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जंतर मंतर पर युवा आंदोलन: एक नई पीढ़ी की आवाज़

जंतर मंतर पर हाल ही में हुए युवा आंदोलन ने केंद्र सरकार की सोच को चुनौती दी है। हजारों छात्रों ने सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के मुद्दों का समर्थन किया, जो एक नई पीढ़ी की आकांक्षाओं का प्रतीक है। यह आंदोलन जाति और धर्म की पारंपरिक बाइनरी को तोड़ने की कोशिश कर रहा है। जानें इस आंदोलन के पीछे की वजहें और युवा वर्ग की मांगें, जो सस्ती और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से लेकर पारदर्शी परीक्षा प्रणाली तक फैली हुई हैं।
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जंतर मंतर पर छात्रों का प्रदर्शन

पिछले कुछ दिनों से चर्चा में रहे 'जेन जी' के आक्रोश का एक नज़ारा जंतर मंतर पर देखने को मिला। हजारों छात्र और युवा वहां इकट्ठा हुए और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक द्वारा उठाए गए मुद्दों का समर्थन किया। यह घटना केंद्र सरकार के लिए चौंकाने वाली थी, जो विपक्ष और सिविल सोसायटी के आंदोलनों को नजरअंदाज कर रही थी। सरकार ने शायद यह नहीं सोचा था कि युवा वर्ग, जो कभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति आकर्षित था, अब उनके खिलाफ प्रदर्शन कर सकता है।


इसलिए, कॉकरोच जनता पार्टी और सोनम वांगचुक के प्रदर्शन को सरकार ने गंभीरता से नहीं लिया। पिछले कुछ वर्षों में, सरकार ने ऐसे टूल्स विकसित कर लिए हैं, जिनसे हर आंदोलन की विश्वसनीयता को कमजोर किया जा सकता है। किसान और पहलवान आंदोलनों में भी इसी तरह के टूल्स का इस्तेमाल किया गया। आंदोलनकारियों को खाप या खालिस्तानियों से जोड़ने का प्रयास किया गया। सरकार को विश्वास था कि उसे किसी लोकप्रिय विरोध का सामना नहीं करना पड़ेगा।


लेकिन इस आत्मविश्वास ने सरकार को गलत साबित कर दिया। उसने छात्रों और युवाओं के इस प्रतिरोध को भी उसी नजरिए से देखा, जिससे वह असहमति और प्रतिरोध को देखती थी। यह आंदोलन एक पीढ़ी की आकांक्षाओं का प्रतीक है, जिसे किसी भी स्थापित सिद्धांत से परिभाषित नहीं किया जा सकता।


यह वह पीढ़ी है, जो पिछले चार दशकों से मंडल और कमंडल की राजनीति से प्रभावित नहीं हुई है। जंतर मंतर पर पहुंचे युवा और सोशल मीडिया पर समर्थन देने वाले लोग मंडल और मंदिर के आंदोलनों के प्रत्यक्षदर्शी नहीं हैं। इसलिए, यह आंदोलन जाति और धर्म की बाइनरी को तोड़ सकता है।


मंडल की राजनीति करने वाली पार्टियों ने पुरानी पीढ़ी को यकीन दिलाने में आसानी की, लेकिन 'जेन जी' के लिए यह समझना मुश्किल है। 14 से 28 साल के युवा समाज में एकरूपता देख रहे हैं। यह सही है कि मंडल के बाद की राजनीति ने समाज की तस्वीर बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, लेकिन अब की पीढ़ी को पुरानी तस्वीर दिखाकर नहीं जोड़ा जा सकता।


इसी तरह, मंदिर आंदोलन का भी यही हाल है। 'जेन जी' ने उस आंदोलन को नहीं देखा है। इसलिए, पुरानी यादों को ताजा करके इस पीढ़ी के युवाओं की भावनाओं को लंबे समय तक नहीं जगाया जा सकता। 2014 में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए वोट देने वाले लोगों ने उनके विकास के वादों पर भरोसा किया था। लेकिन बाद में चुनावों में ये मुद्दे गौण होते गए।


इस बार युवाओं के आंदोलन ने जाति और धर्म की बाइनरी को चुनौती दी है। देश की 60 से 65 प्रतिशत आबादी 35 साल से कम उम्र के लोगों की है। जंतर मंतर के प्रदर्शन ने दिखा दिया है कि युवा निरंतर जाति और धर्म के मुद्दों पर नहीं चल सकते। यह आंदोलन युवाओं की निराशा और आक्रोश की अभिव्यक्ति है।


युवाओं को सस्ती और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा चाहिए। वे चाहते हैं कि परीक्षा समय पर हों और परिणाम भी समय पर आएं। जब सरकार परीक्षा आयोजित करने में असफल होती है, तो युवाओं में निराशा बढ़ती है।


आज का युवा किसी पारंपरिक सिद्धांत से बंधा नहीं है। अगर पहले था भी, तो अब मोहभंग की स्थिति है। ऐसे युवाओं से लड़ना सरकार के लिए आसान नहीं होगा। सरकार को समझना होगा कि सोनम वांगचुक किसी विचारधारात्मक आंदोलन का नेतृत्व नहीं कर रहे, बल्कि एक पीढ़ी के आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं। सरकार को पहल करनी चाहिए और शिक्षा व परीक्षा की व्यवस्था को सुधारना चाहिए।