जज शिवकुमार की सादगी बनी मिसाल, साइकिल से पहुंचते हैं कोर्ट, कर्मचारियों संग करते हैं भोजन
कोयंबटूर, 08 जुलाई (हि.स.)। न्यायाधीश शब्द का जिक्र होते ही सरकारी वाहन, सुरक्षाकर्मीं और प्रोटोकॉल की बात आमतौर पर लोगों के मन में आ ही जाती है, लेकिन तमिलनाडु के कोयंबटूर में 5वीं अतिरिक्त सत्र अदालत के न्यायाधीश पीके शिवकुमार इस परंपरागत छवि से बिल्कुल अलग हैं। उच्च न्यायिक पद पर आसीन होने के बावजूद उन्होंने अपनी सादगी, विनम्रता और सहज जीवनशैली को ही अपनी सबसे बड़ी पहचान बनाया है।
प्रतिदिन साइकिल से अदालत पहुंचना, अपना भोजन स्वयं घर से लाना, कर्मचारियों के साथ बैठकर भोजन करना और अनावश्यक प्रोटोकॉल से दूरी बनाए रखना उनकी दिनचर्या का हिस्सा है। यही कारण है कि वे इन दिनों न्यायालय परिसर में ही नहीं, बल्कि आम लोगों के बीच भी चर्चा का विषय बने हुए हैं।
तमिलनाडु के नामक्कल जिले के निवासी शिवकुमार लंबे समय से न्यायिक सेवा से जुड़े हुए हैं। उन्होंने सेलम, कोयंबटूर, मेट्टूपालयम और पुदुकोट्टई सहित कई स्थानों पर मजिस्ट्रेट तथा अधीनस्थ न्यायालयों में न्यायाधीश के रूप में सेवाएं दी हैं। उनके साथ काम कर चुके लोगों के अनुसार उन्होंने अपने पूरे न्यायिक जीवन में कभी भी पद का दिखावा नहीं किया। उस समय भी वे रोजाना साइकिल से अदालत पहुंचते थे। कुछ महीने पहले जिला जज के पद पर पदोन्नत होने के बाद उनका तबादला कोयंबटूर जिला न्यायालय में हुआ, लेकिन पद बदलने के बावजूद उनकी दिनचर्या और सोच में कोई बदलाव नहीं आया। आज भी वे प्रतिदिन साइकिल से अदालत पहुंचते हैं और उसी सादगी के साथ अपने न्यायिक दायित्वों का निर्वहन करते हैं।
वरिष्ठ न्यायिक अधिकारियों के साथ आमतौर पर सरकारी वाहन, सुरक्षा व्यवस्था और अटेंडेंट्स का पूरा प्रोटोकॉल होता है, लेकिन जज शिवकुमार ने इस व्यवस्था को अपने जीवन का हिस्सा नहीं बनने दिया। उन्होंने स्पष्ट निर्देश दे रखे हैं कि न्यायालय परिसर में चलते समय कोई भी अटेंडेंट केवल औपचारिकता निभाने के लिए उनके पीछे न चले। वे अकेले ही अदालत के गलियारों से गुजरते हैं और सामान्य नागरिक की तरह सभी से सहजता के साथ मिलते-जुलते हैं। उनका मानना है कि सम्मान किसी पद या प्रोटोकॉल से नहीं, बल्कि व्यवहार और कार्यशैली से प्राप्त होता है।
जज शिवकुमार की सादगी उनके कार्यालयीन व्यवहार में भी साफ दिखाई देती है। वे प्रतिदिन घर से अपना टिफिन स्वयं लेकर अदालत आते हैं। जहां अधिकांश न्यायाधीश अपने निजी कक्ष में भोजन करना पसंद करते हैं, वहीं शिवकुमार दोपहर के भोजन के समय अदालत में कार्यरत क्लर्कों, अटेंडेंट्स और अन्य कर्मचारियों के साथ बैठकर भोजन करते हैं। भोजन के दौरान वे कर्मचारियों से आत्मीयता से बातचीत करते हैं और किसी वरिष्ठ अधिकारी की तरह नहीं, बल्कि एक सहकर्मी की तरह व्यवहार करते हैं। उनके इस सहज और मानवीय स्वभाव ने न्यायालय परिसर में आपसी सम्मान और सौहार्द का वातावरण बनाया है।
न्यायालय परिसर में कार्यरत कर्मचारियों और अधिवक्ताओं का कहना है कि जज शिवकुमार हमेशा विनम्र भाषा का प्रयोग करते हैं। वे कभी भी अपने पद का अनावश्यक प्रभाव नहीं दिखाते और हर व्यक्ति से समान सम्मान के साथ पेश आते हैं। उनकी यही सादगी और सहजता उन्हें अन्य अधिकारियों से अलग पहचान दिलाती है। अधिवक्ताओं का मानना है कि उनका व्यवहार न्यायपालिका की गरिमा को और अधिक ऊंचा करता है तथा यह संदेश देता है कि ऊंचे पद पर पहुंचने के बाद भी व्यक्ति अपने मूल संस्कारों और मानवीय मूल्यों को कायम रख सकता है।
आज के दौर में जहां पद और प्रतिष्ठा के साथ अक्सर दिखावा, सुविधाएं और औपचारिकता जुड़ जाती हैं, वहीं शिवकुमार का जीवन समाज के लिए एक सकारात्मक संदेश प्रस्तुत करता है। वे अपने आचरण से यह साबित कर रहे हैं कि किसी व्यक्ति की असली पहचान उसके पद, सरकारी वाहन या सुरक्षा घेरे से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार, विनम्रता और मानवता से होती है। उनकी जीवनशैली न्यायपालिका ही नहीं, बल्कि प्रशासनिक सेवाओं से जुड़े अधिकारियों और युवाओं के लिए भी प्रेरणास्रोत बन गई है। स्थानीय लोग भी उन्हें एक ऐसे न्यायाधीश के रूप में देखते हैं, जिन्होंने अपने व्यक्तित्व से यह सिद्ध कर दिया है कि सच्ची महानता सादगी और संवेदनशीलता में निहित होती है।
शिवकुमार ने अपने व्यवहार से यह साबित कर दिया है कि बड़ा पद व्यक्ति को महान नहीं बनाता, बल्कि उसकी विनम्रता, सादगी और लोगों के प्रति सम्मान का भाव उसे विशिष्ट बनाता है। साइकिल से अदालत पहुंचना, कर्मचारियों के साथ बैठकर भोजन करना और अनावश्यक प्रोटोकॉल से दूरी बनाए रखना आज उनकी पहचान बन चुका है। यही कारण है कि न्यायालय परिसर से लेकर आम लोगों के बीच तक उनकी सादगी की चर्चा हो रही है और वे अनेक लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गए हैं।------------
हिन्दुस्थान समाचार / Dr. Vara Prasada Rao PV
