उत्तर प्रदेश चुनाव: भाजपा को सहयोगियों के साथ सीट बंटवारे की चुनौती
भाजपा के सामने गठबंधन की चुनौती
जैसे-जैसे उत्तर प्रदेश में चुनाव का समय नजदीक आ रहा है, भारतीय जनता पार्टी की सहयोगी पार्टियों का दबाव बढ़ता जा रहा है। भाजपा के लिए इस बार गठबंधन साधना एक बड़ी चुनौती बन गई है। लोकसभा चुनाव के बाद की स्थिति में भाजपा को अपने सामाजिक समीकरणों की चिंता सता रही है, वहीं दूसरी ओर सहयोगी पार्टियों की संख्या भी बढ़ गई है, जो भाजपा पर अधिक सीटों के लिए दबाव बना रही हैं।
सूत्रों के अनुसार, हाल ही में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की दिल्ली यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री से मुलाकात के बाद सहयोगी पार्टियों के साथ सीट बंटवारे पर चर्चा हुई थी। भाजपा के प्रभारी विनोद तावड़े ने बिहार में नीतीश कुमार की पार्टी के साथ सीटों का तालमेल सफलतापूर्वक किया था, जिसमें चिराग पासवान, जीतन राम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा जैसे चार सहयोगियों को 41 सीटों में समायोजित किया गया था। इसलिए, उम्मीद की जा रही है कि वे उत्तर प्रदेश में भी सहयोगियों के साथ सीटों का समायोजन कर लेंगे।
सहयोगियों की मांगें और भाजपा की स्थिति
हालांकि, उत्तर प्रदेश के सहयोगी पार्टियों की स्थिति थोड़ी जटिल है। सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के नेता ओमप्रकाश राजभर ने राज्य के बंटवारे का मुद्दा उठाया है, जिसमें उन्होंने कहा कि नई सरकार बनने के बाद राज्य को चार हिस्सों में बांटा जाएगा। यह ध्यान देने योग्य है कि उत्तर प्रदेश के बंटवारे की चर्चा कई वर्षों से चल रही है, लेकिन केंद्र सरकार इस मुद्दे में उलझना नहीं चाहती।
राजभर ने अपने मतदाताओं को संदेश देने और भाजपा पर दबाव डालने के लिए यह मुद्दा उठाया है। इससे पहले, भाजपा के अन्य सहयोगी संजय निषाद ने अचानक विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और सपा के वरिष्ठ नेता माता प्रसाद पांडेय से मुलाकात की, जिसे शिष्टाचार मुलाकात बताया गया। लेकिन राजनीति में शिष्टाचार अब लगभग समाप्त हो चुका है, इसलिए इसे दबाव बनाने की राजनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
पिछली बार भाजपा के पास केवल दो सहयोगी पार्टियां थीं: संजय निषाद की निषाद पार्टी और अनुप्रिया पटेल का अपना दल। इस बार, जयंत चौधरी की रालोद और ओम प्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी भी शामिल हो गई हैं। ये दोनों पार्टियां पिछली बार समाजवादी पार्टी के गठबंधन में थीं। भाजपा ने अकेले 376 सीटों पर चुनाव लड़ा था और सहयोगियों को 27 सीटों में समायोजित किया था। अब रालोद और निषाद पार्टी को इससे अधिक सीटें चाहिए।
भाजपा के लिए सीट बंटवारा चुनौतीपूर्ण
जयंत चौधरी के साथ कम से कम 30 सीटों पर समझौता होना आवश्यक है, और निषाद पार्टी को भी 15 से अधिक सीटें चाहिए। यदि ऐसा होता है, तो भाजपा के लिए लगभग 330 सीटें बचेंगी। भाजपा के सूत्रों का कहना है कि पार्टी को हर हाल में 350 से अधिक सीटों पर चुनाव लड़ना है। इसका मतलब है कि चार सहयोगी पार्टियों को केवल 53 सीटों में समायोजित करना होगा, जो कि एक कठिन कार्य है।
भाजपा के सहयोगी भी समझते हैं कि पेपर लीक, परीक्षा में गड़बड़ी, राम मंदिर में चढ़ावा चोरी और अखिलेश यादव के दांव के कारण भाजपा को उनकी आवश्यकता है। गैर यादव पिछड़ा वोट इन पार्टियों के माध्यम से सुनिश्चित किया जाएगा। इसलिए, यह स्पष्ट है कि सीट बंटवारा भाजपा के लिए आसान नहीं होगा।
