Newzfatafatlogo

बीएचयू के दो पीएचडी शोधार्थियों ने दो स्वस्थ प्रेरित शक्तिशाली स्टेम सेल लाइनों को किया विकसित

 | 
बीएचयू के दो पीएचडी शोधार्थियों ने दो स्वस्थ प्रेरित शक्तिशाली स्टेम सेल लाइनों को किया विकसित


बीएचयू के दो पीएचडी शोधार्थियों ने दो स्वस्थ प्रेरित शक्तिशाली स्टेम सेल लाइनों को किया विकसित


— पार्किंसन और एएलएस के अध्ययन को मिलेगी नई दिशा, सीआरआईएसपीआर तकनीक से तैयार किए न्यूरोडीजेनेरेटिव रोगों के सटीक मॉडल

वाराणसी, 08 जुलाई (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के वाराणसी स्थित काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के विज्ञान संस्थान स्थित सेंटर फॉर जेनेटिक डिसऑर्डर्स के शोधकर्ताओं ने स्टेम सेल और जीनोम एडिटिंग के क्षेत्र में महत्वपूर्ण वैज्ञानिक उपलब्धि हासिल की है। शोध दल ने टाटा इंस्टीट्यूट फॉर जेनेटिक्स एंड सोसाइटी (टीआईजीएस), बेंगलुरु के सहयोग से दो स्वस्थ प्रेरित बहु-शक्तिशाली स्टेम सेल (इंड्यूस्ड प्लुरिपोटेंट स्टेम सेल- iPSC) लाइनें विकसित की हैं। साथ ही अत्याधुनिक सीआरआईएसपीआर/Cas9 जीनोम एडिटिंग तकनीक की मदद से पार्किंसन रोग और एमियोट्रोफिक लेटरल स्क्लेरोसिस (एएलएस) जैसे गंभीर न्यूरोडीजेनेरेटिव रोगों के सटीक प्रयोगशाला मॉडल भी तैयार किए हैं।

यह उपलब्धि बीएचयू के दो पीएचडी शोधार्थियों सूरजित मालाकार और शैलेयी रॉयचौधरी ने अपने शोधप्रबंध (थीसिस) कार्य के दौरान हासिल की है। इससे भारत में गंभीर तंत्रिका संबंधी रोगों के अध्ययन, उनकी कार्यप्रणाली को समझने और संभावित उपचार विकसित करने की दिशा में नई संभावनाएं खुलेंगी।

यह शोध बीएचयू और टीआईजीएस के बीच हुए एक ऐतिहासिक समझौता ज्ञापन (एमओयू) के तहत संपन्न हुआ। संयुक्त परियोजना का नेतृत्व बीएचयू के प्रो. परिमल दास (प्रधान अन्वेषक) और प्रो. (डॉ.) दीपिका जोशी (सह-प्रधान अन्वेषक) ने किया, जबकि टीआईजीएस की ओर से डॉ. वसंत थामोदरन ने सहयोग किया।

प्रो. परिमल दास ने बताया कि इस उपलब्धि की आधारशिला अत्याधुनिक कोशिकीय री-प्रोग्रामिंग तकनीक है। इसके तहत वयस्क मानव कोशिकाओं को 'यामानाका फैक्टर्स' नामक विशेष ट्रांसक्रिप्शन फैक्टर्स की मदद से उनकी प्रारंभिक भ्रूण-सदृश बहु-शक्तिशाली अवस्था में परिवर्तित किया गया। इस प्रक्रिया से विकसित iPSC लाइनें अनिश्चितकाल तक विभाजित होने के साथ मानव शरीर के लगभग किसी भी ऊतक में विकसित होने की क्षमता रखती हैं।

शोध की सबसे अहम विशेषता यह रही कि वैज्ञानिकों ने इन स्वस्थ iPSC लाइनों में सीआरआईएसपीआर/Cas9 तकनीक का उपयोग कर पार्किंसन और एएलएस से जुड़े विशिष्ट आनुवंशिक उत्परिवर्तनों को सम्मिलित किया। इससे प्रयोगशाला में इन रोगों के अत्यंत सटीक मॉडल तैयार किए गए, जिनके माध्यम से रोग के शुरुआती चरणों में होने वाले कोशिकीय परिवर्तनों का अध्ययन संभव हो सकेगा।

शोधकर्ताओं का कहना है कि विकसित स्वस्थ iPSC लाइनें भविष्य के अनुसंधानों के लिए एक महत्वपूर्ण 'कंट्रोल' संसाधन साबित होंगी। इनके माध्यम से वैज्ञानिक रोगी-विशिष्ट डिश में रोग (Disease-in-a-Dish) मॉडल विकसित कर सकेंगे, नई दवाओं की प्रभावशीलता और विषाक्तता का मानव परीक्षण से पहले मूल्यांकन कर सकेंगे तथा भविष्य में प्रत्यारोपण योग्य ऊतकों के विकास की दिशा में भी काम आगे बढ़ा सकेंगे।

शोध दल अब इन स्टेम कोशिकाओं की मदद से त्रि-आयामी सूक्ष्म अंग मॉडल (ऑर्गेनॉइड्स) विकसित करने की तैयारी कर रहा है। ये ऑर्गेनॉइड्स रोगग्रस्त ऊतकों की जीवंत प्रतिकृतियों के रूप में कार्य करेंगे, जिनकी सहायता से वैज्ञानिक वास्तविक समय में रोग की प्रगति का अध्ययन कर सकेंगे और न्यूरोडीजेनेरेशन के आणविक कारणों की बेहतर पहचान कर पाएंगे।

शोधकर्ताओं ने दो स्वस्थ iPSC लाइनों से संबंधित अध्ययन को प्री-प्रिंट प्लेटफॉर्म bioRxiv पर साझा किया है तथा इसे सहकर्मी-समीक्षित (Peer-reviewed) जर्नल में प्रकाशन के लिए भेजा गया है। वहीं, सीआरआईएसपीआर/Cas9 आधारित रोग मॉडलिंग से जुड़ा शोध भी शीघ्र ही किसी अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका में प्रकाशित होने की संभावना है।

हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी