आस्था का केंद्र देवकली मंदिर,जहां विराजमान है महाकालेश्वर शिवलिंग
आज भी जीवंत हैं जनश्रुतियां
औरैया, 31 जुलाई (हि. स.)। उत्तर प्रदेश के औरैया जनपद में शहर से करीब चार किलोमीटर दक्षिण यमुना तट के बीहड़ क्षेत्र में स्थित प्राचीन देवकली मंदिर अपनी धार्मिक मान्यताओं और जनश्रुतियों के कारण श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। सावन के महीने में यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु भगवान महाकालेश्वर का जलाभिषेक करने पहुंचते हैं। मंदिर के पुजारी शिव ने मंदिर से जुड़े प्राचीन इतिहास और लोककथाओं की जानकारी दी।
पुजारी के अनुसार प्राचीन समय में इस स्थान को देवगढ़ के नाम से जाना जाता था। जनश्रुति है कि राजा कृष्णदेव ने यहां यमुना तट पर एक किला और भगवान महाकालेश्वर का मंदिर बनवाकर शिवलिंग की स्थापना कराई थी। बाद में समय के साथ किला नष्ट हो गया और क्षेत्र वीरान हो गया।
लोकमान्यता के अनुसार कई पीढ़ियों बाद राजा विशोक देव का विवाह कन्नौज के राजा जयचंद की बहन देवकला से हुआ। संतान प्राप्ति की कामना लेकर लौटते समय दोनों इसी स्थान पर रुके और यहीं नया महल बनाने का निर्णय लिया। महल की नींव खोदते समय बीच आंगन में एक प्राचीन शिवलिंग मिला, जिसे हटाया नहीं जा सका। इसके बाद महारानी देवकला को माता मंगला काली ने स्वप्न एवं दिव्य दर्शन देकर बताया कि यह स्वयं महाकालेश्वर हैं। इसके बाद राजा विशोक देव ने उसी स्थान पर भव्य शिव मंदिर बनवाने का निर्णय लिया।
पुजारी ने बताया कि मंदिर निर्माण पूरा होने से पहले महारानी देवकला का निधन हो गया। उनकी स्मृति में राजा ने मंदिर का नाम 'देवकली मंदिर' रख दिया। तभी से यहां भगवान महाकालेश्वर की पूजा-अर्चना होती चली आ रही है।
मंदिर से जुड़ी एक अन्य जनश्रुति में शेरशाह सूरी द्वारा मंदिर पर आक्रमण और एक गुंबद क्षतिग्रस्त होने का भी उल्लेख मिलता है। हालांकि इन घटनाओं के ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन स्थानीय लोगों में यह कथा आज भी प्रचलित है।
सावन के प्रत्येक सोमवार को देवकली मंदिर में विशाल मेला लगता है, जहां औरैया सहित आसपास के जिलों से हजारों श्रद्धालु दर्शन और जलाभिषेक के लिए पहुंचते हैं। मंदिर के पुजारी शिव का कहना है कि यह सिद्धपीठ धार्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र है और इसके इतिहास पर अभी और शोध की आवश्यकता है।
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हिन्दुस्थान समाचार / सुनील कुमार
