(विशेष) बाल विवाह के मोर्चे पर देश में सबसे पिछड़ा राज्य बंगाल, हर दो में से एक लड़की की शादी 18 से पहले
कोलकाता, 14 सितंबर (हि.स.)। पश्चिम बंगाल में बाल विवाह से संबंधित आंकड़े भयभीत करने वाले हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (एनएफएचएस-5) के अनुसार देश में जहां 20-24 वर्ष आयु वर्ग की 23.3 प्रतिशत महिलाओं की शादी 18 वर्ष की कानूनी उम्र से पहले हुई, वहीं पश्चिम बंगाल में यह आंकड़ा करीब 42 प्रतिशत है। यानी राज्य में लगभग हर दो में से एक लड़की की शादी बालिग होने की कानूनी उम्र पूरी करने से पहले हो जाती है। बाल विवाह के मामले में पश्चिम बंगाल देश के सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले राज्यों में शीर्ष पर है।
बाल विवाह को लेकर राज्य की मौजूदा स्थिति पर विपक्षी पार्टियों की ओर से लंबे समय से सवाल उठाए जाते रहे हैं। राजनीतिक स्तर पर यह आरोप लगाया जाता रहा है कि 34 साल के वाममोर्चा शासन और उसके बाद करीब 15 साल की ममता बनर्जी सरकार के दौरान बाल विवाह रोकने के लिए प्रभावी और स्थायी व्यवस्था नहीं बनाई गई। आरोप लगाने वालों का कहना है कि सरकारी योजनाओं और जागरूकता अभियानों के बावजूद जमीनी स्तर पर समस्या बनी रही और पश्चिम बंगाल आज भी देश के सबसे अधिक बाल विवाह वाले राज्यों में शामिल है।
एनएफएचएस-5 के आंकड़े इस समस्या की गंभीरता को स्पष्ट करते हैं। वर्ष 2019-21 में देश में 20-24 वर्ष आयु वर्ग की 23.3 प्रतिशत महिलाओं का विवाह 18 वर्ष से पहले हुआ था, जबकि पश्चिम बंगाल में यह अनुपात 41.6 प्रतिशत रहा। बिहार में यह आंकड़ा 40.8 प्रतिशत और त्रिपुरा में 40.1 प्रतिशत था। इस तरह पश्चिम बंगाल राष्ट्रीय औसत से लगभग दोगुने स्तर पर खड़ा है।
ग्रामीण बंगाल में स्थिति अधिक गंभीरराज्य में ग्रामीण क्षेत्रों में बाल विवाह की स्थिति शहरी क्षेत्रों की तुलना में कहीं अधिक गंभीर है। ग्रामीण पश्चिम बंगाल में करीब 48 प्रतिशत महिलाओं की शादी 18 वर्ष से पहले हुई, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह आंकड़ा करीब 26 प्रतिशत रहा। गरीबी और बाल विवाह के बीच भी सीधा संबंध दिखाई देता है। सबसे गरीब परिवारों में 18 वर्ष से पहले शादी का अनुपात 56 प्रतिशत तक पहुंचता है, जबकि सबसे संपन्न परिवारों में यह 13 प्रतिशत है। शिक्षा का असर भी बेहद स्पष्ट है। बिना शिक्षा या प्राथमिक स्तर से कम शिक्षा वाली महिलाओं में 18 वर्ष से पहले विवाह का अनुपात 58 प्रतिशत था, जबकि उच्च शिक्षा हासिल करने वाली महिलाओं में यह केवल 4 प्रतिशत रहा।
मुस्लिम समुदाय के आंकड़े चिंताजनकधर्म के आधार पर उपलब्ध कच्चे आंकड़ों में पश्चिम बंगाल में 18 वर्ष से पहले विवाह करने वाली महिलाओं का अनुपात मुस्लिम समुदाय में 45.2 प्रतिशत और हिंदू समुदाय में 40.3 प्रतिशत है। यानी कच्चे आंकड़ों में मुस्लिम समुदाय में बाल विवाह की दर अधिक दिखाई देती है। हालांकि, एनएफएचएस-5 आधारित यूएनएफपीए के विश्लेषण में शिक्षा, आर्थिक स्थिति और ग्रामीण-शहरी निवास जैसे कारकों को नियंत्रित करने के बाद मुस्लिम समुदाय में बाल विवाह की संभावना हिंदू समुदाय की तुलना में थोड़ी कम पाई गई। यह अंतर सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण भी नहीं था। इससे साफ होता है कि समस्या को केवल धार्मिक आधार पर देखने के बजाय गरीबी, शिक्षा और ग्रामीण परिवेश जैसे कारकों को भी साथ में देखना जरूरी है।
हालात पर चिंता जता चुके हैं मुख्यमंत्री
मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने गत 11 सितंबर को राम कथा के एक कार्यक्रम में बाल विवाह को लेकर चिंता जताई थी और इसके खिलाफ राज्य सरकार की ओर से कड़े कदम उठाने की बात कही थी। उन्होंने खास तौर पर मुस्लिम समुदाय का उल्लेख करते हुए कहा था कि कानून को दरकिनार कर बड़ी संख्या में नाबालिग लड़कियों की शादी और उनके मां बनने के मामलों को रोकने के लिए सरकार सख्ती करेगी। मुख्यमंत्री की इस घोषणा के बाद स्वास्थ्य विभाग ने 18 वर्ष से कम उम्र की गर्भवती लड़कियों के इलाज और निगरानी के लिए विशेष मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) तैयार करने की कवायद शुरू कर दी है।
नाबालिग गर्भावस्था पर अब स्वास्थ्य विभाग की नजरबाल विवाह के बाद सबसे गंभीर स्थिति तब पैदा होती है जब नाबालिग लड़की गर्भवती हो जाती है। इसी चुनौती से निपटने के लिए स्वास्थ्य विभाग 18 वर्ष से कम उम्र की गर्भवती लड़कियों के लिए अलग एसओपी तैयार कर रहा है।
राज्य स्वास्थ्य विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम उजागर नहीं करने की शर्त पर हिन्दुस्थान समाचार को बताया कि इसके लिए 9 सदस्यीय विशेषज्ञ समिति बनाई गई है। समिति में कम्युनिटी मेडिसिन विशेषज्ञ, स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी शामिल हैं। समिति की पहली बैठक 18 सितंबर को होगी। प्रस्तावित एसओपी में गर्भावस्था की पुष्टि होते ही नाबालिग को स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ के पास ले जाने, नियमित प्रसवपूर्व जांच, मातृ जोखिम की पहचान, एनीमिया और कुपोषण का प्रबंधन, हाई रिस्क मामलों को उच्च चिकित्सा केंद्र में रेफर करने, सुरक्षित प्रसव तथा प्रसव के बाद मां और बच्चे की निगरानी जैसे प्रावधान शामिल किए जाएंगे।
स्वास्थ्य मंत्री डॉ. शारद्वत मुखर्जी का कहना है कि 18 वर्ष से कम उम्र में गर्भधारण करने वाली लड़कियों में गर्भावस्था के दौरान गंभीर स्वास्थ्य जोखिम पैदा हो सकते हैं। इसलिए ऐसे मामलों में समय पर चिकित्सा निगरानी और विशेषज्ञ उपचार बेहद जरूरी है।
प्रशासन की सख्ती के संकेतबाल विवाह के खिलाफ प्रशासन की सख्ती हाल के मामलों में भी दिखाई दे रही है। मुर्शिदाबाद में नाबालिग लड़कियों की शादी रोकने के लिए पुलिस और प्रशासन की ओर से कार्रवाई की गई है। फरक्का और शमशेरगंज जैसे इलाकों में नाबालिग विवाह की कोशिशों को रोककर पुलिस ने संबंधित लोगों के खिलाफ कार्रवाई की। इससे संकेत मिलता है कि सरकार अब बाल विवाह के मामलों में केवल जागरूकता तक सीमित रहने के बजाय मौके पर हस्तक्षेप और कानूनी कार्रवाई पर भी जोर दे रही है।
बाल विवाह से कम उम्र में मातृत्व तकबाल विवाह का सबसे गंभीर परिणाम कम उम्र में गर्भधारण है। किशोरावस्था में गर्भधारण होने पर एनीमिया, कुपोषण, गर्भावस्था और प्रसव संबंधी जटिलताओं का खतरा बढ़ सकता है। यही वजह है कि स्वास्थ्य विभाग की नई एसओपी को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसका उद्देश्य नाबालिग गर्भवती की जल्द पहचान से लेकर प्रसव और प्रसवोत्तर देखभाल तक पूरी चिकित्सा प्रक्रिया को एक समान प्रोटोकॉल के तहत लाना है।
क्या कहना है एक्सपर्ट कापिछले दो दशक से महिला अधिकार और बाल सुरक्षा के क्षेत्र में काम कर रहे समाजसेवी कमलाकर गुप्ता कहते हैं, “बाल विवाह केवल एक सामाजिक या कानूनी समस्या नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर किशोरियों के स्वास्थ्य, शिक्षा और भविष्य को प्रभावित करता है। कम उम्र में गर्भधारण होने पर एनीमिया, कुपोषण, गर्भावस्था और प्रसव संबंधी जटिलताओं का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए ऐसी लड़कियों की जल्द पहचान, नियमित एंटीनेटल देखभाल और जरूरत पड़ने पर उच्च चिकित्सा केंद्र में रेफरल बेहद जरूरी है। साथ ही बाल विवाह रोकने के लिए शिक्षा और परिवार की आर्थिक स्थिति में सुधार पर समान रूप से ध्यान देना होगा।”
पश्चिम बंगाल में बाल विवाह के आंकड़े राष्ट्रीय औसत से लगभग दोगुने हैं। ऐसे में नई एसओपी का महत्व केवल नाबालिग गर्भवती के इलाज तक सीमित नहीं है। असली चुनौती यह होगी कि प्रशासन बाल विवाह की पहचान और रोकथाम से लेकर नाबालिग मातृत्व की स्थिति तक पूरी व्यवस्था को कितनी प्रभावी तरीके से जमीन पर लागू करता है।--------------
हिन्दुस्थान समाचार / ओम पराशर
