इंतजार शुरू हो चुका है। मंदिरों और पूजा स्थलों में तैयारियां आकार ले रही हैं। श्रद्धालु कलश स्थापना से लेकर विजयादशमी तक की पूजा की तैयारी में जुट रहे हैं।

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हिन्दुस्थान समाचार / जितेन्द्र तिवारी