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पीढ़ियों से मिट्टी में गढ़ रहे बप्पा की तस्वीर, महंगाई के बीच भी गणेश प्रतिमाओं को अंतिम रूप दे रहे बंगाली कारीगर

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पीढ़ियों से मिट्टी में गढ़ रहे बप्पा की तस्वीर, महंगाई के बीच भी गणेश प्रतिमाओं को अंतिम रूप दे रहे बंगाली कारीगर


पीढ़ियों से मिट्टी में गढ़ रहे बप्पा की तस्वीर, महंगाई के बीच भी गणेश प्रतिमाओं को अंतिम रूप दे रहे बंगाली कारीगर


बलरामपुर, 31 अगस्त (हि.स.)।गणेशोत्सव में अब कुछ ही दिन बाकी हैं और बलरामपुर जिले में इसकी तैयारियां शुरू हो गई हैं। बाजारों में सजावट का सामान पहुंचने लगा है तो दूसरी ओर रामानुजगंज और आसपास के इलाकों में मूर्तिकार भगवान गणेश की प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने में जुटे हैं। खास बात यह है कि यहां हर साल पश्चिम बंगाल से आने वाले कारीगर अपने हाथों से गणेश प्रतिमाएं तैयार करते हैं। मिट्टी, बांस, रस्सी और रंगों के सहारे तैयार होने वाली ये प्रतिमाएं अब लोगों की पसंद बन चुकी हैं।

इस बार 14 सितंबर को गणेश चतुर्थी के साथ गणेशोत्सव की शुरुआत होगी। इसे देखते हुए मूर्तिकारों ने कई दिन पहले से ही प्रतिमाओं का निर्माण शुरू कर दिया है। रामानुजगंज के आसपास रहने वाले बंगाली परिवारों के लिए मूर्ति निर्माण केवल रोजी-रोटी का साधन नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही पारंपरिक कला भी है।

करीब 80 वर्षीय मूर्तिकार दिलीप सरकार बताते हैं कि उन्होंने बचपन से ही अपने पिता को मूर्तियां बनाते देखा और इसी काम को सीखते हुए बड़े हुए। समय के साथ उन्होंने यही हुनर अपने बेटे को सिखाया और अब अगली पीढ़ी भी इस परंपरा को आगे बढ़ा रही है।

दिलीप सरकार के मुताबिक इस साल उन्होंने करीब 60 से 65 गणेश प्रतिमाएं तैयार की हैं। अलग-अलग आकार और डिजाइन के हिसाब से इनकी कीमत करीब 1,500 रुपये से लेकर 8 हजार रुपये तक रखी गई है। गणेशोत्सव में अभी समय है, लेकिन कई प्रतिमाओं की बुकिंग पहले ही शुरू हो चुकी है। उनका कहना है कि इस बार लोगों में गणेश प्रतिमाओं को लेकर उत्साह अच्छा है और मांग भी पिछले साल की तुलना में अधिक दिखाई दे रही है।

गणेश प्रतिमा तैयार करना जितना मेहनत का काम है, उतना ही इसमें इस्तेमाल होने वाली सामग्री की कीमत भी मूर्तिकारों के लिए बड़ी चुनौती बन गई है। युवा मूर्तिकार दीपांकर बताते हैं कि इस बार सामग्री महंगी होने के कारण लागत काफी बढ़ गई है। यही वजह है कि कई कारीगर मांग होने के बावजूद ज्यादा प्रतिमाएं तैयार नहीं कर पा रहे हैं।

मूर्तियों का ढांचा तैयार करने में इस्तेमाल होने वाली सुतली और रस्सी की कीमत में काफी बढ़ोतरी हुई है। दीपांकर के अनुसार पहले सुतली रस्सी करीब 110 रुपये किलो मिल जाती थी, लेकिन अब इसकी कीमत करीब 300 रुपये किलो तक पहुंच गई है। इसके अलावा बांस, खूंटा और लकड़ी जैसी सामग्री भी बाहर से मंगानी पड़ती है।

प्रतिमा तैयार करने में मिट्टी की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। स्थानीय मिट्टी के साथ बाहर से मंगाई जाने वाली गंगा मिट्टी का उपयोग किया जाता है। इसके बाद प्रतिमा को आकार देने, सुखाने, रंग करने और सजाने की अलग-अलग प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है।

मूर्तिकारों का कहना है कि लागत बढ़ने के बावजूद गणेश प्रतिमाओं की मांग बनी हुई है। हालांकि इस बार कुछ कारीगरों ने संख्या सीमित कर दी है। दीपांकर बताते हैं कि वे इस बार केवल चार से पांच प्रतिमाएं ही तैयार कर रहे हैं, क्योंकि बढ़ती लागत में ज्यादा प्रतिमाएं बनाना जोखिम भरा हो गया है।

रामानुजगंज में इन कारीगरों की मौजूदगी गणेशोत्सव की तैयारियों को अलग पहचान देती है। एक तरफ जहां बाजार में मशीनों से बनी और अलग-अलग डिजाइन की प्रतिमाएं उपलब्ध हैं, वहीं दूसरी ओर हाथों से मिट्टी को आकार देकर तैयार की गई पारंपरिक प्रतिमाओं की अपनी अलग मांग है।

इन कारीगरों के लिए हर गणेश प्रतिमा महज एक मूर्ति नहीं, बल्कि उनकी मेहनत, हुनर और कई पीढ़ियों की विरासत है। मिट्टी को आकार देते इन हाथों के जरिए न सिर्फ भगवान गणेश की प्रतिमाएं तैयार हो रही हैं, बल्कि एक पुरानी लोक कला भी नई पीढ़ी तक पहुंच रही है।

हिन्दुस्थान समाचार / विष्णु पांडेय