मप्र के बुजुर्गों के तीर्थाटन के सपने को पूरे कर रही तीर्थदर्शन योजना
भोपाल, 21 सितम्बर (हि.स.)। जीवन की लंबी पारी खेलने के बाद जब जिम्मेदारियां धीरे-धीरे पीछे छूटने लगती हैं, तो हर व्यक्ति की इच्छा होती है कि एक बार उन तीर्थस्थलों के दर्शन कर लिए जाएं, जिनका नाम वर्षों से पूजा-पाठ में सुना है। किसी को काशी की गलियों में पहुंचने की चाह होती है, किसी की आंखें अयोध्या के राम मंदिर के दर्शन के लिए तरसती हैं तो कोई द्वारका, मथुरा-वृंदावन, उज्जैन या अन्य धार्मिक स्थलों तक पहुंचने का सपना संजोए रहता है। लेकिन उम्र, आर्थिक स्थिति और लंबी यात्रा की कठिनाइयां कई बार इन इच्छाओं को मन में ही रोक देती हैं।
मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री तीर्थदर्शन योजना ऐसे ही बुजुर्गों के लिए उम्मीद की राह खोलती है। योजना के जरिए प्रदेश के पात्र वरिष्ठ नागरिकों को निर्धारित तीर्थस्थलों की यात्रा का अवसर मिलता है। उनके लिए यात्रा को सुविधाजनक बनाने की व्यवस्थाएं की जाती हैं, ताकि उम्र के इस पड़ाव पर आस्था की राह में आर्थिक और व्यवस्थागत अड़चनें कम हो सकें। अब तक प्रदेश के आठ लाख 35 हजार से अधिक बुजुर्ग इस योजना का लाभ ले चुके हैं। राज्य सरकार द्वारा उन्हें 826 विशेष ट्रेनों के माध्यम से विभिन्न तीर्थों की यात्रा कराई गई है।
किसी का वर्षों पुराना सपना, किसी की जीवन की पहली बड़ी तीर्थयात्रा
तीर्थदर्शन योजना की सबसे खास तस्वीर किसी सरकारी कार्यालय की फाइल में नहीं, बल्कि यात्रा पर जाने वाले बुजुर्गों की आंखों में दिखाई देती है। जिस व्यक्ति ने जीवनभर परिवार की जिम्मेदारियां निभाईं, बच्चों की पढ़ाई और शादी की चिंता की, खेती-बाड़ी या नौकरी में अपना समय लगाया, उसके लिए तीर्थयात्रा अपने लिए जीने का एक अवसर भी बन जाती है।
कई बुजुर्ग ऐसे होते हैं, जिन्होंने युवावस्था में तीर्थ जाने की योजना बनाई, लेकिन परिस्थितियां हर बार आड़े आ गईं। कभी पैसों की कमी, कभी परिवार की जिम्मेदारी और कभी बढ़ती उम्र। मुख्यमंत्री तीर्थदर्शन योजना के माध्यम से जब उन्हें यात्रा का अवसर मिलता है तो यह सिर्फ एक सरकारी सुविधा नहीं रहती, बल्कि वर्षों से मन में संजोई इच्छा पूरी होने का क्षण बन जाती है।
गांव के बुजुर्ग भी पहुंच रहे दूर के तीर्थों तक
इस योजना का महत्व ग्रामीण क्षेत्रों में और अधिक दिखाई देता है। गांव में रहने वाले बुजुर्गों के लिए दूर-दराज के धार्मिक स्थलों तक पहुंचना आसान नहीं होता। निजी साधनों से यात्रा का खर्च, रहने-खाने की व्यवस्था और लंबी दूरी कई परिवारों के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है। ऐसे में निर्धारित प्रक्रिया के तहत चयनित यात्रियों को सामूहिक रूप से तीर्थस्थलों तक ले जाने की व्यवस्था उन्हें यात्रा का भरोसा देती है। जिला प्रशासन और संबंधित विभाग यात्रा कार्यक्रम के अनुसार आवश्यक व्यवस्थाओं में सहयोग करते हैं। इससे बुजुर्ग अकेले यात्रा करने की परेशानी से भी बचते हैं।
तीर्थ के साथ बनता है अपनापन का एक नया रिश्ता
इस यात्रा की एक खूबसूरत तस्वीर यह भी है कि अलग-अलग गांवों और शहरों से आए बुजुर्ग एक ही यात्रा में एक-दूसरे के हमसफर बन जाते हैं। किसी की उम्र 60 साल होती है तो कोई 70 या उससे अधिक का। बातचीत शुरू होती है तो गांव, परिवार, खेती, बच्चों और भगवान से होते हुए बात जीवन के अनुभवों तक पहुंच जाती है। यात्रा पूरी होने तक कई यात्रियों के बीच ऐसा अपनापन बन जाता है कि लौटते समय विदाई भी भावुक कर देती है। उनके लिए यह सफर सिर्फ मंदिर तक पहुंचने का नहीं, बल्कि कुछ दिनों के लिए अपनी रोजमर्रा की दुनिया से बाहर निकलकर नए लोगों और नए अनुभवों से जुड़ने का अवसर भी होता है।
आस्था के सामने उम्र भी छोटी पड़ जाती है
उम्र शरीर की गति को भले धीमा कर दे, लेकिन आस्था की इच्छा को हमेशा नहीं रोक पाती। मुख्यमंत्री तीर्थदर्शन योजना की कहानी इसी भावना के आसपास घूमती है। यह उन बुजुर्गों के लिए अवसर उपलब्ध कराने की कोशिश है, जिन्होंने जीवन का बड़ा हिस्सा अपने परिवार और समाज की जिम्मेदारियों में बिताया है। तीर्थयात्रा से लौटते समय किसी बुजुर्ग के हाथ में प्रसाद की छोटी-सी पोटली होती है, चेहरे पर यात्रा की थकान होती है और आंखों में दर्शन की चमक। घर पहुंचकर जब वह परिवार को मंदिर, घाट, दर्शन और यात्रा के किस्से सुनाता है तो लगता है कि उसने केवल एक शहर या तीर्थस्थल की यात्रा नहीं की, बल्कि अपने जीवन की किताब में एक नया पन्ना जोड़ लिया है।
मुख्यमंत्री तीर्थदर्शन योजना के तहत हाल ही में नीमच जिले के 156 वरिष्ठ नागरिकों ने हरिद्वार और ऋषिकेश की यात्रा की। 16 सितंबर को शुरू हुआ यह सफर 19 सितंबर को यात्रियों की वापसी के साथ पूरा हुआ। चार दिन का यह सफर केवल एक शहर से दूसरे शहर तक पहुंचने की यात्रा नहीं था। यात्रियों के लिए यह उन धार्मिक स्थलों को करीब से देखने का अवसर था, जिनका उल्लेख उन्होंने वर्षों से धार्मिक कथाओं, पूजा-पाठ और परिवार के बुजुर्गों की बातों में सुना था। विशेष ट्रेन से रवाना हुए यात्रियों के लिए स्टेशन से ही तीर्थ का उत्साह शुरू हो गया था।
जब यात्री हरिद्वार पहुंचे तो यात्रा का सबसे भावुक पड़ाव सामने था। गंगा के घाट, मंदिरों की घंटियां और धार्मिक वातावरण उन बुजुर्गों के लिए खास अनुभव लेकर आया। जिन लोगों ने जीवनभर गंगा को धार्मिक प्रसंगों में सुना था, वे अब उसके सामने खड़े थे। हरिद्वार की यात्रा के दौरान तीर्थस्थल के दर्शन और धार्मिक वातावरण में समय बिताने का अवसर मिला। इसके बाद ऋषिकेश की यात्रा ने इस अनुभव को आगे बढ़ाया। गंगा का किनारा, घाट और आसपास का आध्यात्मिक वातावरण यात्रियों की स्मृतियों का हिस्सा बन गया। 19 सितंबर को जब यात्री वापस लौटे तो उनके साथ लौट रही थी यादों की एक लंबी गठरी। किसी के लिए हरिद्वार की गंगा सबसे बड़ी स्मृति थी तो किसी के लिए ऋषिकेश का धार्मिक वातावरण। किसी को विशेष ट्रेन का सामूहिक सफर याद रहेगा तो किसी को यात्रा में मिले नए साथी।
धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व विभाग के अधिकारियों ने बताया कि मुख्यमंत्री तीर्थदर्शन योजना 26 जून, 2012 को शुरू हुई थी। इसका उद्देश्य प्रदेश के ऐसे वरिष्ठ नागरिकों को तीर्थयात्रा का अवसर उपलब्ध कराना है, जो अपनी आर्थिक या अन्य परिस्थितियों के कारण स्वयं दूरस्थ तीर्थस्थलों की यात्रा नहीं कर पाते। योजना के तहत पात्र यात्रियों को चिन्हित तीर्थस्थलों तक विशेष रेल से ले जाने के साथ भोजन, शुद्ध पेयजल, ठहरने तथा आवश्यकतानुसार बस यात्रा जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं।
विभाग के आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 तक प्रदेश के आठ लाख 35 हजार से अधिक बुजुर्ग इस योजना का लाभ ले चुके हैं। राज्य सरकार द्वारा उन्हें 826 विशेष ट्रेनों के माध्यम से विभिन्न तीर्थों की यात्रा कराई गई और इस पर करीब 911.5 करोड़ रुपये खर्च किए गए। इस साल योजना के माध्यम से सभी जिलों के बुजुर्गों की यात्राएं कराई जा रही हैं।
धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व राज्य मंत्री धर्मेंद्र सिंह लोधी का कहना है कि प्रदेश में तीर्थाटन की परंपरा को संरक्षित कर बुजुर्गों को तीर्थयात्रा का लाभ दिए जाने के लिए मुख्यमंत्री तीर्थ-दर्शन योजना का संचालन किया जा रहा है। यह योजना परिवार और समाज में बुजुर्गों के सम्मान को पुनर्स्थापित करने का महत्त्वपूर्ण प्रयास है।
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हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर
