मप्र के उज्जैन में प्रशासन की पांच दिन की कड़ी मशक्कत के बाद भी नहीं हिली ‘खड़े हनुमान’ की मूर्ति
उज्जैन, 08 सितंबर (हि.स.)। मध्य प्रदेश के ज्योतिर्लिंग भगवान महाकाल की नगरी उज्जैन में सिंहस्थ-2028 की तैयारियों के बीच एक प्राचीन हनुमान मूर्ति को सुरक्षित स्थानांतरित करने की प्रशासनिक अथक परिश्रम और कवायद लगातार चर्चा का विषय बनी हुई है। अति प्राचीन खड़े हनुमान मंदिर को हटाना नगर निगम और जिला प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।
उज्जैन शहर में कंठाल चौराहा से छत्री चौक तक जारी सड़क चौड़ीकरण की जद में आए प्राचीन खड़े हनुमान मंदिर को हटाने के लिए पिछले पांच दिनों से प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद मूर्ति अपनी जगह से हिल नहीं सकी है। क्रेन और अन्य साधनों के इस्तेमाल के बाद भी जब प्रतिमा को हटाना संभव नहीं हुआ तो मौके पर मौजूद अधिकारी भी हैरान नजर आए।
प्रतिमा को हटाने का प्रयास गुरुवार से किया जा रहा है। मंदिर के भवन का हिस्सा नगर निगम पहले ही हटा चुका है और मूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए उसके ऊपर कैनोपी टेंट लगाया गया है। अब प्रशासन आज (मंगलवार) एक बार फिर मूर्ति को सुरक्षित तरीके से स्थानांतरित करने की कोशिश करेगा।
सिंहस्थ-2028 को देखते हुए कंठाल चौराहा से छत्री चौक तक सड़क चौड़ीकरण की योजना पर काम चल रहा है। इसी प्रस्तावित विकास कार्य की सीमा में प्राचीन खड़े हनुमान मंदिर भी आया है। प्रशासन की कोशिश है कि मूर्ति को किसी तरह की क्षति पहुंचाए बिना सुरक्षित स्थान पर स्थापित किया जाए। हालांकि, लगातार प्रयासों के बाद भी मूर्ति के नहीं हट पाने से यह पूरा घटनाक्रम शहर क लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गया है।
हनुमान चालीसा के पाठ के साथ विरोध
मूर्ति को हटाने के प्रयासों का कुछ हिंदूवादी संगठनों, युवक कांग्रेस और स्थानीय लोगों ने विरोध किया है। विरोध के दौरान हनुमान चालीसा का पाठ भी किया गया। संतों का कहना है कि सनातन परंपरा में प्राण-प्रतिष्ठित मूर्ति का विशेष धार्मिक महत्व होता है। इसलिए किसी भी तरह का निर्णय लेते समय श्रद्धालुओं की आस्था और भावनाओं का ध्यान रखा जाना चाहिए।
स्थानीय लोगों के बीच भी प्रतिमा के नहीं हटने को लेकर अलग-अलग तरह की चर्चाएं हैं। कुछ लोगों का कहना है कि भगवान स्वयं यहां से नहीं जाना चाहते। हालांकि, इन धारणाओं के बीच प्रशासन की ओर से मूर्ति को तकनीकी और सुरक्षित तरीके से स्थानांतरित करने का प्रयास जारी है।
मूर्ति हटाने की तैयारी के दौरान रात में एक और घटना सामने आई। बताया गया कि जिस समय स्थान को प्लास्टिक से ढंका जा रहा था, उसी दौरान प्रतिमा के सामने स्थित बिजली के पोल में स्पार्किंग हुई और ब्लास्ट के बाद बिजली चली गई। इस घटना को लेकर भी शहर में तरह-तरह की चर्चाएं चल रही हैं। कुछ लोग इसे सामान्य विद्युत घटना मान रहे हैं, जबकि कुछ लोगों ने इसे किसी बड़ी अनहोनी से जोड़कर देखा है।
वानरों की फौज पहुंची
कार्रवाई के बीच गत रविवार शाम मंदिर परिसर और आसपास के मकानों की छतों पर अचानक 50 से अधिक वानर पहुंच गए। कई घंटों तक एक साथ वानरों का वहां डटे रहना और शांत बैठना लोगों के बीच कौतूहल और धार्मिक चर्चा का विषय बन गया। इसका वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। इसके बाद सोमवार सुबह मंदिर में दर्शनार्थियों की भीड़ उमड़ पड़ी। कई श्रद्धालु भावुक नजर आए और मूर्ति के स्थानांतरण से पहले इसे अंतिम दर्शन मानकर बड़ी संख्या में मंदिर पहुंचे।
पुरातत्व विशेषज्ञ ने बताया, बेसाल्ट पत्थर की है प्रतिमा
प्रतिमा को लेकर विक्रम विश्वविद्यालय के पुरातत्व विशेषज्ञ प्रो. डॉ. रमण सोलंकी ने बताया कि खड़े हनुमान की मूर्ति मालवा क्षेत्र में पाए जाने वाले बेसाल्ट पत्थर से निर्मित है। उनका मानना है कि प्रतिमा करीब एक हजार वर्ष पुरानी राजा भोज काल की प्रतिमा निर्माण परंपरा से जुड़ी हो सकती है।
उन्होंने बताया कि परमार काल और राजा भोज के समय मजबूत बेसाल्ट पत्थर पर मूर्तियां तराशने की परंपरा रही है। इसी वजह से मूर्ति को केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और पुरातात्विक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाना चाहिए। हालांकि, प्रतिमा की वास्तविक आयु और उसके स्थापित किए जाने के काल का सटीक निर्धारण अभी बाकी है। इसके लिए वैज्ञानिक परीक्षण और विशेषज्ञों की विस्तृत जांच आवश्यक होगी।
‘वैज्ञानिक तकनीक से ही हो सुरक्षित स्थानांतरण’
डॉ. सोलंकी ने मूर्ति को हटाने की प्रक्रिया को लेकर भी सावधानी बरतने की बात कही है। उनका कहना है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और मध्य प्रदेश पुरातत्व विभाग के पास प्राचीन संरचनाओं एवं प्रतिमाओं को सुरक्षित तरीके से स्थानांतरित करने की विशेषज्ञता मौजूद है। उनके अनुसार, उचित वैज्ञानिक तकनीक अपनाकर प्रतिमा को बिना किसी नुकसान के दूसरे स्थान पर स्थापित किया जा सकता है। इसलिए जल्दबाजी के बजाय विशेषज्ञों की निगरानी में पूरी प्रक्रिया को अंजाम देना महत्वपूर्ण होगा।
खड़े हनुमान मंदिर जिस क्षेत्र में स्थित हैं, वह उज्जैन के प्राचीन इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। छोटा सराफा, बड़ा सराफा, नमक मंडी, गोपाल मंदिर, दानी गेट और शिप्रा नदी से जुड़ा यह इलाका प्राचीन उज्जयिनी की ऐतिहासिक पहचान को समेटे हुए है।
इस क्षेत्र का संबंध सिंधिया राजवंश के करीब 300 वर्ष पुराने इतिहास से भी बताया जाता है। इसके अलावा राजा भोज काल से जुड़े चौबीस खंभा क्षेत्र और बाद के समय में निर्मित सती गेट भी इसी ऐतिहासिक विरासत का हिस्सा हैं। ऐसे में खड़े हनुमान की मूर्ति को हटाने का मामला केवल सड़क चौड़ीकरण तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि धार्मिक आस्था के साथ-साथ विरासत संरक्षण का प्रश्न भी बन गया है।
जनेऊ, दाढ़ी-मूंछ और जोड़े हाथों वाला अनूठा स्वरूप
उज्जैन के खड़े हनुमान मूर्ति की पहचान उनके विशिष्ट स्वरूप से भी है। मूर्ति में हनुमान जी को ब्राह्मण स्वरूप में दर्शाया गया है। वे जनेऊ धारण किए हुए हैं, उनके चेहरे पर दाढ़ी-मूंछ है और हाथ जुड़े हुए हैं। स्थानीय स्तर पर इसे अपनी तरह की विश्व में एकमात्र प्रतिमा माना जाता है। इस प्रतिमा से श्रद्धालुओं की आस्था भी गहराई से जुड़ी हुई है।
मान्यता के अनुसार, बच्चों को बुरी नजर से बचाने के लिए यहां जंतर बांधा जाता है। इसी आस्था के चलते प्रतिदिन सैकड़ों लोग मंदिर पहुंचते हैं। अब सड़क चौड़ीकरण के लिए मंदिर परिसर का भवन हटाए जाने के बाद सबसे बड़ी चुनौती मूर्ति को सुरक्षित रूप से स्थानांतरित करने की है। मंदिर भवन के गर्भगृह और मुख्य ढांचे को तोड़ा जा चुका है। फिलहाल मूर्ति को कैनोपी टेंट लगाकर सुरक्षित रखा गया है। मंदिर के बाहर स्थानीय श्रद्धालुओं ने चेतावनी भरा पोस्टर भी लगाया है। इसमें लिखा है कि मूर्ति हटाने के दौरान यदि किसी भी तरह से यह खंडित होती है तो इसकी पूरी जिम्मेदारी प्रशासन की होगी।
आज होने वाला प्रयास इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है कि प्रशासन इस ऐतिहासिक और आस्था से जुड़ी प्रतिमा मूर्ति को किस तरह सुरक्षित तरीके से विस्थापित करता है।
आस्था बनाम विकास के बीच फंसा मामला
मंदिर के सेवादार और पुजारी महेश पंडित (बैरागी) का कहना है कि उन्हें लगातार महसूस हो रहा है कि बाबा संकेत दे रहे हैं कि उन्हें इसी स्थान पर रहना है। स्थानीय नागरिकों का तर्क है कि ऐतिहासिक मंदिर का जुड़ाव 1857 की क्रांति से भी पहले का है, इसलिए इसे हटाने के बजाय इसी स्थान पर भव्य मंदिर का पुनर्निर्माण किया जाना चाहिए।
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हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर
