तीन लीटर दूध देने वाली गंगातीरी सरोगेट गाय ने दिया 14–16 लीटर क्षमता वाली साहीवाल बछिया को जन्म
वाराणसी, 21 अगस्त (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के वाराणसी स्थित काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के राजीव गांधी दक्षिणी परिसर, बरकछा स्थित पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान संकाय ने स्वदेशी गोवंश के संरक्षण और आनुवंशिक सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत वित्तपोषित सहायक प्रजनन तकनीक परियोजना के अंतर्गत शुक्रवार को भ्रूण प्रत्यारोपण तकनीक और सेक्स-सॉर्टेड सीमन के उपयोग से एक गंगातीरी सरोगेट गाय ने स्वस्थ साहीवाल बछिया को जन्म दिया। जन्म के समय बछिया का वजन 24 किलोग्राम रहा।
परियोजना से जुड़े वैज्ञानिकों के अनुसार, उच्च आनुवंशिक क्षमता वाले साहीवाल स्रोत से जन्मी इस बछिया में भविष्य में प्रतिदिन 14 से 16 लीटर तक दूध उत्पादन की क्षमता होने का अनुमान है। खास बात यह है कि जिस गंगातीरी गाय ने बछिया को जन्म दिया है, उसकी दुग्ध उत्पादन क्षमता करीब तीन लीटर प्रतिदिन है। इस तरह उन्नत प्रजनन तकनीक के माध्यम से उच्च दुग्ध क्षमता वाले आनुवंशिक गुणों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने में सफलता मिली है।
पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान संकाय के अधिष्ठाता डॉ. अमित राज गुप्ता और राजीव गांधी दक्षिणी परिसर के प्रभारी प्रोफेसर डॉ. बी. एम. एन. कुमार ने बताया कि यह परियोजना के तहत जन्मी सातवीं मादा बछिया है। उन्होंने बताया कि इस बछिया के जन्म की प्रक्रिया के लिए 11 नवंबर 2025 को उच्च दुग्ध उत्पादन क्षमता वाली साहीवाल गाय में सुपरओव्यूलेशन कराया गया था। इसके बाद श्रेष्ठ साहीवाल सांड के सेक्स-सॉर्टेड सीमन से कृत्रिम गर्भाधान कराया गया।
इस प्रक्रिया से छह उच्च गुणवत्ता वाले भ्रूण प्राप्त हुए, जिन्हें बाद में हार्मोनल रूप से सिंक्रोनाइज्ड रिसिपिएंट गायों में प्रत्यारोपित किया गया। इन्हीं में से एक भ्रूण से इस स्वस्थ साहीवाल बछिया का जन्म हुआ।
यह परियोजना प्रधान अन्वेषक डॉ. मनीष कुमार के निर्देशन में संचालित हो रही है। डॉ. कौस्तुभ किशोर सराफ और डॉ. अजीत सिंह सह-प्रधान अन्वेषक के रूप में परियोजना से जुड़े हैं।
बीएचयू के वित्त अधिकारी डॉ. मनोज कुमार पांडेय और कृषि विज्ञान संस्थान के निदेशक प्रो. वी. के. मिश्रा ने सरोगेट गाय और नवजात बछिया का निरीक्षण किया तथा फार्म की व्यवस्थाओं की समीक्षा की। उन्होंने शोध दल के प्रयासों की सराहना करते हुए परियोजना को और मजबूत करने के लिए प्रोत्साहित किया।
वैज्ञानिकों का कहना है कि सहायक प्रजनन तकनीकों के सफल उपयोग से उच्च आनुवंशिक क्षमता वाले स्वदेशी गोवंश की संख्या तेजी से बढ़ाई जा सकती है। इससे दुग्ध उत्पादन और पशुधन की गुणवत्ता में सुधार के साथ किसानों की आय बढ़ाने में भी मदद मिल सकती है।
परियोजना के अगले चरण में टीम ओवम पिक-अप, इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) और एम्ब्रियो ट्रांसफर जैसी उन्नत प्रजनन तकनीकों को अपनाने की दिशा में काम कर रही है। इन तकनीकों को विंध्य क्षेत्र के पशुपालकों तक पहुंचाने की भी योजना है। इसके माध्यम से गंगातीरी समेत अन्य स्वदेशी गोवंशीय नस्लों का तेजी से आनुवंशिक सुधार कर पशुपालकों की आर्थिक स्थिति मजबूत करने का लक्ष्य रखा गया है।
हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी
