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आंध्र प्रदेश में 1,600 वर्ष पुरानी गणेश प्रतिमाएं मिलीं, पुरातत्व में नई खोज

आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले में एक किसान के खेत से 1,600 वर्ष पुरानी भगवान गणेश की दो छोटी प्रतिमाएं मिली हैं। यह खोज पुरातत्व जगत में उत्सुकता का विषय बन गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि ये प्रतिमाएं चौथी शताब्दी के आनंद गोत्रिका राजवंश से संबंधित हैं। इसके साथ ही, मिट्टी के बर्तनों के अवशेष भी मिले हैं, जो प्रारंभिक ऐतिहासिक काल के महत्वपूर्ण साक्ष्य हैं। जानें इस खोज के महत्व और आगे की संभावनाओं के बारे में।
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प्राचीन गणेश प्रतिमाओं की खोज


आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले में एक किसान के खेत से भगवान गणेश की दो छोटी प्रतिमाएं मिली हैं, जो लगभग 1,600 वर्ष पुरानी मानी जा रही हैं। यह खोज मंगलगिरि मंडल के काजा गांव में हुई, जब किसान सिम्हाद्री वेंकटरामा रेड्डी अपने खेत की जुताई कर रहे थे। हल एक मिट्टी के टीले से टकराने पर ये प्राचीन प्रतिमाएं बाहर आईं।


छोटे आकार की, लेकिन ऐतिहासिक महत्व की

दोनों गणेश प्रतिमाएं आकार में छोटी हैं, जिनमें से एक लगभग 3 सेंटीमीटर और दूसरी 5 सेंटीमीटर ऊंची है। विशेषज्ञों के अनुसार, ये लाल बलुआ पत्थर (चिंतामणि पत्थर) से बनाई गई हैं। इसके अलावा, प्रतिमाओं के साथ कई प्राचीन मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े भी मिले हैं, जिन्हें प्रारंभिक ऐतिहासिक काल का महत्वपूर्ण अवशेष माना जा रहा है।


प्राचीन काल का संबंध

डॉ. इमानी शिवनागी रेड्डी, जो पुरातत्व विशेषज्ञ हैं, के अनुसार मिले हुए मिट्टी के बर्तनों के अवशेष पहली से चौथी शताब्दी ईस्वी के बीच के प्रतीत होते हैं। गणेश प्रतिमाओं की शैली का अध्ययन करने के बाद, उन्होंने इन्हें चौथी शताब्दी के आनंद गोत्रिका राजवंश से संबंधित बताया है।


चेजारला मंदिर की प्रतिमा से समानता

डॉ. रेड्डी ने बताया कि इन प्रतिमाओं की शिल्प शैली पलनाडु जिले के चेजारला स्थित कपोतेश्वर मंदिर में स्थापित संगमरमर की प्राचीन गणेश प्रतिमा से मेल खाती है। इसी आधार पर उन्होंने अनुमान लगाया कि ये प्रतिमाएं उस समय की हैं, जब आनंद गोत्रिका वंश की राजधानी कंदरपुरा (वर्तमान चेजारला) हुआ करती थी।


संरक्षण और आगे की खुदाई की आवश्यकता

विशेषज्ञों ने इस खोज को ऐतिहासिक और पुरातात्विक दृष्टि से महत्वपूर्ण बताया है। डॉ. रेड्डी ने किसान से अपील की है कि प्रतिमाओं और अन्य मिले अवशेषों को सुरक्षित रखा जाए, ताकि भविष्य में इन पर विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन किया जा सके। उनका मानना है कि इस क्षेत्र में व्यवस्थित पुरातात्विक सर्वेक्षण और खुदाई से प्राचीन सभ्यता और धार्मिक परंपराओं से जुड़े कई और महत्वपूर्ण साक्ष्य सामने आ सकते हैं।