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गुरदयाल सिंह भंगू का निधन: भारतीय महिला हॉकी के स्वर्णिम युग के नायक

गुरदयाल सिंह भंगू, जिन्होंने 2002 के राष्ट्रमंडल खेलों में भारतीय महिला हॉकी टीम को स्वर्ण पदक दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, का हाल ही में निधन हो गया। भंगू का योगदान भारतीय हॉकी के इतिहास में अमिट रहेगा, और उनकी कोचिंग में टीम ने कई महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हासिल कीं। उनकी कहानी न केवल खेल के प्रति उनके समर्पण को दर्शाती है, बल्कि यह भी बताती है कि कैसे एक कोच अपने खिलाड़ियों को प्रेरित कर सकता है।
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गुरदयाल सिंह भंगू का निधन


86 वर्ष की आयु में, पूर्व भारतीय महिला हॉकी टीम के कोच गुरदयाल सिंह भंगू का निधन कनाडा के सरे में हो गया। उन्होंने 2002 के राष्ट्रमंडल खेलों में भारत को ऐतिहासिक स्वर्ण पदक दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। जब भारत ने मेज़बान इंग्लैंड को 3-2 से हराया, तब भंगू टीम के मुख्य कोच थे, और यह जीत बाद में 2007 की फिल्म 'चक दे' की कहानी को प्रेरित करने वाली बनी।


महत्वपूर्ण जीत

भारतीय महिला हॉकी टीम ने कप्तान सूरज लता देवी की अगुवाई में अतिरिक्त समय में ममता खरब के गोल से स्वर्ण पदक जीता, जो भारतीय हॉकी के इतिहास में एक महत्वपूर्ण क्षण था।


भंगू ने राष्ट्रमंडल खेलों के फाइनल में अपने अनुभव और हॉकी के नियमों की गहरी समझ का उपयोग किया। उन्होंने खिलाड़ियों को निर्देश दिया कि पेनल्टी कॉर्नर के दौरान ध्यान न भटकाएं।


भंगू का करियर

भंगू का जन्म लायलपुर (अब पाकिस्तान में फैसलाबाद) में हुआ था, और उन्होंने अंबाला में अपनी शिक्षा पूरी की। उन्होंने राष्ट्रीय खेल संस्थान, पटियाला में प्रशिक्षण लिया, जहाँ उन्होंने हॉकी के दिग्गजों से सीखा।


उन्होंने 1972 से 1976 तक नाइजीरियाई महिला टीम के मुख्य कोच के रूप में कार्य किया और 1998 में भारतीय महिला टीम के मुख्य कोच बने। उनके मार्गदर्शन में, भारत ने एशियाई खेलों में रजत पदक जीता और राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक की नींव रखी।


भंगू को 2000 में द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जिससे वह इस सम्मान को प्राप्त करने वाले पहले हॉकी कोच बने।