(साक्षात्कार ) हर जिले का साहित्य इतिहास प्रकाशित करेगी मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी
भोपाल/नागदा, 02 अक्टूबर (हि.स.)। मध्य प्रदेश शासन हिंदी साहित्य अकादमी प्रदेश के प्रत्येक जिले के साहित्यिक इतिहास को प्रकाशित करने की दिशा में प्राथमिकता से काम करेगी। करीब एक माह में 12 जिलों के साहित्य इतिहास के प्रकाशन की प्रक्रिया पूरी करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके साथ ही तहसील और ब्लॉक स्तर पर पाठक मंचों को फिर सक्रिय करने तथा साहित्यिक पत्रिका ‘साक्षात्कार’ का नियमित प्रकाशन शुरू करने की योजना है।
मध्यप्रदेश शासन हिंदी साहित्य अकादमी के निदेशक डॉ. विकास दवे ने भोपाल स्थित अकादमी कार्यालय में ‘हिन्दुस्थान समाचार’ से विशेष बातचीत में यह जानकारी दी। उन्होंने हाल ही में तीसरी बार निदेशक का पदभार संभाला है। उन्होंने कहा कि अपने पूर्व कार्यकाल के तीन महत्वपूर्ण अधूरे कार्यों को इस बार प्राथमिकता के साथ पूरा करने का प्रयास किया जाएगा।
12 से 14 जिलों का इतिहास पहले ही तैयार
डॉ. दवे ने बताया कि प्रदेश के जिलों के साहित्य इतिहास के प्रकाशन की योजना उनके पिछले कार्यकाल में शुरू की गई थी। उस समय करीब 12 से 14 जिलों का साहित्यिक इतिहास तैयार भी हो गया था और प्रकाशन की प्रक्रिया शुरू की गई थी, लेकिन यह काम पूरी तरह मूर्त रूप नहीं ले सका।
उन्होंने कहा कि अब इस योजना को आगे बढ़ाते हुए लगभग एक माह में 12 जिलों के साहित्य इतिहास के प्रकाशन का कार्य पूरा करने की दिशा में काम किया जाएगा। उनका कहना था कि प्रदेश के प्रत्येक जिले के साहित्यिक इतिहास को सामने लाना अकादमी की प्राथमिकताओं में शामिल है।
फिर सक्रिय होंगे पाठक मंच
अकादमी के पूर्व कार्यकाल में शुरू की गई पाठक मंच योजना को भी दोबारा सक्रिय करने की तैयारी है। डॉ. दवे के अनुसार उस समय तहसील और ब्लॉक स्तर तक करीब 170 पाठक मंच बनाए गए थे। उस समय मध्यप्रदेश में 53 जिले थे। अब जिलों की संख्या बढ़ चुकी है, इसलिए पाठक मंचों के विस्तार और उन्हें सक्रिय करने पर भी काम किया जाएगा।
उन्होंने बताया कि इन मंचों को नियमित गतिविधियों से जोड़ने के साथ उन्हें पुस्तकें उपलब्ध कराने की योजना है। उनका उद्देश्य प्रदेश में साहित्य को लेकर व्यापक विमर्श का वातावरण तैयार करना है।
‘साक्षात्कार’ का नियमित प्रकाशन भी प्राथमिकता
डॉ. दवे ने बताया कि साहित्य अकादमी की पत्रिका ‘साक्षात्कार’ का प्रकाशन पूर्व में बजट की कमी के कारण प्रभावित हुआ था। अब इसके नियमित प्रकाशन की जिम्मेदारी भी प्राथमिकता से ली जा रही है।
उन्होंने कहा कि साहित्यिक गतिविधियों को गति देने के लिए पत्रिका, पाठक मंच और जिलों के साहित्य इतिहास का प्रकाशन तीन महत्वपूर्ण कार्य हैं। इन तीनों को पूरा करने का प्रयास किया जाएगा।
साहित्यकारों के प्रति सम्मान में कमी नहीं
वर्तमान परिवेश में साहित्यकारों के प्रति समाज के बदलते नजरिये से जुड़े सवाल पर डॉ. दवे ने कहा कि साहित्यकार को समाज परिवर्तन का कारक माना जाता है। ज्ञान परंपरा में विश्वास रखने वाले समाज में साहित्यकारों के प्रति सम्मान का भाव पहले भी था और आगे भी रहेगा।
उन्होंने कहा कि कविता लिखने वालों और मंचीय गतिविधियों से जुड़े लोगों की संख्या बढ़ी है। कुछ ऐसे लोग भी सामने आए हैं जिनकी कविताओं का स्तर कमजोर होने के बावजूद वे मंच पर कविता प्रस्तुत करने का आग्रह करते हैं। इससे इस क्षेत्र का कुछ हद तक मजाक बनने लगा है। हालांकि उनका कहना था कि इसका प्रभाव अच्छे और गंभीर साहित्यकारों के सम्मान पर नहीं पड़ा है।
साहित्य सृजन को व्यवसाय मानने से असहमति
साहित्य में व्यवसायिकता के प्रवेश के सवाल पर डॉ. दवे ने इसे खारिज करते हुए कहा कि साहित्य सृजन व्यवसाय नहीं है। उनके अनुसार सामान्य साहित्यकार आज भी आर्थिक अभाव में जीवन गुजार रहा है और साहित्य सृजन का बड़ा हिस्सा स्वांत: सुखाय की भावना से होता है।
उन्होंने कहा कि वे करीब 99 प्रतिशत साहित्यकारों को जानते हैं, जिनके पास अपनी पुस्तक प्रकाशित कराने के लिए पर्याप्त राशि तक नहीं होती। कई साहित्यकार आज भी अपनी जेब से पैसा खर्च कर साहित्यिक कार्यक्रमों में शामिल होते हैं। कुछ लेखकों को उनकी पुस्तकों का पारिश्रमिक मिलता है, लेकिन यह अलग स्थिति है।
उन्होंने कहा कि कुछ मंचीय कवियों को लाखों रुपये मिलते हैं, लेकिन ऐसे लोगों की संख्या लगभग एक प्रतिशत होगी। इसलिए कुछ उदाहरणों के आधार पर पूरे साहित्य समाज को व्यवसायिक कहना उचित नहीं है।
वैचारिक खेमेबंदी को बताया बड़ी चुनौती
वर्तमान समय में साहित्य के सामने मौजूद चुनौतियों पर डॉ. दवे ने कहा कि साहित्य का क्षेत्र इन दिनों वैचारिक आधार पर अलग-अलग खेमों में बंटता दिखाई दे रहा है। उन्होंने इसे चिंता का विषय बताया।
उन्होंने कहा कि समाज साहित्य से एक सूत्र में जुड़ने की अपेक्षा करता है। यदि साहित्यकार ही अलग-अलग हिस्सों में बंट जाएंगे तो समाज को एक सूत्र में बांधने की भूमिका कैसे निभा पाएंगे। उन्होंने कहा कि वामपंथ और दक्षिणपंथ के विवादों से ऊपर उठकर सभी को राष्ट्रपंथ अपनाना चाहिए। उनके अनुसार देश सर्वोपरि है और वैचारिक विवादों से ऊपर उठकर साहित्य का उपयोग देश के लिए किया जाना चाहिए।
युवाओं को अपनी जड़ों से जुड़े रहने की सलाह
नवोदित साहित्यकारों को संदेश देते हुए डॉ. दवे ने कहा कि अलग-अलग विचारधाराओं और विशेषकर पाश्चात्य प्रभाव में आकर कुछ युवा अपनी संस्कृति और भारतीय वैचारिक पृष्ठभूमि की आलोचना करने लगते हैं। उन्होंने कहा कि साहित्यकार को अपनी जड़ों और मिट्टी से कटकर यशस्वी होने का प्रयास नहीं करना चाहिए।
उन्होंने युवा साहित्यकारों से पुराने साहित्यकारों को पढ़ने का आग्रह किया। साथ ही उन्होंने कहा कि आधुनिक समय में कुछ साहित्यकार सनातन परंपरा और भारतीय संस्कृति की आलोचना कर स्वयं को नायक के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास करते हैं। युवाओं को ऐसे प्रभावों से बचना चाहिए। साक्षात्कार के दौरान मध्यप्रदेश शासन बाल साहित्य सृजन पीठ की निदेशक मीनू पांडे और लघु शोध संस्थान के डॉ. गिरिजेश सक्सेना भी मौजूद रहे।
हिन्दुस्थान समाचार / कैलाश सनोलिया
