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आईएमएस-बीएचयू के शोध को अंतरराष्ट्रीय पहचान, छह केंद्रों पर 880 मरीजों पर अध्ययन कर निकाला निष्कर्ष

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आईएमएस-बीएचयू के शोध को अंतरराष्ट्रीय पहचान, छह केंद्रों पर 880 मरीजों पर अध्ययन कर निकाला निष्कर्ष


आईएमएस-बीएचयू के शोध को अंतरराष्ट्रीय पहचान, छह केंद्रों पर 880 मरीजों पर अध्ययन कर निकाला निष्कर्ष


-हेपेटाइटिस-सी के चयनित मरीजों में 8 सप्ताह का उपचार 12 सप्ताह जितना प्रभावी

वाराणसी,05 अक्टूबर (हि.स.)। हेपेटाइटिस-सी के उपचार के क्षेत्र में चिकित्सा विज्ञान संस्थान, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (आईएमएस-बीएचयू) ने महत्वपूर्ण वैज्ञानिक उपलब्धि हासिल की है। आईएमएस-बीएचयू के गैस्ट्रोलॉजी विभाग की सक्रिय सहभागिता वाले बहुकेंद्रीय अध्ययन के निष्कर्ष प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय चिकित्सा शोध पत्रिका ‘द लैंसेट’ में 30 सितंबर 2026 को प्रकाशित हुए हैं।

अध्ययन में पाया गया कि बिना सिरोसिस वाले और पहले किसी उपचार से न गुजर चुके चयनित हेपेटाइटिस-सी मरीजों में सोफोसबुविर-वेलपाटासविर का आठ सप्ताह का उपचार, मानक 12 सप्ताह के उपचार की तुलना में प्रभावशीलता में कमतर नहीं है।

छह केंद्रों पर 880 मरीजों पर अध्ययन

देश के छह प्रमुख चिकित्सा एवं शोध केंद्रों में किए गए इस बहुकेंद्रीय अध्ययन में कुल 880 मरीजों को शामिल किया गया। इनमें 443 मरीजों को आठ सप्ताह और 437 मरीजों को 12 सप्ताह का उपचार दिया गया। परिणामों के अनुसार, आठ सप्ताह के उपचार समूह में एसवीआर-12 की दर 98.8 प्रतिशत, जबकि 12 सप्ताह के उपचार समूह में यह 99.0 प्रतिशत रही। दोनों समूहों में उपचार के परिणाम लगभग समान पाए गए। इससे निर्धारित मरीज समूह में आठ सप्ताह का उपचार प्रभावशीलता के लिहाज से 12 सप्ताह के उपचार से कमतर नहीं पाया गया। अध्ययन के दौरान कोई महत्वपूर्ण सुरक्षा संबंधी समस्या सामने नहीं आई। किसी भी मरीज को प्रतिकूल घटना के कारण उपचार बीच में बंद नहीं करना पड़ा।

आईएमएस-बीएचयू के विशेषज्ञों की अहम भूमिका

इस अध्ययन में आईएमएस-बीएचयू के गैस्ट्रोलॉजी विभाग के डॉ. विनोद कुमार की प्रमुख और नेतृत्वकारी भूमिका रही। वे प्रकाशित शोध-पत्र के प्रमुख सह-लेखकों में शामिल हैं। विभाग के डॉ. एस.के. शुक्ला, डॉ. देवेश प्रकाश यादव और डॉ. अनुराग कुमार तिवारी ने भी अध्ययन में महत्वपूर्ण योगदान दिया। एसजीपीजीआईएमएस, लखनऊ के डॉ. अमित गोयल इस शोध के प्रमुख अन्वेषकों में शामिल रहे और प्रकाशित शोध-पत्र के प्रथम लेखक हैं। देश के अन्य प्रमुख चिकित्सा एवं शोध संस्थानों के विशेषज्ञों के सहयोग से यह अध्ययन पूरा किया गया।

उपचार की अवधि कम होने से लागत घटने की उम्मीद

डॉ. विनोद कुमार के अनुसार, अध्ययन के निष्कर्ष उपयुक्त मरीजों में हेपेटाइटिस-सी के उपचार की अवधि कम करने की संभावनाओं को मजबूत करते हैं। चिकित्सकीय रूप से उपयुक्त मरीजों में आठ सप्ताह की चिकित्सा अपनाए जाने से दवा की लागत और मरीजों पर आर्थिक बोझ कम करने, स्वास्थ्य संसाधनों के बेहतर उपयोग तथा अधिक मरीजों तक उपचार पहुंचाने में मदद मिल सकती है।

हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि आठ सप्ताह का उपचार सभी हेपेटाइटिस-सी मरीजों पर लागू नहीं किया जा सकता। सिरोसिस, पूर्व उपचार या अन्य विशेष चिकित्सकीय परिस्थितियों वाले मरीजों में उपचार की अवधि का निर्धारण व्यक्तिगत चिकित्सकीय मूल्यांकन और वर्तमान उपचार दिशानिर्देशों के आधार पर किया जाना चाहिए।

अंतरराष्ट्रीय मंच पर बीएचयू की उपलब्धि

‘द लैंसेट’ जैसी प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय चिकित्सा शोध पत्रिका में इस अध्ययन का प्रकाशन आईएमएस-बीएचयू और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है। यह संस्थान के गैस्ट्रोलॉजी विभाग की उच्च गुणवत्ता वाले राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय नैदानिक शोध में सक्रिय भूमिका को रेखांकित करता है। अध्ययन के निष्कर्ष हेपेटाइटिस-सी के उपचार को अधिक प्रभावी, किफायती, सुलभ और मरीज-केंद्रित बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।

हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी