खतरे में कूचबिहार की राजपरंपरा : 300-500 साल पुरानी तालपत्र पांडुलिपियां खोई तो मिट जाएगा पूजा का रहस्य
-संरक्षण के अभाव में मिटने की कगार पर कूचबिहार की सदियों पुरानी तालपत्र पांडुलिपियां, खतरे में पूजा की प्राचीन परंपरा
कूचबिहार, 22 सितंबर (हि.स.)। कूचबिहार में राजकालीन धार्मिक परंपरा की महत्वपूर्ण धरोहर मानी जाने वाली दो दुर्लभ तालपत्र पांडुलिपियां संरक्षण के अभाव में धीरे-धीरे नष्ट होने की कगार पर पहुंच गई हैं। इन पांडुलिपियों में दर्ज मंत्रों और पूजा-विधियों के आधार पर सदियों से मदनमोहन और बड़ादेवी की आराधना की जाती रही है। ऐसे में इनके पन्नों के पूरी तरह नष्ट होने पर इन प्राचीन पूजा-पद्धतियों को मूल शास्त्रीय विधि के अनुसार समझना और आगे जारी रखना मुश्किल हो सकता है।
कूचबिहार देवत्र ट्रस्ट बोर्ड के संरक्षण में रखी इन पांडुलिपियों को राजकालीन परंपरा से जुड़ी महत्वपूर्ण धरोहर माना जाता है। शोधकर्ताओं के एक वर्ग के अनुसार इनकी उम्र करीब 300 से 500 वर्ष तक हो सकती है। खासकर मदनमोहनबाड़ी में प्राचीन काल से चली आ रही तांत्रिक पूजा-पद्धति से इनके जुड़ाव को महत्वपूर्ण माना जाता है। यह पूजा सामान्य वैष्णव परंपरा से अलग बताई जाती है।
दुर्लभ मंत्रों की नहीं है दूसरी प्रति
इन पांडुलिपियों का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि तालपत्र पर लिखे दुर्लभ मंत्रों की कोई दूसरी प्रति उपलब्ध नहीं बताई जाती। इसलिए इनके नष्ट होने का अर्थ केवल एक प्राचीन दस्तावेज का समाप्त होना नहीं होगा, बल्कि उन मंत्रों और पूजा-विधियों से संबंधित मूल सामग्री का भी लुप्त होना होगा। पत्तियां पूरी तरह नष्ट होने पर भविष्य में इन मंत्रों और पूजा-विधि को मूल रूप में समझना तथा उसी शास्त्रीय प्रक्रिया के अनुसार पूजा करना बेहद कठिन हो सकता है।
प्राचीन लिपि में संस्कृत, कलात्मक आवरण भी खास
पांडुलिपियां संस्कृत भाषा में लिखी गई हैं, लेकिन इनमें इस्तेमाल लिपि पारंपरिक देवनागरी से अलग है। अक्षरों में प्राचीन बंगाल और कामरूपी शैली की झलक दिखाई देती है। इससे इनका महत्व धार्मिक होने के साथ-साथ ऐतिहासिक और भाषाई दृष्टि से भी बढ़ जाता है।
इनमें से एक पांडुलिपि करीब 18 इंच लंबी और छह इंच चौड़ी बताई जाती है। इसके ऊपर और नीचे लकड़ी के मजबूत आवरण लगे हैं। इन आवरणों पर कभी रंगीन बेल-बूटों की नक्काशी हुआ करती थी, लेकिन समय के साथ इसकी चमक फीकी पड़ गई है। आवरण के अंदर एक ओर बड़ादेवी के स्वरूप से मिलती-जुलती मां दुर्गा की तस्वीर बनी है, जबकि दूसरी ओर पुरुष योद्धाओं और दो वीरांगनाओं के बीच युद्ध का दृश्य अंकित है। इस कारण पांडुलिपि तत्कालीन कला और सांस्कृतिक परंपरा का भी महत्वपूर्ण प्रमाण मानी जाती है।
विशेष अवसरों पर ही निकाली जाती हैं पांडुलिपियां
इन पांडुलिपियों का इस्तेमाल रोजाना की पूजा में नहीं किया जाता। स्नान यात्रा और उत्थान एकादशी जैसे विशेष धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान एक पांडुलिपि को गर्भगृह से बाहर निकाला जाता है। दूसरी पांडुलिपि केवल बड़ादेवी की शारदीय पूजा के दौरान निकाली जाती है। वर्ष के अन्य समय इन्हें मदनमोहन के गर्भगृह में लाल कपड़े में लपेटकर सुरक्षित रखा जाता है।
2022 में शुरू हुई थी संरक्षण की पहल
पांडुलिपियों के संरक्षण की जरूरत को देखते हुए वर्ष 2022 में प्रशासनिक स्तर पर पहल शुरू हुई थी। हालांकि, आगे चलकर यह मामला कथित तौर पर फाइलों तक ही सीमित रह गया। इतने महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेजों के संरक्षण में देरी को लेकर अब सवाल उठ रहे हैं। लंबे समय तक वैज्ञानिक संरक्षण के अभाव में तालपत्र और उस पर लिखी स्याही के और क्षतिग्रस्त होने की आशंका बनी हुई है।
300 से 500 वर्ष पुरानी होने का अनुमान
इतिहास शोधकर्ता स्वप्नकुमार राय के मुताबिक इन पांडुलिपियों के कई सौ वर्ष पुराने होने में कोई संदेह नहीं है। उनके अनुसार महाराजा शिवेंद्रनारायण के समय बड़ादेवी की पूजा पद्धति में कुछ संशोधन हुए थे। संभव है कि उसी दौरान संबंधित पांडुलिपि को नए सिरे से लिखा गया हो। इस आधार पर एक पांडुलिपि की उम्र कम से कम 300 वर्ष होने की संभावना है।
उनका कहना है कि मदनमोहन से संबंधित पांडुलिपि इससे भी पुरानी हो सकती है। हालांकि, वास्तविक उम्र निर्धारित करने के लिए विशेषज्ञों की मदद से तालपत्र और उसमें इस्तेमाल की गई स्याही की कार्बन डेटिंग कराने की आवश्यकता है। इससे पांडुलिपियों की सही कालावधि निर्धारित करने में मदद मिल सकती है।
प्रशासन अब डिजिटाइजेशन और वैज्ञानिक संरक्षण करेगा
कूचबिहार के जिलाधिकारी जितिन यादव ने बताया कि उन्हें इस विषय की पहले जानकारी नहीं थी। उन्होंने कहा कि राजकालीन इन ऐतिहासिक पांडुलिपियों को किसी भी तरह नष्ट होने से बचाने के लिए जल्द से जल्द डिजिटाइजेशन और वैज्ञानिक तरीके से संरक्षण की व्यवस्था की जाएगी।
पांडुलिपियों के साथ जुड़ा है इतिहास
इन दोनों तालपत्र पांडुलिपियों का महत्व केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। इनके साथ कूचबिहार राजपरिवार की सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा, प्राचीन लिपि, कला, साहित्य और पूजा-पद्धति का इतिहास जुड़ा हुआ है। पांडुलिपियों में दर्ज सामग्री और उनके कलात्मक आवरण उस दौर के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन की भी झलक देते हैं।
ऐसे में इनके संरक्षण का सवाल केवल दो पुराने दस्तावेजों को बचाने का नहीं, बल्कि उनसे जुड़ी पूरी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने का है। यदि समय रहते इन्हें वैज्ञानिक तरीके से संरक्षित नहीं किया गया, तो तालपत्र के साथ इतिहास के कई अनमोल पन्ने भी हमेशा के लिए खो सकते हैं।--------------
हिन्दुस्थान समाचार / सचिन कुमार
