अमेरिकी नौसेना की कार्रवाई पर भारत में आक्रोश: क्या चीन और रूस को मजबूत मानता है अमेरिका?
अमेरिकी हमलों का प्रभाव
फारस की खाड़ी में अमेरिकी नौसेना की कार्रवाई ने भारत में आक्रोश पैदा कर दिया है। ओमान की खाड़ी में तीन विदेशी झंडे वाले वाणिज्यिक टैंकरों पर हमलों में तीन भारतीयों की जान गई है। यह घटनाएं नरेंद्र मोदी सरकार की विदेश नीति पर गंभीर सवाल उठाती हैं। अमेरिका और भारत खुद को 'प्रमुख रक्षा भागीदार' मानते हैं, फिर भी अमेरिकी नौसेना ने भारतीय नाविकों की जान लेते हुए अंतरराष्ट्रीय जल में वाणिज्यिक टैंकरों पर मिसाइलें दागीं।
यह स्पष्ट है कि अमेरिकी नौसेना को उन टैंकरों के चालक दल के बारे में जानकारी थी, जिनमें भारतीय सदस्य शामिल थे। इसके बावजूद, उन्होंने भारतीयों की जान की परवाह नहीं की। यह घटना पिछले मार्च में हुई उस घटना की याद दिलाती है, जब अमेरिकी नौसेना ने भारतीय तट के निकट एक ईरानी युद्धपोत को डुबो दिया था। उस जहाज ने भारत में एक नौसैनिक अभ्यास में भाग लिया था।
भारत सरकार की उस समय की चुप्पी पर सवाल उठते हैं। यदि भारत ने उस समय विरोध जताया होता, तो शायद ओमान की खाड़ी में भारतीय नाविकों को निशाना बनाने से पहले अमेरिकी नौसेना को पुनर्विचार करना पड़ता। यह भी ध्यान देने योग्य है कि अमेरिका जिन जहाजों को 'शैडो फ्लीट' कहता है, उनमें से कई चीन और रूस से जुड़े हैं। 13 अप्रैल को डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन ने होरमुज जलडमरुमद्य की नौसैनिक नाकेबंदी शुरू की थी, लेकिन अमेरिकी सेना ने चीन या रूस से संबंधित किसी टैंकर पर हमला नहीं किया। इसका क्या कारण है? क्या अमेरिका उन देशों को मजबूत और भारत को कमजोर मानता है?
