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अमेरिका का रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर टैरिफ लगाने का प्रस्ताव

अमेरिका ने रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100% टैरिफ लगाने का प्रस्ताव पेश किया है, जिसमें भारत और चीन शामिल हैं। यह कदम रूस के तेल कारोबार पर आर्थिक दबाव डालने के उद्देश्य से उठाया गया है। यदि यह बिल पारित होता है, तो अमेरिका पहली बार किसी देश पर केवल इसलिए टैरिफ लगाएगा क्योंकि वह रूस से तेल खरीद रहा है। जानें इस बिल के पीछे की राजनीति और इसके संभावित प्रभावों के बारे में।
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अमेरिका की नई टैरिफ नीति


नई दिल्ली। अमेरिका ने रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर फिर से कड़ी कार्रवाई करने की योजना बनाई है। अमेरिकी सीनेट में एक नया बिल पेश किया गया है, जिसमें भारत, चीन और अन्य देशों पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने का प्रस्ताव है। इसमें हंगरी, स्लोवाकिया और अजरबैजान भी शामिल हैं।


इस बिल के अनुसार, इन देशों से आने वाले सामान पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाया जा सकेगा। इसके साथ ही, रूस की ऊर्जा, वित्तीय और रक्षा क्षेत्रों पर नए प्रतिबंध लगाने का भी प्रावधान है। पहले इस बिल के मसौदे में 500 प्रतिशत टैरिफ लगाने का सुझाव था, लेकिन इसे बाद में घटाकर 100 प्रतिशत कर दिया गया।


यदि यह बिल पारित होता है, तो अमेरिका पहली बार किसी देश पर केवल इसलिए टैरिफ लगाएगा क्योंकि वह रूस से तेल खरीदकर उसकी आय बढ़ा रहा है। इसका उद्देश्य रूस के तेल उद्योग पर आर्थिक दबाव डालना और उसकी युद्ध लड़ने की क्षमता को कमजोर करना है।


भारत ने जून 2026 में रूस से रिकॉर्ड 26.1 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल खरीदा, जो देश के कुल तेल आयात का 52.4 प्रतिशत था। इसका मतलब है कि पिछले महीने भारत में आयात होने वाले हर दो बैरल तेल में एक बैरल से अधिक रूस से आया। रूस लगातार भारत का सबसे बड़ा तेल सप्लायर बना हुआ है, और जून में रूस से तेल आयात में लगभग 39 प्रतिशत की वृद्धि हुई।


यूरोपीय देशों को राहत


सीनेट में पेश किए गए बिल के तहत 15 यूरोपीय देशों को प्रस्तावित 100 प्रतिशत टैरिफ से छूट दी गई है। ये देश रूस से 15 प्रतिशत से कम प्राकृतिक गैस खरीदते हैं और धीरे-धीरे अपनी निर्भरता कम कर रहे हैं।


डेमोक्रेट सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने कहा कि यह बिल यूरोपीय सहयोगियों के खिलाफ नहीं है। इसका लक्ष्य केवल वे देश हैं जो अभी भी रूस के तेल कारोबार को सबसे अधिक आर्थिक सहायता दे रहे हैं। इस बिल में रूस के ऊर्जा उद्योग, वित्तीय संस्थानों, रक्षा औद्योगिक ढांचे, कारोबारियों और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव है।


बिल को दोनों दलों का समर्थन


सीनेट में पेश किए गए रूस-विरोधी टैरिफ बिल को रिपब्लिकन और डेमोक्रेट, दोनों दलों का समर्थन प्राप्त है। इसे अमेरिकी राजनीति में 'बाइपार्टिसन बिल' कहा जाता है। आमतौर पर अमेरिका में कई बड़े विधेयक राजनीतिक मतभेदों के कारण अटक जाते हैं, लेकिन जब दोनों दल किसी बिल के साथ खड़े होते हैं, तो उसके कांग्रेस से पारित होने की संभावना बढ़ जाती है। हालांकि, इस बिल को कानून बनने के लिए अभी सीनेट और प्रतिनिधि सभा से मंजूरी लेनी होगी। इसके बाद राष्ट्रपति के हस्ताक्षर से यह कानून बनेगा।


बिल का प्रस्तावक


इस बिल को सबसे पहले रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम और डेमोक्रेट सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने अप्रैल 2025 में पेश किया था। अब तक 26 सीनेटर इस बिल का समर्थन कर चुके हैं और आगे समर्थन बढ़ने की उम्मीद है।


11 जुलाई को लिंडसे ग्राहम का निधन हो गया था। निधन से एक दिन पहले उन्होंने यूक्रेन दौरे के दौरान कहा था कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प इस बिल को आगे बढ़ाने पर सहमत हो गए हैं। ट्रम्प ने भी व्हाइट हाउस में कहा कि यह लिंडसे के सम्मान में है। यह उनका सबसे बड़ा मुद्दा था और इसके कानून बनने की अच्छी संभावना है। कैपिटल हिल में हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में रिपब्लिकन और डेमोक्रेट, दोनों दलों के सीनेटर एक साथ नजर आए। उन्होंने इस बिल को ग्राहम के लिए श्रद्धांजलि बताया।