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केरल हाई कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला: पॉक्सो एक्ट के तहत यौन उत्पीड़न पर नया दृष्टिकोण

केरल हाई कोर्ट ने पॉक्सो एक्ट के तहत यौन उत्पीड़न के मामलों में 'चेस्ट' और 'ब्रेस्ट' के बीच के भेद को निराधार ठहराया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति यौन इरादे से किसी बच्चे की छाती को छूता है, तो इसे यौन उत्पीड़न माना जाएगा। इस निर्णय ने एक 12 वर्षीय बच्चे के यौन उत्पीड़न के मामले में आरोपी की दलील को खारिज कर दिया, जिसने कहा था कि केवल 'ब्रेस्ट' को छूना ही अपराध है। जानें इस महत्वपूर्ण फैसले के पीछे की पूरी कहानी।
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कोच्चि में हाई कोर्ट का निर्णय

कोच्चि: केरल उच्च न्यायालय ने बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों (पॉक्सो) से संबंधित एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि पॉक्सो (POCSO) अधिनियम के तहत यौन उत्पीड़न के मामलों में 'चेस्ट' (छाती) और 'ब्रेस्ट' (स्तन) के बीच का भेद पूरी तरह से निराधार है। यदि कोई व्यक्ति यौन इरादे से किसी बच्चे की छाती को छूता है, तो इसे कानूनी दृष्टि से यौन उत्पीड़न माना जाएगा। यह सख्त टिप्पणी 12 वर्षीय एक लड़के के यौन उत्पीड़न के मामले की सुनवाई के दौरान आई है, जिसने आरोपियों को एक स्पष्ट संदेश दिया है।


आरोपी की अजीब दलील

इस मामले में अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया कि आरोपी ने बच्चे को यौन इरादे से पीछे से पकड़ा था। आरोपी ने अदालत में यह अजीब दलील दी कि किसी बच्चे की 'छाती' को छूना या पकड़ना पॉक्सो अधिनियम के तहत अपराध नहीं है। उसका तर्क था कि केवल यौन इरादे से 'ब्रेस्ट' को छूने पर ही यह अपराध बनता है। अदालत ने दोनों शब्दों के अर्थ और उनके बीच के अंतर को गहराई से परखा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भले ही चिकित्सा और शारीरिक संरचना के आधार पर इन दोनों शब्दों के अलग-अलग अर्थ होते हैं, लेकिन यौन उत्पीड़न के मामलों में 'चेस्ट' का उपयोग आमतौर पर 'ब्रेस्ट' के पर्यायवाची के रूप में किया जाता है।


12 वर्षीय बच्चे का मामला और सजा में बदलाव

जस्टिस ए. बदरुद्दीन की पीठ ने कोझिकोड के 12 वर्षीय बच्चे के यौन उत्पीड़न मामले में सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। हालांकि, अदालत ने सभी सबूतों की बारीकी से जांच के बाद आरोपी की सजा की धाराओं में कुछ बदलाव किए। पहले, मंजेरी की विशेष पॉक्सो अदालत ने आरोपी को 'गंभीर यौन उत्पीड़न' का दोषी मानते हुए 10 साल की कठोर कैद की सजा सुनाई थी। लेकिन उच्च न्यायालय ने सबूतों के आधार पर इसे 'गंभीर' के बजाय पॉक्सो अधिनियम के तहत 'यौन उत्पीड़न' का मामला माना, जिसमें तीन से पांच साल तक की कठोर सजा का प्रावधान है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब कोई पीड़ित यह दावा करता है कि आरोपी ने यौन इरादे से उसकी छाती पकड़ी, तो यह सीधा निष्कर्ष है कि आरोपी की मंशा बच्चे का यौन उत्पीड़न करने की थी।