चौधरी चरण सिंह का प्रधानमंत्री बनने का सफर: 23 दिन की कहानी
दिल्ली की सत्ता में बदलाव का समय
1979 की गर्मियों में, दिल्ली की राजनीतिक स्थिति अचानक बदल गई। जनता पार्टी, जिसने 1977 में इंदिरा गांधी को सत्ता से बाहर किया था, अब अपने अंतर्विरोधों में उलझ गई थी। मोरारजी देसाई की सरकार ने बहुमत खो दिया था, और चौधरी चरण सिंह तथा बाबू जगजीवन राम जैसे नेताओं के नाम प्रधानमंत्री पद के लिए चर्चा में थे। इस राजनीतिक संघर्ष में चरण सिंह कैसे प्रधानमंत्री बने, और कांग्रेस के समर्थन वाली सरकार महज 23 दिन में क्यों गिर गई?
1977 में जनता पार्टी की ऐतिहासिक जीत
1975 में लगे आपातकाल के बाद, देश की राजनीति में एक नया मोड़ आया। विपक्षी दलों ने इंदिरा गांधी के खिलाफ एकजुट होकर जनता पार्टी का गठन किया। 1977 के लोकसभा चुनाव में, जनता पार्टी ने 542 सदस्यीय सदन में 298 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया। मोरारजी देसाई 24 मार्च 1977 को प्रधानमंत्री बने।
यह स्वतंत्र भारत में पहली बार था जब कांग्रेस के अलावा किसी अन्य राजनीतिक गठबंधन ने केंद्र में सरकार बनाई। लेकिन, जनता पार्टी की विविधता धीरे-धीरे उसकी कमजोरी बन गई।
मोरारजी देसाई, चरण सिंह और जगजीवन राम: प्रमुख नेता
जनता सरकार में मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री थे, जबकि चौधरी चरण सिंह और बाबू जगजीवन राम भी महत्वपूर्ण नेता थे। चरण सिंह की राजनीति का आधार मुख्य रूप से किसान और ग्रामीण समाज था।
दूसरी ओर, मोरारजी देसाई अपने सख्त प्रशासनिक अनुशासन के लिए जाने जाते थे। इन दोनों नेताओं के बीच मतभेद गहरे होते गए, जो केवल नीतियों तक सीमित नहीं रहे।
जनता पार्टी में असली दरार
जनता पार्टी की आंतरिक राजनीति में कई मुद्दे तनाव पैदा कर रहे थे, जैसे आर्थिक नीति और इंदिरा गांधी के खिलाफ कार्रवाई। चार अलग-अलग राजनीतिक धाराओं के विलय से बनी जनता पार्टी में पुरानी पहचानें पूरी तरह खत्म नहीं हुई थीं।
चरण सिंह पहले भी 1978 में सरकार से अलग हो चुके थे, लेकिन जनवरी 1979 में वे फिर से लौटे और उपप्रधानमंत्री बने।
1979 में सत्ता का संकट
1979 आते-आते मोरारजी सरकार की ताकत घटने लगी। चरण सिंह के नेतृत्व वाले गुट के अलग होने से लोकसभा में पार्टी की ताकत 298 से घटकर 246 रह गई। 10 जुलाई 1979 को यशवंतराव चव्हाण ने मोरारजी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया।
इसके बाद, मोरारजी देसाई ने 15 जुलाई को प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी के सामने सबसे पहले यशवंतराव चव्हाण का नाम आया, लेकिन वे बहुमत जुटाने में असफल रहे।
चरण सिंह का प्रधानमंत्री बनना
चरण सिंह जनता पार्टी (सेक्युलर) के नेता बन चुके थे और उनके गुट को 76 सांसदों का समर्थन प्राप्त था। इसी आधार पर राष्ट्रपति ने उन्हें सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया। 28 जुलाई 1979 को चौधरी चरण सिंह ने प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली।
हालांकि, उनका कार्यकाल 28 जुलाई से 14 जनवरी 1980 तक दर्ज है, लेकिन अधिकांश समय वे कार्यवाहक प्रधानमंत्री रहे।
कांग्रेस का समर्थन और अचानक वापसी
चरण सिंह की सरकार को इंदिरा गांधी की कांग्रेस (आई) का समर्थन मिला, लेकिन यह समर्थन अचानक वापस ले लिया गया। 20 अगस्त 1979 को, उन्होंने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।
समर्थन वापसी का मुख्य कारण आपातकाल से जुड़े मामलों की जांच थी। चरण सिंह ने कहा कि वे लोकतंत्र की कीमत पर सत्ता में बने रहने के लिए तैयार नहीं थे।
चरण सिंह का छोटा कार्यकाल
चौधरी चरण सिंह का प्रधानमंत्री कार्यकाल केवल 23 दिन रहा। हालांकि, उनका नाम प्रधानमंत्री पद की सूची में दर्ज है, लेकिन उनका प्रभाव भारतीय राजनीति में बड़ा था।
वे उत्तर प्रदेश की राजनीति में किसान नेता के रूप में लंबे समय तक प्रभावशाली रहे।
जनता पार्टी का संकट
जनता पार्टी का संकट केवल एक नेता की महत्वाकांक्षा से नहीं, बल्कि कई परतों से उत्पन्न हुआ। विभिन्न विचारधाराओं का मेल, नेतृत्व की खींचतान, और इंदिरा गांधी के खिलाफ कार्रवाई का सवाल इसके प्रमुख कारण थे।
1979 में जो समीकरण बना, उसमें कभी विरोधी रहे नेता एक-दूसरे के समर्थन पर निर्भर हो गए।
