केंद्र सरकार ने शिक्षा में सुधार की दिशा में उठाए कदम
सरकार की नई पहल
केंद्र सरकार ने हाल ही में शिक्षा के क्षेत्र में सुधार के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाने का निर्णय लिया है। छात्रों और युवाओं के आंदोलनों के चलते सरकार की सोच में बदलाव आया है। पहले, सरकार की नीतियों में राजनीतिक समझ की कमी और अहंकार की भावना स्पष्ट थी। राहुल गांधी की बहुजन राजनीति ने भाजपा को जाति आधारित राजनीति की ओर मोड़ दिया था। नए सलाहकारों ने भी यह समझाने का प्रयास किया कि अंबेडकर और फुले जैसे नेताओं की बातें ही पर्याप्त हैं। इसी बीच, यूजीसी ने समानता के नाम पर भेदभावपूर्ण निर्देश जारी किए, जिससे छात्रों में भारी असंतोष उत्पन्न हुआ।
जब यूजीसी ने सामान्य जातियों के छात्रों को संभावित अपराधी के रूप में देखा, तो इसका विरोध भाजपा के अपने समर्थकों ने भी किया। लेकिन शिक्षा मंत्री और अन्य बड़े नेताओं ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। इसके बाद, सुप्रीम कोर्ट ने इस निर्देश पर रोक लगा दी। अब, 'जेन जी' के आंदोलन के चलते सरकार ने धर्मेंद्र प्रधान को हटाने का निर्णय लिया है। कर्नाटक के प्रहलाद जोशी को शिक्षा मंत्रालय का प्रभार दिया गया है, जो संभवतः स्थायी हो सकता है।
धर्मेंद्र प्रधान के हटने से सरकार ने परीक्षा व्यवस्था में सुधार की प्रक्रिया को भी तेज किया है। 2024 में नीट यूजी के पेपर लीक होने के बाद, परीक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग उठी थी, लेकिन सरकार ने उस समय ध्यान नहीं दिया। अब, बड़े आंदोलन के बाद, सरकार ने सुधार की दिशा में कदम उठाने का निर्णय लिया है।
इस सुधार के लिए नंदन नीलेकणी की अध्यक्षता में एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति का गठन किया गया है। नीलेकणी का नाम ऐसा है कि कांग्रेस नेता भी उन पर सवाल नहीं उठा सकते। शिक्षा और परीक्षा से संबंधित मुद्दों को सुलझाने के लिए सरकार ने यह कदम उठाया है।
