उच्च शिक्षा में समानता न्याय और विद्यार्थी हित की कसौटी पर यूजीसी की भूमिका (लेखिका-पूनम झा)
कठुआ, 29 सितंबर (हि.स.)। विश्वविद्यालय केवल डिग्री हासिल करने का स्थान नहीं होते बल्कि वे समाज और राष्ट्र के भविष्य को आकार देने वाली महत्वपूर्ण संस्थाएँ हैं। उच्च शिक्षा के संस्थानों में विद्यार्थी ज्ञान के साथ-साथ अपने व्यक्तित्व, विचार और भविष्य की दिशा भी तय करते हैं। ऐसे में विश्वविद्यालयों का वातावरण सुरक्षित, निष्पक्ष, पारदर्शी और सभी विद्यार्थियों के लिए समान अवसर वाला होना आवश्यक है।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) का उद्देश्य देश में उच्च शिक्षा के स्तर को बनाए रखना, विश्वविद्यालयों के विकास में सहयोग करना तथा विद्यार्थियों के लिए बेहतर और गुणवत्तापूर्ण शैक्षणिक वातावरण सुनिश्चित करना है। इसलिए उच्च शिक्षा से जुड़े नियमों और व्यवस्थाओं का केंद्र बिंदु विद्यार्थी हित, समानता, न्याय और निष्पक्षता होना चाहिए। आज आवश्यकता इस बात पर विचार करने की है कि यदि किसी विश्वविद्यालय में किसी विद्यार्थी के साथ भेदभाव, उत्पीड़न या अन्याय होता है तो उसके समाधान के लिए ऐसी व्यवस्था क्यों न हो जिसमें प्रत्येक विद्यार्थी को समान रूप से शिकायत करने, अपनी बात रखने और न्याय पाने का अधिकार मिले। इसी संदर्भ में यूजीसी द्वारा वर्ष 2026 में अधिसूचित नियमों को लेकर हुई चर्चा भी महत्वपूर्ण है। इन नियमों में उच्च शिक्षा संस्थानों में आंतरिक समितियों तथा भेदभाव से जुड़ी शिकायतों के समाधान की व्यवस्था की गई थी। बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने इन नियमों के क्रियान्वयन पर अगले आदेश तक रोक लगाते हुए 2012 के नियमों को फिलहाल लागू रखने का निर्देश दिया। न्यायालय ने नियमों की भाषा और उनके संभावित दुरुपयोग से जुड़े पहलुओं पर भी विचार की आवश्यकता जताई है। इसलिए इस पूरे विषय पर भावनाओं के बजाय तथ्यों और संतुलित दृष्टिकोण के साथ चर्चा जरूरी है।
यह विषय किसी एक जाति, समुदाय या वर्ग के पक्ष अथवा विरोध का विषय नहीं होना चाहिए। भेदभाव गलत है चाहे उसका शिकार कोई भी हो। समानता का अर्थ यही है कि प्रत्येक विद्यार्थी को उसकी पहचान से परे समान सम्मान, सुरक्षा और न्याय मिले। विश्वविद्यालय की दहलीज पर पहुंचने वाला प्रत्येक विद्यार्थी अपने साथ वर्षों की मेहनत, सपने, आत्मविश्वास और परिवार की उम्मीदें लेकर आता है। ऐसे में उसे विश्वविद्यालय में अपनी जाति, समुदाय या सामाजिक पहचान के कारण नहीं बल्कि उसकी योग्यता, मेहनत और मानवीय मूल्यों के आधार पर सम्मान मिलना चाहिए। हमारा समाज विविधताओं से भरा हुआ है। अलग-अलग विचार, संस्कृतियाँ, परंपराएँ और सामाजिक पृष्ठभूमियां हमारी पहचान का हिस्सा हैं। विश्वविद्यालय इसी समाज का एक छोटा रूप हैं। विद्यार्थियों के विचारों में भिन्नता होना स्वाभाविक है और शैक्षणिक संस्थानों में स्वस्थ मतभेद विचारों के विकास का माध्यम भी बन सकते हैं। लेकिन मतभेद कभी अपमान, उत्पीड़न, भय या मानसिक प्रताड़ना का रूप नहीं लेना चाहिए।
-रैगिंग के नाम पर उत्पीड़न स्वीकार्य नहीं
इसी संदर्भ में रैगिंग का विषय भी गंभीर है। कई बार रैगिंग को परिचय या परंपरा के नाम पर सामान्य बनाने का प्रयास किया जाता है लेकिन यदि किसी विद्यार्थी को अपमानित, भयभीत या प्रताड़ित किया जाता है तो उसे किसी भी परिस्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता। विश्वविद्यालयों में रैगिंग और उत्पीड़न से संबंधित शिकायतों के लिए स्पष्ट, प्रभावी और निष्पक्ष व्यवस्था होनी चाहिए। शिकायतकर्ता विद्यार्थी को यह भरोसा होना चाहिए कि उसकी बात सुनी जाएगी और उसे किसी प्रकार के दबाव या प्रतिशोध का सामना नहीं करना पड़ेगा। वहीं जिस व्यक्ति पर आरोप लगाया गया है उसे भी अपना पक्ष रखने और निष्पक्ष सुनवाई का पूरा अवसर मिलना चाहिए। किसी भी व्यवस्था की विश्वसनीयता तभी कायम रहती है जब उसमें शिकायतकर्ता की सुरक्षा के साथ-साथ आरोपित व्यक्ति के अधिकारों की भी रक्षा हो। दोष सिद्ध होने से पहले किसी व्यक्ति को दोषी मान लेना प्राकृतिक न्याय की मूल भावना के अनुरूप नहीं है। कानून और नियमों का उद्देश्य किसी व्यक्ति को फंसाना नहीं बल्कि वास्तविक समस्या का न्यायपूर्ण समाधान करना होना चाहिए। शिकायतकर्ता को न्याय मिले और यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो उचित कार्रवाई हो लेकिन पूरी प्रक्रिया निष्पक्ष, पारदर्शी और निर्धारित नियमों के अनुरूप हो यही एक स्वस्थ व्यवस्था की पहचान है। उच्च शिक्षा संस्थानों में ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता है, जिसमें भेदभाव और उत्पीड़न के खिलाफ प्रभावी सुरक्षा हो, शिकायतों का निष्पक्ष निवारण हो और सभी पक्षों को अपनी बात रखने का अवसर मिले। यही व्यवस्था विद्यार्थियों में कानून और संस्थानों के प्रति विश्वास पैदा करेगी।
अंततः विश्वविद्यालय वह स्थान होना चाहिए जहां विद्यार्थी भय के नहीं बल्कि ज्ञान, विचार और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़े। समानता का अर्थ केवल समान नियम बनाना नहीं बल्कि प्रत्येक विद्यार्थी को सम्मान और न्याय का समान अवसर देना भी है। एक मजबूत उच्च शिक्षा व्यवस्था वही होगी, जहां न भेदभाव के लिए जगह हो, न उत्पीड़न के लिए और न ही बिना निष्पक्ष सुनवाई के किसी को दोषी ठहराने की गुंजाइश। विद्यार्थी हित, समानता, पारदर्शिता और प्राकृतिक न्याय इन्हीं मूल्यों पर उच्च शिक्षा का भरोसा और भविष्य टिक सकता है।
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हिन्दुस्थान समाचार / सचिन खजूरिया
