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चीन की युद्ध नीति: विजय गोखले की नई किताब में महत्वपूर्ण विचार

पूर्व विदेश सचिव विजय गोखले की नई किताब 'China’s Wars' में चीन की युद्ध नीति और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर महत्वपूर्ण विचार प्रस्तुत किए गए हैं। गोखले ने बताया है कि चीन किसी संघर्ष में सीधे शामिल होने से पहले परिस्थितियों का आकलन करता है और जब उसे लाभ मिलता है, तब वह कार्रवाई करता है। उन्होंने 1962 के युद्ध का उदाहरण देते हुए चीन की रणनीति को समझाया है, जिसमें आक्रामकता को रक्षात्मक रूप में पेश करने की प्रवृत्ति शामिल है। इस पुस्तक में भारत-चीन संबंधों के वर्तमान दौर को 'सशस्त्र सह-अस्तित्व' के रूप में परिभाषित किया गया है।
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चीन की युद्ध नीति पर विजय गोखले की नई पुस्तक


नई दिल्ली: पूर्व विदेश सचिव विजय गोखले ने अपनी हालिया पुस्तक 'China’s Wars: The Politics and Diplomacy Behind its Military Coercion' में चीन की सैन्य रणनीति और दबाव बनाने की तकनीकों पर गहराई से चर्चा की है। उनके अनुसार, चीन किसी भी संघर्ष में सीधे शामिल होने से पहले अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य का मूल्यांकन करता है। जब उसे अपने लिए लाभकारी स्थिति नजर आती है, तब वह कार्रवाई करता है। गोखले इसे भारत-चीन संबंधों में 'सशस्त्र सह-अस्तित्व' का चरण मानते हैं।


गोखले का कहना है कि चीन को अवसरवादी शक्ति कहना यह नहीं है कि वह अन्य प्रमुख शक्तियों से पूरी तरह अलग है। उन्होंने बताया कि चीन ने कई बार तब संघर्ष का रास्ता अपनाया है जब अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां उसके अनुकूल थीं या किसी बड़ी शक्ति के साथ उसके संबंधों से उसे लाभ मिल रहा था। इसका मतलब है कि बीजिंग परिस्थितियों का उपयोग अपने रणनीतिक लक्ष्यों के लिए करता है।


पश्चिम और चीन की रणनीतियों में अंतर

गोखले ने बताया कि पश्चिमी देशों में 'deterrence' का अर्थ आमतौर पर किसी प्रतिकूल को जवाबी कार्रवाई के डर से रोकना होता है। जबकि चीन की सोच इससे भिन्न है। वहां 'preventive deterrence' का मतलब है कि विरोधी के कदम उठाने से पहले ही कार्रवाई करना। इसका उद्देश्य सैन्य कार्रवाई के साथ-साथ राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक दबाव बनाना है, जिससे दूसरा पक्ष पीछे हट जाए।


1962 के युद्ध का उदाहरण

गोखले ने 1962 के भारत-चीन युद्ध का उदाहरण देते हुए कहा कि उस समय भारत की ओर से चीन पर हमले की कोई स्पष्ट तैयारी नहीं थी। फिर भी, चीन ने पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के बयानों और उस समय के अंतरराष्ट्रीय माहौल का लाभ उठाया। उस समय क्यूबा मिसाइल संकट के कारण वैश्विक ध्यान महाशक्तियों के तनाव पर केंद्रित था। गोखले के अनुसार, चीन ने इसी स्थिति में भारत के खिलाफ पहले कदम उठाए।


आक्रामकता को रक्षात्मक रूप में प्रस्तुत करना

गोखले के अनुसार, चीन की रणनीति का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि वह अपनी आक्रामक कार्रवाइयों को अक्सर रक्षात्मक कदम के रूप में पेश करता है। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने सत्ता में आने के बाद देश की कठिनाइयों और कमजोर अर्थव्यवस्था के लिए बाहरी कारणों को जिम्मेदार ठहराने वाली राजनीतिक कहानी बनाई। इससे पार्टी ने खुद को संकट से निकालने वाली शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया।


भारत-चीन संबंधों में 'सशस्त्र सह-अस्तित्व'

गोखले का मानना है कि भारत और चीन के संबंध अब 'सशस्त्र सह-अस्तित्व' के दौर में हैं। उनके अनुसार, पूर्ण युद्ध की संभावना फिलहाल कम है, लेकिन इसे पूरी तरह से नकारा भी नहीं जा सकता। चीन की रणनीति को समझने के लिए उसकी सैन्य गतिविधियों के साथ-साथ कूटनीति और राजनीतिक संदेशों पर ध्यान देना आवश्यक है। भविष्य में शी जिनपिंग के बाद की राजनीतिक अनिश्चितता वैश्विक अर्थव्यवस्था और सुरक्षा पर प्रभाव डाल सकती है।