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‘ज्ञानम् परम बलम्’ से गूंजी मालवा की धरती, 600 से अधिक पीएचडी धारकों ने रचा अकादमिक इतिहास

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‘ज्ञानम् परम बलम्’ से गूंजी मालवा की धरती, 600 से अधिक पीएचडी धारकों ने रचा अकादमिक इतिहास


‘ज्ञानम् परम बलम्’ से गूंजी मालवा की धरती, 600 से अधिक पीएचडी धारकों ने रचा अकादमिक इतिहास


‘ज्ञानम् परम बलम्’ से गूंजी मालवा की धरती, 600 से अधिक पीएचडी धारकों ने रचा अकादमिक इतिहास


- ‘द राइजिंग भारत’ राष्ट्रीय संगोष्ठी में भारतीय ज्ञान परंपरा, हिंदुत्व, अर्थव्यवस्था और समकालीन विमर्श पर हुआ मंथन

इंदौर, 10 अगस्त (हि.स.)। मध्य प्रदेश में मालवा की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरती उस समय ज्ञान, शोध और वैचारिक विमर्श के अभूतपूर्व संगम की साक्षी बनी, जब ‘ज्ञानम् परम बलम्- द राइजिंग भारत’ विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में एक ही दिन, एक ही मंच पर 600 से अधिक पीएचडी धारक एकत्रित हुए।

वर्ल्ड एसोसिएशन ऑफ हिंदू एकेडेमिशियंस (डब्ल्यूएएचए) द्वारा आयोजित इस आयोजन को अकादमिक जगत का ऐतिहासिक समागम बताते हुए आयोजकों ने जानकारी दी कि इतनी बड़ी संख्या में शोधार्थियों और पीएचडी धारकों की एक साथ उपस्थिति अपने आप में एक अनूठा कीर्तिमान है। अहिल्याबाई होलकर की न्याय और सुशासन की धरती इंदौर में आयोजित इस संगोष्ठी ने भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक अकादमिक विमर्श से जोड़ने का एक व्यापक मंच प्रदान किया।

शैक्षणिक संस्थानों से तय होगी समर्थ राष्ट्र की दिशा

संगोष्ठी के मुख्य वक्ता और प्रखर विचारक मिलिंद परांडे ने भारत के सांस्कृतिक दर्शन, हिंदुत्व और भारतीय ज्ञान परंपरा की वैश्विक प्रासंगिकता को रेखांकित करते हुए कहा कि भारत की उन्नति के लिए उसकी अपनी ज्ञान परंपरा और दार्शनिक दृष्टि को समझना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि देश के शैक्षणिक संस्थानों में ऐसे सकारात्मक और सशक्त विमर्श को विकसित करने की आवश्यकता है, जो भारत को उसके सांस्कृतिक और बौद्धिक आधार से जोड़ते हुए राष्ट्र को परम वैभव की दिशा में आगे ले जाए।

उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि हिंदुत्व के मानवतावादी विमर्श को भावनात्मक स्तर तक सीमित रखने के बजाय वैज्ञानिक और अकादमिक पद्धति से दुनिया के सामने प्रस्तुत किया जाना चाहिए। उनके अनुसार, इस कार्य में देश के प्रबुद्ध वर्ग और शैक्षणिक संस्थानों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।

‘अहिल्या की धरती पर वैचारिक महाकुंभ’

उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता प्रसिद्ध उद्योगपति विनोद अग्रवाल ने की। उन्होंने अहिल्याबाई होलकर की इस ऐतिहासिक नगरी में आयोजित सम्मेलन को राष्ट्र और शिक्षण संस्थानों के पुनरुत्थान के लिए आवश्यक बताते हुए कहा कि इस प्रकार के आयोजन नई पीढ़ी को भारत के वास्तविक सांस्कृतिक दृष्टिकोण और उसकी विरासत से परिचित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

संगोष्ठी के विशेष अतिथि एवं देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के कुलगुरु राकेश सिंघई ने भारतीय ज्ञान परंपरा को शिक्षा में समाहित करने को एक महत्वपूर्ण कदम बताया। उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति के संदर्भ में भारतीय ज्ञान परंपरा पर होने वाले शोध भविष्य के शैक्षणिक विमर्श को नई दिशा दे सकते हैं। उनके अनुसार, भारतीय दृष्टि और आधुनिक शिक्षा के बीच सार्थक संवाद शिक्षा व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन का आधार बन सकता है।

160 से अधिक शोधपत्रों में भारत के विविध आयाम

संगोष्ठी के तकनीकी और वैचारिक सत्रों में 160 से अधिक शोधपत्र प्रस्तुत किए गए। इनमें साहित्य, कला, विज्ञान, अभियांत्रिकी, खगोल, रसायन, पुरातत्व, कंप्यूटर विज्ञान, समाजशास्त्र, राजनीति, जलवायु, प्रबंधन, पत्रकारिता, नृत्य, चिकित्सा विज्ञान, भूगोल, ज्योतिष और दर्शनशास्त्र जैसे विविध विषय शामिल रहे।

मालवा-निमाड़ के अलीराजपुर, धार, खंडवा, खरगोन, बड़वानी, बुरहानपुर और इंदौर सहित देश के विभिन्न हिस्सों से आए प्रोफेसरों और शोधकर्ताओं ने अपने शोध के माध्यम से भारतीय समाज, संस्कृति, विज्ञान और समकालीन चुनौतियों के विभिन्न पहलुओं को सामने रखा। इससे सम्मेलन का स्वरूप केवल सांस्कृतिक विमर्श तक सीमित न रहकर बहुविषयक अकादमिक संवाद का बन गया।

महिला और जनजातीय विमर्श ने खींचा ध्यान

संगोष्ठी के महत्वपूर्ण सत्रों में महिला विमर्श भी शामिल रहा। मुख्य वक्ता नूपुर देशकर ने भारतीय दृष्टि में महिला चेतना और उसके स्वरूप पर विचार रखा। उन्होंने भारतीय परंपरा में महिला की भूमिका और उसके सामाजिक-सांस्कृतिक आयामों को विमर्श के केंद्र में रखा।

जनजातीय विमर्श में लक्ष्मण सिंह मरकाम और प्रकाश उइके ने जनजातीय समाज के गौरवशाली इतिहास, संस्कृति और परंपराओं पर विचार प्रस्तुत किए। इस सत्र ने जनजातीय समाज को भारतीय सभ्यता और सांस्कृतिक विमर्श के व्यापक संदर्भ में देखने की आवश्यकता को रेखांकित किया।

वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत की बढ़ती भूमिका पर मंथन

भारतीय अर्थव्यवस्था और ग्लोबल मार्केट फोर्सेज पर केंद्रित सत्र में प्रख्यात विचारक ऑर्गेनाइजर राष्ट्रीय पत्रिका के संपादक प्रफुल्ल केतकर और विचारक जितेंद्र गुप्त ने मुख्य वक्ता के रूप में भारत की आर्थिक नीतियों तथा वैश्विक आर्थिक मंचों पर देश की बढ़ती भूमिका का विश्लेषण किया। चर्चा में बदलते वैश्विक आर्थिक परिदृश्य के बीच भारत के सामने मौजूद अवसरों और चुनौतियों पर भी विचार किया गया। इस प्रकार सम्मेलन में संस्कृति और दर्शन के साथ-साथ अर्थव्यवस्था, विज्ञान, तकनीक और सामाजिक विषयों को भी समान महत्व मिला।

कुलपति, विभागाध्यक्ष और प्राचार्यों की ऐतिहासिक मौजूदगी

आयोजन की व्यापकता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें चार पद्मश्री सम्मानित व्यक्तित्व, देश के 12 से अधिक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों के कुलपति, 38 विभागाध्यक्ष और 27 महाविद्यालयों के प्राचार्य उपस्थित रहे। इससे आयोजन को अकादमिक जगत में व्यापक प्रतिनिधित्व मिला। इस अवसर पर एक भव्य रंगीन स्मारिका का भी प्रकाशन और विमोचन किया गया, जिसमें संगोष्ठी के विषय, शोध और वैचारिक विमर्श से संबंधित सामग्री को संकलित किया गया।

इतने बड़े अकादमिक समागम के लिए व्यवस्थाओं को अत्यंत सुव्यवस्थित रखा गया। पूरे कार्यक्रम का संयोजन डॉ. संध्या एस. चौकसे ने किया। उनके स्वागत भाषण के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। वहीं समापन अवसर पर राष्ट्रीय कवि एवं विमर्श के प्रमुख मुकेश मोलवा ने देशभर से आए विद्वानों और अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने संगोष्ठी की ऐतिहासिक स्मारिका के संपादन का दायित्व भी संभाला। तकनीकी व्यवस्था की जिम्मेदारी यश पाटीदार ने संभाली।

अकादमिक विमर्श को नई दिशा देने का प्रयास

इस तरह से ‘ज्ञानम् परम बलम्- द राइजिंग भारत’ इस एक दिवसीय संगोष्ठी ने भारतीय ज्ञान परंपरा, आधुनिक शिक्षा और राष्ट्र के भविष्य को लेकर व्यापक अकादमिक संवाद की संभावना को सभी के सामने रखा।सम्मेलन का केंद्रीय संदेश यही रहा कि किसी भी समर्थ राष्ट्र की बुनियाद उसके ज्ञान, शोध, शिक्षा और सांस्कृतिक आत्मबोध से भी निर्मित होती है। ‘ज्ञानम् परम बलम्’ का उद्घोष इसी विचार को अकादमिक मंच से व्यापक समाज तक पहुंचाने का प्रयास बनकर उभरता हुआ यहां दिखाई दिया है।

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी