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कमजोर मानसून का रबी फसलों पर प्रभाव: गेहूं की बुवाई में गिरावट

इस वर्ष का मानसून कमजोर रहने के कारण रबी फसलों की बुवाई में गिरावट आई है। कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, गेहूं की बुवाई में पिछले वर्ष की तुलना में 59 प्रतिशत की कमी आई है। विशेष रूप से पंजाब और राजस्थान में स्थिति चिंताजनक है, जहां वर्षा सामान्य से कम हुई है। अन्य राज्यों में भी समस्या बढ़ सकती है, जिससे फसलों की पैदावार पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने की संभावना है। जानें आगे मौसम का क्या असर होगा और सरकार के उत्पादन लक्ष्य पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा।
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कमजोर मानसून का असर

इस वर्ष मानसून की स्थिति काफी कमजोर रही, जिसके चलते देश के विभिन्न हिस्सों में वर्षा की मात्रा कम रही। इसका प्रभाव अब रबी फसलों की बुवाई पर स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। कृषि मंत्रालय ने 23 अक्टूबर 2026 तक की रबी फसलों की बुवाई के आंकड़े जारी किए हैं। इन आंकड़ों के अनुसार, देश में गेहूं की बुवाई केवल 11 हजार हेक्टेयर में हुई है, जबकि पिछले वर्ष इसी समय यह आंकड़ा 27 हजार हेक्टेयर था। इसका मतलब है कि शुरुआती बुवाई का क्षेत्रफल लगभग 59 प्रतिशत कम हो गया है.


सरकार के आंकड़े और चिंताएं

सरकार द्वारा जारी किए गए ये आंकड़े चिंताजनक हैं। हालांकि, मंत्रालय का कहना है कि अभी कुछ राज्यों में ही गेहूं की बुवाई शुरू हुई है, इसलिए इसे पूरे सीजन की स्थिति के रूप में नहीं देखा जा सकता। इस साल दक्षिण-पश्चिम मानसून की कमजोरी ने खेतों में नमी और सिंचाई के लिए उपलब्ध जल संसाधनों पर दबाव बढ़ा दिया है.


किस राज्यों में स्थिति गंभीर?

कम वर्षा का प्रभाव विशेष रूप से पंजाब और राजस्थान में देखने को मिल सकता है। मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार, इस वर्ष मानसून के दौरान पंजाब में सामान्य से 38 प्रतिशत और राजस्थान में 22 प्रतिशत कम वर्षा हुई है। सितंबर के अंत तक दोनों राज्यों के जलाशयों में भी पानी का भंडार सामान्य से कम था। इसके अलावा, बांधों में सीमित मात्रा में पानी होने के कारण इन राज्यों को सिंचाई के लिए अतिरिक्त सावधानी बरतनी होगी। ये दोनों राज्य मिलकर देश के कुल गेहूं रकबे का लगभग 31 प्रतिशत हिस्सा रखते हैं, जिससे यहां पानी की कमी गेहूं की बुवाई की गति को प्रभावित कर सकती है.


अन्य प्रभावित राज्य

कम वर्षा का प्रभाव केवल पंजाब और राजस्थान तक सीमित नहीं है। मध्य प्रदेश, गुजरात, बुंदेलखंड और मध्य भारत के अन्य क्षेत्रों में भी समस्या बढ़ सकती है, जहां खेती बारिश पर निर्भर है या सिंचाई के लिए पर्याप्त साधन उपलब्ध नहीं हैं। कमजोर मानसून के कारण मिट्टी में नमी कम हो जाती है और भूजल तथा नहरों से मिलने वाले पानी पर निर्भरता बढ़ जाती है। गेहूं की फसल को बुवाई के बाद कई बार सिंचाई की आवश्यकता होती है। यदि पर्याप्त पानी नहीं मिला, तो बुवाई में देरी हो सकती है, जिससे फसल की पैदावार पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है.


क्या केवल गेहूं प्रभावित है?

कृषि मंत्रालय के आंकड़ों से पता चलता है कि गेहूं के अलावा अन्य फसलों की बुवाई भी पिछले वर्ष की तुलना में कम हुई है। 23 अक्टूबर तक कुल रबी फसलों का रकबा 18.02 लाख हेक्टेयर रहा, जबकि पिछले वर्ष इसी समय यह 28.26 लाख हेक्टेयर था। दलहन की बुवाई 4.39 लाख से घटकर 3.27 लाख हेक्टेयर और तिलहन का रकबा 21.34 लाख से घटकर 13.38 लाख हेक्टेयर रह गया। धान की बुवाई भी 2.13 लाख से घटकर 1.02 लाख हेक्टेयर दर्ज की गई। हालांकि, मोटे अनाज की बुवाई पिछले वर्ष के 13 हजार हेक्टेयर से बढ़कर 23 हजार हेक्टेयर हो गई.


भविष्य का मौसम

सरकार ने वर्ष 2026-27 के लिए 12.1 करोड़ टन गेहूं उत्पादन का लक्ष्य रखा है, जबकि पिछले वर्ष रिकॉर्ड 12.07 करोड़ टन उत्पादन हुआ था। वर्तमान में शुरुआती बुवाई के आंकड़ों से यह नहीं कहा जा सकता कि उत्पादन लक्ष्य पूरा नहीं होगा, क्योंकि गेहूं की बुवाई अक्टूबर-नवंबर में जारी रहती है। आने वाले हफ्तों में बारिश, मिट्टी की नमी, नहरों में पानी और सिंचाई की उपलब्धता यह तय करेगी कि बुवाई की गति कितनी सुधरती है। हालांकि, कमजोर मानसून का फसलों पर प्रभाव पड़ने की संभावना अधिक है.