केंद्र सरकार का परिसीमन बिल: राजनीतिक परिदृश्य में बदलाव और संभावनाएं
परिसीमन बिल की तैयारी
केंद्र सरकार एक बार फिर परिसीमन विधेयक लाने की योजना बना रही है। पिछली बार इसे महिला आरक्षण के नारी शक्ति वंदन कानून के साथ जोड़ा गया था। संसद का बजट सत्र समाप्त होने के बाद, सरकार ने 16 से 18 अप्रैल तक एक विशेष सत्र बुलाया, जिसमें संविधान के 131वें संशोधन विधेयक को पेश किया गया। यह तीन विधेयकों का सेट था, जिसमें एक संविधान संशोधन और दो सामान्य विधेयक शामिल थे। संविधान संशोधन विधेयक को पास कराने के लिए विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है। इसे संसद के दोनों सदनों में सामान्य बहुमत और सदन में उपस्थित सदस्यों के दो तिहाई बहुमत से पास कराना होता है। इस संदर्भ में, लोकसभा में सरकार को 360 सदस्यों की आवश्यकता थी, जो वह जुटा नहीं पाई, और इसलिए विधेयक पास नहीं हो सका। उस समय विपक्ष एकजुट हो गया था।
राजनीतिक परिदृश्य में बदलाव
अब जब सरकार फिर से इस विधेयक को लाने की तैयारी कर रही है, तो यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या होगा। ध्यान देने योग्य है कि अप्रैल में विधेयक गिरने के बाद से देश का राजनीतिक परिदृश्य काफी बदल गया है। दो महत्वपूर्ण बदलाव हैं: पहला, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की पार्टी को चुनाव में हार का सामना करना पड़ा है, जबकि भाजपा ने ऐतिहासिक जीत हासिल की है। दूसरा, तमिलनाडु में डीएमके चुनाव हारकर सत्ता से बाहर हो गई है और कांग्रेस के साथ उसका गठबंधन टूट गया है। कांग्रेस ने खुद को डीएमके से अलग कर विजय की पार्टी के साथ हाथ मिला लिया है। इन दोनों बदलावों का संसद के अगले सत्र, जो जुलाई में होगा, पर बड़ा असर पड़ेगा।
विधेयक के समर्थन में संभावनाएं
ममता बनर्जी के पास 29 सांसद हैं और डीएमके के 23 सांसद हैं। भले ही डीएमके और कांग्रेस अलग हो गए हैं, लेकिन यह मानना मुश्किल है कि डीएमके परिसीमन विधेयक का समर्थन करेगा। यह मुद्दा दक्षिण भारत की पार्टियों के लिए भावनात्मक रहा है। एमके स्टालिन ने परिसीमन के विरोध का नेतृत्व किया था। पिछली बार जब विधेयक आया था, तो उन्होंने काले कपड़े पहनकर विधेयक की कॉपी जलाई थी। इसलिए वे अगली बार भी इसका विरोध करेंगे। हालांकि, तृणमूल कांग्रेस के सांसदों के बारे में संदेह है। पार्टी के रूप में ममता बनर्जी इसका समर्थन नहीं करेंगी, लेकिन वे अपने सांसदों को सरकार का साथ देने से नहीं रोक पाएंगी।
सांसदों की संख्या और संभावित समर्थन
सूत्रों के अनुसार, तृणमूल कांग्रेस के लगभग 20 सांसद भाजपा के संपर्क में हैं, और यह संख्या बढ़ भी सकती है। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी में फूट पड़ने की चर्चा भी है, और झारखंड मुक्ति मोर्चा के सरकार के साथ आने की भी खबरें हैं। शरद पवार की पार्टी पहले ही भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ करने लगी है। इसलिए जब मानसून सत्र शुरू होगा, तब सांसदों की संख्या की गिनती नए सिरे से करनी होगी। एनडीए के पास वर्तमान में 293 सांसद हैं, और उसे 70 के करीब वोट जुटाने होंगे। यह चुनौतीपूर्ण है, लेकिन सांसदों की गैरहाजिरी और कुछ के पाला बदलने से भाजपा इसे संभव बना सकती है।
