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पुरुलिया में दुर्लभ खनिजों के विशाल भंडार का सुराग, जंगलमहल में जगी औद्योगिक विकास की उम्मीद

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पुरुलिया में दुर्लभ खनिजों के विशाल भंडार का सुराग, जंगलमहल में जगी औद्योगिक विकास की उम्मीद


कोलकाता, 3 सितंबर (हि.स.)। अपनी पहाड़ियों और वन संपदा के लिए विख्यात पश्चिम बंगाल के जंगलमहल का पुरुलिया जिला अब जमीन के भीतर छिपी दुर्लभ खनिज संपदा के कारण चर्चा में है। उत्तर पुरुलिया में चट्टानी भूगर्भीय क्षेत्र के साथ फैली भ्रंश रेखा के आसपास बड़े पैमाने पर दुर्लभ खनिजों के संकेत मिले हैं। भूवैज्ञानिकों के अनुसार, यह क्षेत्र पूर्वी भारत के महत्वपूर्ण खनिज भंडारों में शामिल हो सकता है।

भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई) और परमाणु खनिज निदेशालय (एएमडी) की संयुक्त भूवैज्ञानिक जांच में झारखंड सीमा से सटे झालदा-2 प्रखंड के बेलामु पहाड़ से लेकर नवाहातु, कालापाथर, रघुड़ी, रघुनाथपुर और आगे बांधकुड़ा के छातना तथा पुरुलिया के काशीपुर तक दुर्लभ खनिजों की मौजूदगी के संकेत मिले हैं। दक्षिण पुरुलिया की भ्रंश रेखा में भी खनिजों की संभावनाएं बताई गई हैं, हालांकि इसकी विस्तृत रिपोर्ट अभी सामने नहीं आई है।

हाल ही में राज्यसभा में भाजपा सांसद शमिक भट्टाचार्य के सवाल के जवाब में केंद्र सरकार ने बताया कि पुरुलिया के एक प्रखंड में करीब 1.78 लाख टन अयस्क की पहचान की गई है। इसमें लगभग 0.4 प्रतिशत सीजियम, 0.3 प्रतिशत लिथियम और 0.01 प्रतिशत रुबिडियम होने की जानकारी दी गई है। इस क्षेत्र को नीलामी के लिए भी चिन्हित किया गया है।

इस खोज की आर्थिक अहमियत भी काफी अधिक मानी जा रही है। क्षेत्र के रेल संपर्क और रांची हवाईअड्डे से अपेक्षाकृत नजदीक होने के कारण भविष्य में खनिज आधारित उद्योगों के विकास के लिए यहां अनुकूल परिस्थितियां बन सकती हैं। इसके अलावा पुरुलिया और बांधकुड़ा में दुर्लभ खनिजों से जुड़ी करीब 10 परियोजनाएं फिलहाल शोध और अन्वेषण के चरण में हैं। जीएसआई की ओर से भी उन्नत स्तर का भूवैज्ञानिक अन्वेषण किया जा रहा है।

कालापाथर-रघुड़ी क्षेत्र में लैंथेनाइड और इट्रियम समेत करीब 16 धातुओं की मौजूदगी के संकेत मिले हैं। यहां लगभग 6.70 लाख टन दुर्लभ मृदा तत्वों की संभावना बताई जा रही है। विशेषज्ञों ने दो भ्रंश क्षेत्रों में अल्कलाइन कार्बोनेटाइट चट्टानों से लिथियम, फॉस्फोरस और मोनाजाइट के भंडार मिलने की संभावनाएं भी जताई हैं।

इन खनिजों का इस्तेमाल आधुनिक तकनीक और रणनीतिक उद्योगों में होता है। लिथियम विद्युत वाहनों, मोबाइल फोन और लैपटॉप की बैटरियों के लिए महत्वपूर्ण है, जबकि सीजियम का इस्तेमाल परमाणु अनुसंधान और जीपीएस जैसी तकनीकों में किया जाता है। दुर्लभ मृदा तत्व ऊर्जा भंडारण और आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उद्योगों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

सिद्धो-कान्हो-बिरसा विश्वविद्यालय के भूगोल विभाग के प्रोफेसर और पर्यावरण कार्यकर्ता विश्वजीत बेरा के मुताबिक, इन खनिजों की नीलामी और उसके बाद खनन शुरू होने से पुरुलिया और पूरे पश्चिम बंगाल में नए उद्योगों की संभावनाएं बढ़ सकती हैं। इससे रोजगार के अवसर पैदा होने, राज्य के राजस्व में वृद्धि और दुर्लभ खनिजों के लिए विदेशी निर्भरता कम होने की उम्मीद है। हालांकि उन्होंने खनन के साथ पर्यावरण और प्रदूषण नियंत्रण पर भी विशेष ध्यान देने की जरूरत बताई।

झालदा के निवासी और इसी विश्वविद्यालय में भूगोल के शोधार्थी प्रशांत मंडल ने कहा कि पुरुलिया में दुर्लभ खनिजों की खोज की खबर इस क्षेत्र में शोध कर रहे युवाओं के लिए उम्मीद की किरण है। उनका कहना है कि भविष्य में स्थानीय युवाओं की विशेषज्ञता और प्रतिभा को ध्यान में रखते हुए रोजगार के अवसरों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

पुरुलिया की जमीन के नीचे मिले ये दुर्लभ खनिज आने वाले वर्षों में जिले की आर्थिक तस्वीर बदलने की क्षमता रखते हैं। हालांकि खनन से पहले पर्यावरणीय प्रभाव, स्थानीय समुदायों के हित और टिकाऊ विकास को लेकर स्पष्ट रणनीति बनाना उतना ही जरूरी होगा। यदि वैज्ञानिक अन्वेषण, पारदर्शी नीलामी, जिम्मेदार खनन और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन कायम किया जाता है, तो पुरुलिया का यह ‘भूगर्भीय खजाना’ पश्चिम बंगाल के औद्योगिक भविष्य के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

हिन्दुस्थान समाचार / ओम पराशर