सुप्रीम कोर्ट में नेताओं की आपराधिक पृष्ठभूमि पर नियमों की मांग
सरकारी नौकरी की तैयारी में FIR का असर
यदि आप सिविल सेवा या किसी सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे हैं और आपके खिलाफ FIR दर्ज होती है, तो परीक्षा पास करने के बाद भी आपको जॉइनिंग लेटर पाने में काफी समय लग सकता है। सरकारी विभागों का दृष्टिकोण आपराधिक पृष्ठभूमि के मामलों में बहुत सख्त होता है।
जब तक पुलिस अपनी जांच पूरी नहीं कर लेती या कोर्ट का फैसला नहीं आता, तब तक विभाग आपका जॉइनिंग लेटर रोक सकता है। आपकी मेहनत वेरिफिकेशन प्रक्रिया में अटक सकती है, लेकिन क्या नेताओं के लिए भी यही नियम लागू होते हैं?
जनहित याचिका का दायर होना
सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है, जिसमें नेताओं के लिए भी समान नियम और शर्तें लागू करने की मांग की गई है। यह याचिका दिल्ली के झरोदा कलां निवासी दिलीप कुमार शर्मा द्वारा दायर की गई है। याचिका संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत 3 अक्टूबर 2026 को वकील अनिल कुमार के माध्यम से प्रस्तुत की गई है। इसमें केंद्र सरकार को पक्षकार बनाया गया है। याचिकाकर्ता ने खुद को मानवाधिकार कार्यकर्ता बताया है।
PM, CM और मंत्रियों के लिए मानक तय करने की मांग
याचिका में कहा गया है कि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और मंत्रियों के चयन के लिए अनुच्छेद 75(1) और 164(1) के तहत निर्णय लिया जाता है, लेकिन आपराधिक मामलों के लिए कोई स्पष्ट मानक नहीं है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि इसी कारण गंभीर अपराधों में आरोपित लोग भी मंत्री बन जाते हैं। उन्होंने कोर्ट से सुरक्षा उपायों की मांग की है।
आपराधिक पृष्ठभूमि वाले मंत्रियों के विभागों पर रोक
याचिका में यह भी कहा गया है कि जिन मंत्रियों पर अदालत गंभीर अपराधों के आरोप तय कर चुकी है, उन्हें गृह, वित्त या न्याय जैसे महत्वपूर्ण विभाग नहीं दिए जाने चाहिए। यह तर्क दिया गया है कि ऐसे विभाग उसी पुलिस और जांच एजेंसियों पर नियंत्रण रखते हैं, जो मंत्री के खिलाफ मामले की जांच कर रही होती हैं।
अंतरिम राहत की मांग
याचिकाकर्ता ने अंतरिम राहत की भी मांग की है, जिसमें जांच कर रहे पुलिस अधिकारियों और अभियोजकों की तैनाती और अनुशासनात्मक कार्रवाई को मंत्री के विभाग से अलग रखने की बात कही गई है। यह जिम्मेदारी किसी न्यायिक अधिकारी या उच्च न्यायालय की निगरानी में देने का सुझाव दिया गया है।
दागी मंत्रियों की संख्या
याचिका में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) के 2025 के विश्लेषण का उल्लेख किया गया है, जिसमें बताया गया है कि 27 राज्य विधानसभाओं, तीन केंद्र शासित प्रदेशों और केंद्रीय मंत्रिपरिषद के 643 मंत्रियों में से 302 यानी 47 प्रतिशत ने आपराधिक मामले लंबित बताए हैं।
मुख्यमंत्रियों पर आपराधिक मामले
बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और शुभेंदु अधिकारी के खिलाफ भी कई आपराधिक मामले दर्ज हैं। याचिका में यह चिंता जताई गई है कि उम्मीदवारों के चयन में लोकप्रियता, फिल्मी पहचान या पैसे की ताकत हावी हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णय का संदर्भ
याचिका में सुप्रीम कोर्ट के 2014 के मनोज नरूला मामले का भी उल्लेख किया गया है, जिसमें कोर्ट ने मंत्री बनाने पर रोक लगाने से इनकार किया था। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह भरोसा अब तक कायम नहीं रहा है।
