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छात्रों की राजनीति में भागीदारी: एक आवश्यक चर्चा

इस लेख में छात्रों की राजनीति में भागीदारी के महत्व पर चर्चा की गई है। यह बताया गया है कि कैसे राजनीतिक सक्रियता छात्रों के विकास में सहायक होती है। लेख में विभिन्न दृष्टिकोणों का उल्लेख किया गया है, जिसमें शिक्षा संस्थानों और अभिभावकों की राय शामिल है। साथ ही, यह भी बताया गया है कि कैसे छात्र आंदोलनों ने इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। क्या छात्रों को राजनीति में भाग लेना चाहिए? जानें इस लेख में।
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छात्रों की राजनीतिक भागीदारी का महत्व


छात्रों को राजनीति में सक्रिय रूप से भाग लेना चाहिए। चाहे वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, समाजवादी आंदोलन, वामपंथी आंदोलन, गांधीवादी आंदोलन या नए सीजेपी के समर्थक हों, इस प्रक्रिया से उन्हें बहुत कुछ सीखने को मिलता है।


हाल ही में, देश के युवाओं ने सरकार के खिलाफ फिर से आवाज उठाई है। यह कोई नई बात नहीं है; जब भी छात्र राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ सड़कों पर उतरते हैं, यह सवाल उठता है कि क्या छात्रों को राजनीति में भाग लेना चाहिए। हर समुदाय इस सवाल का उत्तर अपनी दृष्टि से देता है। सत्ता में रहने वाले राजनीतिक दल छात्र आंदोलनों की आलोचना करते हैं और उन्हें हतोत्साहित करते हैं। जब छात्र नियंत्रण में नहीं आते, तो उनका दमन भी किया जाता है। चाहे वह अंग्रेजी शासन के खिलाफ स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने वाले छात्र हों या 70 के दशक में गुजरात के नवनिर्माण आंदोलन में शामिल छात्र, जिन्होंने इंदिरा गांधी की सत्ता को पलट दिया था।


दिलचस्प बात यह है कि जो दल सत्ता में आकर छात्रों का दमन करते हैं, वही दल जब विपक्ष में होते हैं, तो छात्र आंदोलनों को बढ़ावा देकर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकते हैं। इसमें कोई दल अपवाद नहीं है। शिक्षा संस्थानों और अभिभावकों की दृष्टि से भी दो मत हैं। कुछ संस्थान और अभिभावक चाहते हैं कि उनके छात्र केवल पढ़ाई पर ध्यान दें, जबकि अन्य उन्हें रचनात्मक राजनीति में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।


यदि हम निष्पक्षता से मूल्यांकन करें, तो यह स्पष्ट होता है कि केवल पढ़ाई पर ध्यान देने वाले छात्रों का व्यक्तित्व पूर्ण रूप से विकसित नहीं होता। ऐसे छात्रों में सामाजिक सरोकार की कमी होती है। उनके व्यक्तित्व का विकास एकांगी हो जाता है। वहीं, जो छात्र शिक्षा के साथ सामाजिक सरोकार को बनाए रखते हैं, वे जीवन के संघर्षों में अधिक मजबूती से खड़े होते हैं।


मेरे अपने अनुभव में, मैंने विभिन्न माहौल में शिक्षा प्राप्त की है। मेरे पिता एक शिक्षाविद् थे, जबकि मेरी मां एक संस्कृत विदुषी थीं। उनके विचारों का मुझ पर गहरा प्रभाव पड़ा। 18 वर्ष की आयु में, मैंने पिछड़े गांवों में सेवा कार्य करने का निर्णय लिया।


1974 में, मैंने गांव की गरीबी और बदहाली का सामना किया। इस अनुभव ने मुझे समाज, राष्ट्र और धर्म के विषयों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रेरित किया। मैंने हमेशा समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझा और इसे अपने जीवन का हिस्सा बनाया।


इसलिए, मैं इस बात का समर्थन करता हूं कि छात्रों को राजनीति में सक्रिय रूप से भाग लेना चाहिए। प्रांतीय और केंद्र सरकार का यह दायित्व है कि वे छात्र राजनीति पर तब तक अंकुश न लगाएं, जब तक कि वह हिंसात्मक या विध्वंसात्मक न हो। छात्र राजनीति समाज की घुटन को बाहर निकालने का एक माध्यम है और यह सत्ता के हित में होता है।