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उच्चतम न्यायालय ने चुनाव आयुक्त के निलंबन की याचिका पर कोई अंतरिम आदेश नहीं दिया

उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के निलंबन की मांग वाली याचिका पर कोई एकतरफा अंतरिम आदेश देने से इनकार कर दिया। न्यायालय ने पहले चुनाव आयोग और अन्य प्रतिवादियों की सुनवाई करने का निर्णय लिया है। याचिकाकर्ता ने मताधिकार की सुरक्षा के लिए तत्काल कदम उठाने की आवश्यकता बताई है। जानें इस मामले में और क्या हुआ।
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मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ याचिका पर सुनवाई


सोमवार को उच्चतम न्यायालय ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को निलंबित करने की मांग वाली याचिका पर कोई एकतरफा अंतरिम आदेश देने से मना कर दिया।


न्यायालय ने स्पष्ट किया कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) से संबंधित महत्वपूर्ण निर्णयों पर मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा एकतरफा लिए गए निर्णयों के आरोपों पर वह पहले चुनाव आयोग और अन्य प्रतिवादियों की सुनवाई करेगा। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता में पीठ ने इस याचिका पर केंद्र सरकार, चुनाव आयोग, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, चुनाव आयुक्त डॉ सुखबीर सिंह संधू, डॉ विवेक जोशी, उपचुनाव आयुक्त मनीष गर्ग और महानिदेशक (आईटी) सीमा खन्ना को नोटिस जारी किए।


पीठ में मुख्य न्यायाधीश के साथ न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी मोहना भी शामिल हैं। यह याचिका 'द इंडियन एक्सप्रेस' की एक रिपोर्ट के बाद दायर की गई थी, जिसमें कहा गया था कि दो चुनाव आयुक्तों द्वारा 14 बार आपत्तियों के बावजूद मुख्य चुनाव आयुक्त ने महत्वपूर्ण निर्णय लिए। याचिकाकर्ता राकेश कुमार सिंह की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने मताधिकार की सुरक्षा के लिए तत्काल कदम उठाने की आवश्यकता बताते हुए श्री ज्ञानेश कुमार के निलंबन की मांग की।


उन्होंने सीईसी अधिनियम का उल्लेख किया, जिसके अनुसार चुनाव आयोग के निर्णय सर्वसम्मति या बहुमत से होने चाहिए। हालांकि, पीठ ने स्पष्ट किया कि वह पहले प्रतिवादियों की राय पर विचार करेगी और यह देखेगी कि क्या कानून का उल्लंघन हुआ है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यदि कोई उल्लंघन पाया गया, तो संबंधित निर्णयों को रद्द किया जा सकता है।


न्यायालय ने सभी प्रतिवादियों को नोटिस जारी कर दिया है। इसके अतिरिक्त, वकील शैलेंद्र मणि त्रिपाठी द्वारा दायर एक अन्य याचिका पर भी नोटिस जारी किया गया है, जिसमें कथित एकतरफा निर्णयों को रद्द करने और एसआईआर प्रक्रिया की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की गई है।