गुरु पूर्णिमा और व्यास पूजा का आयोजन: DAV विद्यालय में श्रद्धा और भक्ति का पर्व
दिल्ली में गुरु पूर्णिमा का उत्सव
दिल्ली: डी.ए.वी. वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय क्रमांक-1, गांधी नगर, नेहरू गली, महावीर चौक में बुधवार को व्यास पूजा एवं गुरु पूर्णिमा का पर्व श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया गया. इस अवसर पर विद्यार्थियों को भारतीय संस्कृति, गुरु-शिष्य परंपरा और महर्षि वेदव्यास के अद्वितीय साहित्यिक एवं आध्यात्मिक योगदान से अवगत कराया गया.
कार्यक्रम की शुरुआत मां सरस्वती की वंदना और दीप प्रज्ज्वलन से हुई. विद्यालय के अध्यक्ष नरेश शर्मा, विद्यालय प्रमुख लखीराम, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, दिल्ली प्रांत के सह-बौद्धिक आचार्य सतीश शर्मा और मुख्य अतिथि डॉ. पंकज पटवा (असिस्टेंट प्रोफेसर, श्याम लाल कॉलेज) ने महर्षि वेदव्यास के चित्र पर माल्यार्पण कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की.
मुख्य अतिथि डॉ. पंकज पटवा ने अपने प्रेरक उद्बोधन में कहा कि, "गुरु ब्रह्मा, विष्णु और महेश के समान हैं. गुरु ही अज्ञान रूपी अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलाते हैं और जीवन को सही दिशा प्रदान करते हैं." उन्होंने विद्यार्थियों से गुरुजनों का सम्मान करने और उनके आदर्शों को अपने जीवन में अपनाने का आग्रह किया.
इस अवसर पर विद्यार्थियों ने भजन, कविता, प्रेरक विचार और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से गुरु-शिष्य परंपरा की महिमा का सुंदर चित्रण किया. उपस्थित शिक्षकों और विद्यार्थियों ने महर्षि वेदव्यास के जीवन, उनके ज्ञान, तप, त्याग और भारतीय संस्कृति में उनके योगदान को याद किया.

प्रधानाचार्य ने अपने संबोधन में बताया कि आषाढ़ पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा या व्यास पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है. महर्षि वेदव्यास ने वेदों को चार भागों में विभाजित कर ज्ञान को जन-जन तक पहुंचाने का कार्य किया. उन्होंने महाकाव्य महाभारत की रचना की, जिसमें श्रीमद्भगवद्गीता का महत्वपूर्ण भाग है. इसके अलावा, उन्होंने 18 महापुराण, श्रीमद्भागवत महापुराण और ब्रह्मसूत्र जैसे अमर ग्रंथों की रचना की.
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, दिल्ली प्रांत के सह-बौद्धिक आचार्य सतीश शर्मा ने संत शिरोमणि सद्गुरु रविदास के जीवन और उनके सामाजिक समरसता, समानता और मानवता के संदेश पर प्रकाश डाला. उन्होंने संत रविदास के प्रसिद्ध वचन "मन चंगा तो कठौती में गंगा" का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि मन निर्मल और विचार श्रेष्ठ हों तो ईश्वर की प्राप्ति हर स्थान पर संभव है.
विद्यालय परिवार ने विद्यार्थियों को भारतीय संस्कृति, गुरु-शिष्य परंपरा और नैतिक मूल्यों को जीवन में अपनाने का संकल्प दिलाया। अंत में सभी ने राष्ट्रगान गाकर कार्यक्रम का समापन किया.
