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घर खरीदने में छिपे खर्च: 50 लाख का फ्लैट नहीं है केवल 50 लाख का निवेश

घर खरीदना एक बड़ा सपना और वित्तीय निवेश है, लेकिन इसमें कई छिपे हुए खर्च शामिल होते हैं। 50 लाख रुपये का फ्लैट खरीदने पर आपको स्टांप ड्यूटी, जीएसटी, पार्किंग और कानूनी जांच जैसे अतिरिक्त खर्चों का ध्यान रखना होगा। जानें कि कैसे ये खर्च आपके बजट को प्रभावित कर सकते हैं और सही निर्णय लेने के लिए क्या करना चाहिए।
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घर खरीदने का सपना और छिपे खर्च

नई दिल्ली: अपने घर का सपना हर व्यक्ति की जिंदगी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होता है और यह एक बड़ा वित्तीय निवेश भी है। जब लोग घर खरीदने की योजना बनाते हैं, तो वे अक्सर प्रॉपर्टी की मूल कीमत और होम लोन की मासिक किस्त (EMI) का सही-सही अनुमान लगा लेते हैं। लेकिन वे घर खरीदने से जुड़े अन्य अतिरिक्त और छिपे हुए खर्चों को अपने बजट में शामिल करना भूल जाते हैं। इसके परिणामस्वरूप, पजेशन या रजिस्ट्री के समय अचानक सामने आने वाले ये खर्च खरीदार के लिए एक बड़ा वित्तीय संकट बन सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि किसी फ्लैट की दिखने वाली बेस प्राइस से अंतिम भुगतान अक्सर कहीं अधिक होता है।


1. स्टांप ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन चार्ज: सबसे बड़ा अतिरिक्त खर्च

घर खरीदने में फ्लैट की मूल लागत के बाद सबसे बड़ा खर्च स्टांप ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन शुल्क होता है। यह दर हर राज्य में भिन्न होती है और 5 से 8 प्रतिशत या उससे अधिक हो सकती है। कई राज्यों में महिला खरीदारों को इसमें कुछ छूट भी मिलती है। उदाहरण के लिए, 50 लाख रुपये के फ्लैट पर खरीदार को 3 से 4 लाख रुपये अतिरिक्त स्टांप ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन शुल्क के रूप में चुकाने पड़ सकते हैं। इसलिए केवल प्रॉपर्टी की बेस वैल्यू देखकर सौदा तय करना वित्तीय दृष्टि से जोखिम भरा हो सकता है।


2. निर्माणाधीन फ्लैट पर GST का प्रभाव

यदि आप किसी निर्माणाधीन प्रोजेक्ट में फ्लैट बुक कर रहे हैं, तो आपके कुल बजट पर जीएसटी का सीधा असर पड़ेगा। वर्तमान में सामान्य आवासीय संपत्तियों पर 5 प्रतिशत और किफायती हाउसिंग प्रोजेक्ट्स पर 1 प्रतिशत जीएसटी लागू होता है। यदि आप ऐसा फ्लैट खरीदते हैं जिसे सक्षम विकास प्राधिकरण से कंप्लीशन सर्टिफिकेट (CC) मिल चुका है, तो उस संपत्ति की बिक्री पर कोई जीएसटी नहीं लगता। इसलिए बुकिंग से पहले प्रोजेक्ट की विधिक स्थिति की जांच करना आवश्यक है।


3. पार्किंग और मेंटेनेंस के लिए अतिरिक्त खर्च

फ्लैट की कीमत के अलावा, बिल्डर अक्सर डेडिकेटेड कार पार्किंग, एक से दो साल का एडवांस मेंटेनेंस, क्लब मेंबरशिप और कॉरपस फंड के नाम पर लाखों रुपये की मांग करते हैं। यूपी रेरा समेत कई राज्यों के नियामक मॉडलों में इन शुल्कों का स्पष्ट उल्लेख है। इसके अलावा, फ्लैट हैंडओवर होने के बाद भी साझा सुविधाओं के लिए नियमित मेंटेनेंस चार्ज देना पड़ता है। इसलिए बिल्डर से हमेशा 'ऑल-इन' कीमत का लिखित ब्रेकअप मांगना चाहिए।


4. ₹50 लाख से अधिक की प्रॉपर्टी पर TDS का नियम

आयकर कानूनों के अनुसार, यदि खरीदी जा रही संपत्ति की कुल कीमत 50 लाख रुपये या उससे अधिक है, तो खरीदार को विक्रेता को किए जाने वाले भुगतान में से 1 प्रतिशत टीडीएस काटकर सरकारी खजाने में जमा कराना अनिवार्य है। हालांकि यह घर की कीमत के ऊपर कोई अतिरिक्त लागत नहीं है, लेकिन कानूनी अनुपालन के लिए इसे नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है।


5. कानूनी जांच और अन्य खर्च

विशेष रूप से रीसेल या पुरानी प्रॉपर्टी खरीदते समय कानूनी जांच कराना बेहद जरूरी होता है। संपत्ति का टाइटल डीड, पुराना मालिकाना हक, स्वीकृत नक्शा, एनओसी और बकाया देनदारियों की जांच के लिए वकील की फीस देनी होती है। इसके अलावा, बैंक की होम लोन प्रोसेसिंग फीस, प्रॉपर्टी वैल्यूएशन चार्ज और कई मामलों में प्रॉपर्टी डीलर की ब्रोकरेज फीस भी खरीदार की जेब पर अतिरिक्त भार डालती है।


6. ₹50 लाख का फ्लैट मतलब कम से कम ₹60 लाख का कुल बजट

यदि किसी खरीदार को 50 लाख रुपये का फ्लैट पसंद आया है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि उसे केवल 50 लाख रुपये का बंदोबस्त करना है। स्टांप ड्यूटी, रजिस्ट्रेशन, जीएसटी, पार्किंग, कॉरपस फंड, लोन प्रोसेसिंग और इंटीरियर्स जैसे खर्च मिलकर कुल लागत को आसानी से 58 से 60 लाख रुपये तक पहुंचा देते हैं। यही कारण है कि वित्तीय सलाहकार किसी भी प्रॉपर्टी का एग्रीमेंट साइन करने से पहले डेवलपर या सेलर से 'ऑल-इन कॉस्ट' का पूरा लिखित ब्योरा लेने की सलाह देते हैं।