कोच को बरी करने का फैसला: 14 वर्षीय छात्रा की गर्भावस्था पर अदालत की टिप्पणी
विशेष अदालत का निर्णय
ठाणे: महाराष्ट्र की एक विशेष पॉक्सो अदालत ने 14 वर्षीय छात्रा के साथ दुष्कर्म और गर्भवती करने के आरोप में 40 वर्षीय टेनिस कोच को बरी कर दिया है। यह निर्णय काफी चर्चा का विषय बना हुआ है। न्यायाधीश ने अपने आदेश में कहा कि पीड़िता का आरोपी कोच के साथ सामान्य व्यवहार और बिना किसी शिकायत के ट्रेनिंग जारी रखना, गवाही पर संदेह पैदा करता है। अदालत ने यह भी माना कि केवल पीड़िता के बयान के आधार पर आरोपी को सजा नहीं दी जा सकती।
पेट दर्द से खुला मामला
अभियोजन पक्ष के अनुसार, यह मामला 2023 का है। नवी मुंबई के एक टेनिस कोच पर आरोप है कि उसने 9वीं कक्षा की छात्रा के साथ अगस्त और सितंबर में ठाणे की एक हाउसिंग सोसाइटी के टेनिस कोर्ट में दो बार यौन उत्पीड़न किया। यह घटना अक्टूबर 2023 में तब सामने आई जब छात्रा को पेट में तेज दर्द हुआ। मेडिकल जांच में उसकी गर्भावस्था की पुष्टि हुई, जिसके बाद उसका गर्भपात कराया गया।
पीड़िता का व्यवहार और अदालत का तर्क
अदालत ने इस बात पर ध्यान दिया कि पीड़िता एक इंटरनेशनल स्कूल की छात्रा है, जहां यौन शिक्षा दी जाती है। इसके बावजूद, घटना के बाद उसने कोच के साथ सामान्य बातचीत की और बिना किसी डर के अपनी ट्रेनिंग जारी रखी। अदालत ने कहा कि यह सामान्य व्यवहार उसकी गवाही को अविश्वसनीय बनाता है।
पॉक्सो एक्ट और सबूतों की कमी
पॉक्सो एक्ट की धारा 29 के तहत आरोपी को तब तक दोषी माना जाता है जब तक वह खुद को बेगुनाह साबित न कर दे। विशेष न्यायाधीश प्रेमल एस. विठलानी ने कहा कि कानूनी धारणा तभी लागू होती है जब अभियोजन पक्ष बुनियादी तथ्यों को साबित करे, जिसमें वह विफल रहा। मामले में वैज्ञानिक सबूतों की कमी भी देखी गई।
पुलिस जांच में खामियां
कोर्ट ने जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए। गर्भपात किए गए भ्रूण की फोरेंसिक डीएनए रिपोर्ट अस्पष्ट थी, जिससे आरोपी का जैविक संबंध साबित नहीं हो सका। इसके अलावा, हाउसिंग सोसाइटी के सीसीटीवी फुटेज में कुछ भी संदिग्ध नहीं मिला। अदालत ने कहा कि केवल आरोपों के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता जब तक कि पुख्ता सबूत न हों।
