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मध्य प्रदेश की तिजोरी से विदेशों की तरक्की

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मध्य प्रदेश की तिजोरी से विदेशों की तरक्की


मध्य प्रदेश की तिजोरी से विदेशों की तरक्की


23 साल पुरानी विदेश अध्ययन छात्रवृत्ति योजना की जवाबदेही पर उठे सवाल

भोपाल, 02 सितंबर (हि.स.)। मध्य प्रदेश की सरकारी तिजोरी से निकलने वाला पैसा जब किसी मेधावी छात्र को दुनिया की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी तक पहुंचाता है तो यह निश्चित रूप से उपलब्धि और गौरव का विषय है। सवाल उस उपलब्धि के बाद शुरू होता है। क्या विदेश में पढ़कर तैयार होने वाली प्रतिभा वापस प्रदेश की अर्थव्यवस्था, शिक्षा, शोध और उद्योग को कुछ लौटाती है? या फिर राज्य के संसाधनों से तैयार ‘माइंड’ और ‘मनी’ दोनों का स्थायी लाभ विदेशी संस्थानों और अर्थव्यवस्थाओं को मिलता है? यही सवाल प्रदेश की करीब 23 वर्ष पुरानी विदेश अध्ययन छात्रवृत्ति व्यवस्था को नए सिरे से जांच के दायरे में ला रहा है।

दरअसल, हाल ही में पंचायत एवं ग्रामीण विकास तथा श्रम मंत्री प्रहलाद सिंह पटेल ने छात्र राज सिंह लोधी से विदेश में पढ़ाई के खर्च के बारे में पूछा। ब्रिटेन की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन (यूसीएल) में चयनित राज ने बताया कि एक वर्ष की ट्यूशन फीस करीब 40 हजार अमेरिकी डॉलर है, जबकि रहने का खर्च लगभग 10 हजार डॉलर होगा। इसके अलावा वीजा, स्वास्थ्य बीमा और यात्रा का खर्च भी जुड़ता है। यह पूरी राशि मध्यप्रदेश भवन एवं अन्य संनिर्माण कर्मकार कल्याण मंडल की विदेश अध्ययन छात्रवृत्ति योजना के तहत उपलब्ध कराई जाएगी।

राज की सफलता प्रदेश के लिए गर्व का विषय है। ऐसे अवसर प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को दुनिया के श्रेष्ठ संस्थानों तक पहुंचाते हैं। मगर इसी उदाहरण से एक बड़ा नीतिगत सवाल भी सामने आया है, सरकार जिस प्रतिभा में लाखों रुपये का सार्वजनिक निवेश कर रही है, उस निवेश का प्रतिफल मध्यप्रदेश को कितना मिल रहा है?

23 साल से चल रही योजना, अब जवाबदेही पर नजर

मध्यप्रदेश में विदेश अध्ययन के लिए छात्रवृत्ति की व्यवस्था कोई नई पहल नहीं है। वर्ष 2003 से यह व्यवस्था संचालित है। इसके तहत पात्र विद्यार्थियों को विदेश में उच्च शिक्षा के लिए शिक्षण शुल्क, निर्वाह भत्ता, आकस्मिक व्यय और अन्य निर्धारित खर्च उपलब्ध कराने का प्रावधान है। विभिन्न विभागों और वर्गों के लिए संचालित योजनाओं में कुछ मामलों में प्रति विद्यार्थी प्रतिवर्ष 40 हजार अमेरिकी डॉलर तक शिक्षण शुल्क, 9 हजार डॉलर निर्वाह भत्ता और 1 हजार डॉलर आकस्मिक व्यय का प्रावधान रहा है। अलग-अलग विभागों की योजनाओं के चलते पिछले दो दशक से अधिक समय में बड़ी संख्या में विद्यार्थियों ने सार्वजनिक धन से विदेशों में उच्च शिक्षा हासिल की है। यहां प्रश्न विदेश जाकर पढ़ने का विरोध करने का नहीं है। प्रश्न यह है कि सरकारी निवेश के बदले राज्य को क्या मिल रहा है और उसकी निगरानी किस स्तर पर हो रही है?

‘ब्रेन ड्रेन’ से आगे बढ़कर देखना होगा ‘पब्लिक मनी का रिटर्न’

शिक्षा के क्षेत्र में राष्ट्रपति सम्मान प्राप्त डॉ. राजेश शर्मा का कहना है कि विदेश में पढ़ाई के अवसरों पर रोक लगाने की आवश्यकता नहीं है। जरूरत ऐसी नीति बनाने की है, जिससे सार्वजनिक धन से तैयार प्रतिभा का लाभ प्रदेश को भी मिले। उनके अनुसार विद्यार्थी विदेश जाकर वैश्विक कंपनियों में काम करते हैं, शोध करते हैं और पेटेंट विकसित करते हैं। ऐसे में सरकार को यह देखना चाहिए कि जिस शिक्षा में सार्वजनिक धन लगाया गया, उससे प्रदेश की अर्थव्यवस्था, शिक्षा, शोध अथवा उद्योग को कितना लाभ मिला।

उन्होंने कहा, इस मामले को सिर्फ ‘ब्रेन ड्रेन’ तक सीमित रखने के बजाय ‘रिटर्न ऑन पब्लिक मनी’ के नजरिए से देखना होगा। सरकार यह व्यवस्था कर सकती है कि विदेश से उच्च शिक्षा हासिल करने वाले विद्यार्थी अपनी विशेषज्ञता का निश्चित समय मध्यप्रदेश के विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों, स्टार्टअप, उद्योग या सरकारी तंत्र के साथ साझा करें। इससे छात्र की वैश्विक उपलब्धि प्रदेश की स्थानीय क्षमता में बदल सकती है।

जब मध्य प्रदेश में ही मौजूद हैं राष्ट्रीय स्तर के संस्थान

विदेश अध्ययन छात्रवृत्ति की प्राथमिकताओं पर विचार करते समय एक और तथ्य महत्वपूर्ण है। मध्यप्रदेश में ही आईआईटी, आईआईएम, एम्स, आईआईएसईआर, एमएएनआईटी, स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर, डॉ. हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित संस्थान मौजूद हैं।

प्रदेश में 55 निजी और 37 शासकीय विश्वविद्यालय संचालित हैं। इसके अलावा राष्ट्रीय महत्व के 11 अन्य संस्थान भी हैं, जहां देश के विभिन्न हिस्सों से विद्यार्थी शिक्षा लेने आते हैं। ऐसे में सवाल यह भी है कि किन विषयों के लिए विद्यार्थियों को विदेश भेजना वास्तव में जरूरी है और किन विषयों की उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा मध्यप्रदेश या देश में उपलब्ध है।

एक नीति यह हो सकती है कि विदेश अध्ययन छात्रवृत्ति का इस्तेमाल उन्हीं विषयों में किया जाए, जहां भारत में विशेषज्ञ स्तर की शिक्षा, अत्याधुनिक प्रयोगशाला अथवा विशिष्ट शोध सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। इससे विदेश अध्ययन योजना का उद्देश्य भी अधिक स्पष्ट होगा और सार्वजनिक धन का इस्तेमाल रणनीतिक क्षेत्रों में किया जा सकेगा।

हर साल 120 से 150 छात्र, लाखों का सरकारी निवेश

वित्तीय दृष्टि से देखें तो मध्यप्रदेश सरकार हर साल लगभग 120 से 150 विद्यार्थियों को विदेश में उच्च शिक्षा के लिए चयनित करती है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार सरकार प्रति विद्यार्थी अधिकतम करीब 50 हजार अमेरिकी डॉलर यानी लगभग 42 लाख रुपये सालाना तक का खर्च वहन करती है।

दो वर्ष के पाठ्यक्रम में यह राशि लगभग 80 लाख रुपये से एक करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है। वर्ष 2003 से 2026 के बीच विभिन्न विभागों के माध्यम से विदेश अध्ययन पर लगभग 320 करोड़ से 450 करोड़ रुपये तक खर्च होने का अनुमान सामने आता है। इस अवधि में करीब 1,500 से 2,000 विद्यार्थियों को विदेश भेजे जाने की बात कही जा रही है।

बांड है तो उसकी निगरानी और रिकवरी कहां?

सरकार इस योजना के बचाव में बांड व्यवस्था का उल्लेख करती है। नियमों के अनुसार विदेश से पढ़ाई पूरी करने के बाद विद्यार्थियों को मध्यप्रदेश लौटकर कम से कम पांच वर्ष तक राज्य सरकार के अधीन सेवाएं देने की शर्त रखी गई है। शर्त पूरी नहीं करने पर छात्रवृत्ति की पूरी राशि ब्याज सहित वापस करने का प्रावधान है। अब समस्या नियम बनाने से आगे की है।

जानकारी के अनुसार विशेष रूप से एससी, एसटी और ओबीसी कल्याण विभागों में छात्रवृत्ति राशि की रिकवरी से जुड़े मामले वर्षों से लंबित हैं। वहीं, कल्पना कीजिए कि विदेश अध्ययन पर खर्च होने वाली सैकड़ों करोड़ रुपये की राशि का बड़ा हिस्सा मध्यप्रदेश में ही आधुनिक रिसर्च इंफ्रास्ट्रक्चर, अत्याधुनिक लैब, इनक्यूबेशन सेंटर, विश्वविद्यालयों की शोध क्षमता और फैकल्टी विकास पर लगाया जाए। इससे हजारों-लाखों विद्यार्थियों को लंबे समय तक लाभ मिल सकता है।

विदेश भेजना लक्ष्य नहीं, प्रदेश में प्रतिभा का लाभ लौटाना लक्ष्य हो

इस संबंध में जीवाजी विश्वविद्यालय में प्रो. एसके सिंह ने कहा, विदेश अध्ययन छात्रवृत्ति को खत्म करना समाधान नहीं है। इसे अधिक पारदर्शी, लक्षित और परिणाम आधारित बनाना अधिक उपयोगी रास्ता हो सकता है। हर छात्र के चयन के साथ यह भी तय हो कि उसकी विशेषज्ञता प्रदेश के किस क्षेत्र में उपयोगी हो सकती है। उच्च शिक्षा पूरी करने के बाद विद्यार्थियों का ट्रैकिंग सिस्टम बनाया जाए। विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों और उद्योगों के साथ उनका नेटवर्क तैयार किया जाए। बांड की शर्तों की डिजिटल निगरानी हो और उल्लंघन होने पर समयबद्ध रिकवरी की व्यवस्था हो।

उन्होंने कहा, मध्यप्रदेश की प्रतिभा दुनिया में पहुंचे, यह राज्य की उपलब्धि है। मगर मध्यप्रदेश की तिजोरी से निकला पैसा अगर दुनिया की प्रतिभा तैयार करता है तो उस प्रतिभा का कुछ हिस्सा मध्यप्रदेश की धरती पर लौटकर नई प्रतिभाओं, नए शोध, नए उद्योग और नए रोजगार को जन्म दे, नीति की असली सफलता यही होगी।

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी