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ई-20 पेट्रोल: किसानों के सम्मान का नया बहाना या महंगाई का खेल?

ई-20 पेट्रोल के इथेनॉल मिश्रण का उद्देश्य कच्चे तेल के आयात को कम करना और सस्ता पेट्रोल उपलब्ध कराना था। लेकिन क्या यह सच में किसानों के लिए फायदेमंद है? इस लेख में हम इस मुद्दे की गहराई में जाएंगे और जानेंगे कि कैसे सरकार अपने निर्णयों को सही ठहराने के लिए तर्कों का सहारा लेती है। क्या यह किसानों के सम्मान का मामला है या महंगाई का एक नया बहाना? जानें पूरी कहानी।
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ई-20 पेट्रोल का जटिल सच


भारतीय जनता पार्टी और केंद्र सरकार के निर्णयों को लेकर एक बात स्पष्ट है। वे अपने निर्णयों को सही ठहराने के लिए किसी भी तर्क का सहारा ले सकते हैं। यह जरूरी नहीं कि वे हमेशा प्राथमिक तर्क पर ही टिके रहें। आमतौर पर, कोई भी व्यक्ति या सरकार अपने निर्णय को सही ठहराने के लिए प्राथमिक तर्क पर तब तक अड़ी रहती है जब तक कि उनका निर्णय उसी पर आधारित हो। लेकिन यहां स्थिति उलट है। निर्णय पहले लिया जाता है और उसके बाद उसे न्यायसंगत ठहराने के लिए तर्क खोजे जाते हैं। नोटबंदी के समय भी ऐसा ही हुआ था, जब विभिन्न तर्कों के माध्यम से इसे सही ठहराया गया था। प्रारंभिक तर्क काला धन रोकना था, लेकिन बाद में कई अन्य तर्क सामने आए। आज, उस समय की तुलना में नकदी का प्रवाह दोगुना हो चुका है।


इसी तरह, ई-20 पेट्रोल के मामले में भी यही स्थिति है। पेट्रोल में इथेनॉल का मिश्रण इसलिए शुरू किया गया था ताकि कच्चे तेल के आयात का खर्च कम हो सके और उपभोक्ताओं को सस्ता पेट्रोल मिल सके। लेकिन न तो आयात का खर्च कम हुआ और न ही पेट्रोल की कीमतें। जब इथेनॉल मिश्रण की शुरुआत हुई थी, तब पेट्रोल की कीमत लगभग 60 रुपये प्रति लीटर थी, और अब जब ई-20 पेट्रोल सामान्य पेट्रोल के रूप में उपलब्ध हो गया है, तो इसकी कीमत दोगुनी हो गई है। आयात का खर्च भी बढ़ा है। अब इसे किसानों के सम्मान और देश के गर्व के नाम पर बेचा जाएगा। भारतीय जनता पार्टी के राज्यसभा सांसद विनोद तावड़े ने सोशल मीडिया पर लिखा है, 'ई-20 हर बूंद में किसान का सम्मान, हर सफर में आत्मनिर्भर भारत का अभिमान'। इसका मतलब है कि अब इथेनॉल मिश्रण को किसानों की भलाई के नाम पर सही ठहराया जाएगा। यह सोचने वाली बात है कि किसानों की भलाई के नाम पर तंबाकू लॉबी भी प्रचार करती है।