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मप्र में गांवों को आत्मनिर्भर बनाने पर जोर, पांच साल की कार्ययोजना से बदलेगी तस्वीर

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मप्र में गांवों को आत्मनिर्भर बनाने पर जोर, पांच साल की कार्ययोजना से बदलेगी तस्वीर


भोपाल, 14 सितम्बर (हि.स.)। गांवों में पशुपालन सिर्फ परंपरा नहीं बल्कि कमाई का मजबूत जरिया हो। खेत में रासायनिक खाद पर निर्भरता घटे और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा मिले। घरों तक पानी पहुंचे, गलियों में पक्की नालियां हों, रात में सौर ऊर्जा से रोशनी हो और गांव के युवाओं को रोजगार के लिए हर दिन शहर की ओर न भागना पड़े। गांव में दूध का संग्रहण हो, छोटे उद्योग चलें और महिलाओं के हाथ में भी कमाई का अपना साधन हो।

मध्य प्रदेश सरकार की मुख्यमंत्री वृंदावन ग्राम योजना इसी सोच को जमीन पर उतारने की कोशिश है। योजना का मकसद केवल किसी गांव में सड़क, नाली या भवन बना देना नहीं है, बल्कि उसे ऐसा गांव बनाना है, जो अपनी जरूरतों का बड़ा हिस्सा स्थानीय संसाधनों और स्थानीय रोजगार के सहारे पूरा कर सके। सरकार ने इस योजना को 2025 में मंजूरी दी थी। योजना के तहत प्रदेश के 230 विधानसभा क्षेत्रों में एक-एक गांव को वृंदावन ग्राम के रूप में विकसित करने की योजना है। प्रत्येक चयनित गांव के लिए विकास के 27 मानक तय किए गए हैं।

सिर्फ विकास नहीं, गांव की पूरी अर्थव्यवस्था बदलने की कोशिश

वृंदावन ग्राम योजना की सबसे खास बात यह है कि इसमें गांव के विकास को अलग-अलग टुकड़ों में नहीं देखा गया है। सरकार की सोच है कि अगर गांव को वास्तव में आत्मनिर्भर बनाना है तो सड़क और भवन के साथ-साथ खेती, पशुपालन, दूध उत्पादन, पानी, ऊर्जा और रोजगार को भी एक-दूसरे से जोड़ना होगा। इसीलिए योजना में गौपालन और डेयरी विकास को खास महत्व दिया गया है। चयनित गांवों में दूध उत्पादन बढ़ाने, दुग्ध व्यवसाय को सहकारी व्यवस्था से जोड़ने और ग्रामीण परिवारों की आय बढ़ाने पर जोर है। योजना का एक बड़ा लक्ष्य यह भी है कि पशुधन ग्रामीण अर्थव्यवस्था का बोझ नहीं, बल्कि आमदनी का साधन बने। सरकार ने योजना के लिए वित्तीय वर्ष 2025-26 में 100 करोड़ रुपये का प्रावधान किया था। विधानसभा में सरकार की ओर से बताया गया था कि इस योजना के परिणाम एक वर्ष के भीतर दिखाई देने की अपेक्षा है।

कौन सा गांव बनेगा वृंदावन ग्राम -

योजना में हर गांव को सीधे शामिल करने की व्यवस्था नहीं है। शुरुआती चयन के लिए गांव में कम से कम 2,000 की आबादी और कम से कम 500 गौवंश होने की शर्त रखी गई थी। उद्देश्य ऐसे गांव चुनना है, जहां पशुपालन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने की पर्याप्त संभावनाएं पहले से मौजूद हों। यानी सरकार का विचार यह नहीं है कि किसी गांव में बाहर से अचानक कोई बड़ा उद्योग खड़ा कर दिया जाए। कोशिश यह है कि गांव के पास जो पहले से है—जमीन, पशुधन, खेती, पानी, स्थानीय कौशल और ग्रामीण श्रम—उसी को व्यवस्थित करके कमाई और विकास का आधार बनाया जाए।

क्या-क्या बदलेगा गांव में -

योजना के तहत तैयार किए जा रहे विकास मॉडल में सुविधाओं की लंबी सूची है। इसमें गौशाला, पंचायत भवन, सामुदायिक भवन, आंगनबाड़ी, स्वास्थ्य केंद्र, स्कूल, यात्री प्रतीक्षालय और पुस्तकालय जैसी बुनियादी सुविधाएं शामिल हैं। इसके साथ गांव के अंदर सड़क और नाली, सार्वजनिक शौचालय, पार्क, शांतिधाम, पशु चिकित्सालय, सार्वजनिक वितरण प्रणाली की दुकान और भंडारण जैसी सुविधाओं पर भी काम होना है।

पानी के लिए सौर ऊर्जा आधारित पंप, बिजली के लिए सौर ऊर्जा, सौर स्ट्रीट लाइट और बायोगैस जैसी व्यवस्थाओं को भी योजना का हिस्सा बनाया गया है। सिंचाई स्रोतों के विकास और बूंद-बूंद सिंचाई को भी इसमें जगह दी गई है। यानी योजना का फोकस सिर्फ यह नहीं है कि गांव दिखने में सुंदर लगे। असली परीक्षा यह होगी कि वहां रहने वाले परिवारों के जीवन में कितना बदलाव आता है।

कमाई के कई रास्ते, दूध से लेकर छोटे उद्योग तक -

ग्रामीण परिवारों की आय बढ़ाने के लिए योजना में दूध संग्रह केंद्र, फलोद्यान, पोषण वाटिका, लघु वनोपज आधारित उद्योग, कृषि और फल उत्पादन आधारित छोटे उद्योग तथा स्थानीय कौशल पर आधारित सेवाओं को बढ़ावा देने की बात है। इसका सीधा मतलब है कि किसान की कमाई केवल फसल बेचने तक सीमित न रहे। अगर गांव में दूध का संग्रहण और प्रसंस्करण होता है, स्थानीय उपज से उत्पाद तैयार होते हैं या गांव के युवाओं को अपने कौशल के आधार पर काम मिलता है, तो पैसा गांव के भीतर ही घूमेगा।

वृंदावन ग्राम योजना में पर्यावरण संरक्षण को भी महत्व

वृंदावन ग्राम योजना में जैविक और प्राकृतिक खेती, जल संरक्षण, चारागाह विकास तथा पर्यावरण संरक्षण को भी महत्व दिया गया है। इससे योजना का दायरा केवल पशुपालन तक सीमित नहीं रहता। गोवंश के लिए पर्याप्त चारा, पानी और देखभाल की व्यवस्था होगी तो पशुपालन टिकाऊ बनेगा। दूसरी ओर खेत में प्राकृतिक खेती और जल संरक्षण को बढ़ावा मिलने से खेती की लागत और प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव कम करने की कोशिश की जा सकती है। योजना की यही परिकल्पना है कि गांव में गाय, खेत, पानी और रोजगार चार अलग-अलग विषय न रहकर एक-दूसरे से जुड़े हुए विकास मॉडल का हिस्सा बनें।

कागज से जमीन तक पहुंचने लगी योजना

अब सवाल यह है कि योजना केवल घोषणा बनकर रह गई है या जमीन पर भी आगे बढ़ रही है? कृषि विभाग के अधिकारियों का कहना है कि योजना को जमीन पर उतारने के लिए अलग-अलग जिलों में चयनित गांवों की कार्ययोजना तैयार करने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। आलीराजपुर जिले में योजना के तहत चयनित दो गांवों के लिए पांच वर्षीय विस्तृत कार्ययोजना तैयार करने की प्रक्रिया शुरू की गई। वहीं, सागर जिले में भी सात गांवों को योजना के तहत चयनित किया है। इन गांवों में पड़रिया, मोकलपुर, खाकरिया, बारहटा, देहरी, रोडा और ताल सेमरा शामिल हैं।

कृषि उपसंचालक राजेश त्रिपाठी ने बताया कि मुख्यमंत्री वृंदावन ग्राम योजना के तहत चयनित गांवों में किसानों को प्राकृतिक खेती के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। कृषि विभाग की ओर से किसानों को प्राकृतिक खेती के फायदे समझाने के साथ शासन की कृषि योजनाओं का लाभ दिलाने के लिए भी कार्य किया जाएगा। चयनित गांवों के रकबे को चरणबद्ध तरीके से प्राकृतिक खेती से जोड़ने पर विशेष जोर रहेगा, ताकि किसानों की आय बढ़ाने के साथ गांवों को आत्मनिर्भर और मॉडल ग्राम के रूप में विकसित किया जा सके।

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हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर