टाटा समूह की लिस्टिंग पर सरकार की कोशिशें: क्या है असली मुद्दा?
टाटा समूह की स्थिति
एक पुरानी अंग्रेजी कहावत है, 'नेवर फिक्स अ थिंग व्हीच इज नॉट ब्रोकेन', जिसका अर्थ है कि ऐसी चीजों को ठीक करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए जो ठीक हैं। टाटा समूह के संदर्भ में, सरकार एक ऐसी स्थिति को सुधारने का प्रयास कर रही है जो वास्तव में ठीक है। सरकार ने यह निर्णय लिया है कि टाटा संस को सूचीबद्ध किया जाएगा, जबकि टाटा समूह की कई कंपनियां पहले से ही शेयर बाजार में सूचीबद्ध हैं।
टाटा संस, जो टाटा समूह में 12 प्रतिशत हिस्सेदारी रखता है, को सूचीबद्ध करने के लिए विभिन्न उपाय किए जा रहे हैं। इसमें टाटा ट्रस्ट से जुड़े कुछ ट्रस्टी और समूह के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन शामिल हैं। इसके अलावा, मुंबई के चैरिटी कमिश्नर भी इस दिशा में प्रयास कर रहे हैं कि 66 प्रतिशत हिस्सेदारी वाले टाटा ट्रस्ट को अपने निर्णय लेने से रोका जा सके।
इस स्थिति ने टाटा ट्रस्ट के चेयरमैन नोएल टाटा को असहाय बना दिया है। पहले तो पारसी समुदाय ने इसे गंभीरता से नहीं लिया, लेकिन अब कम से कम आठ पारसी संगठनों ने नोएल टाटा का समर्थन किया है। उनका कहना है कि कंपनी पारसी मूल्यों के अनुसार चल रही है और इसे ऐसे ही चलने दिया जाना चाहिए। उन्होंने एक उदाहरण भी दिया कि कैसे तमिलनाडु मर्केंटाइल बैंक के टेकओवर की कोशिश को नाडार समूहों ने विफल कर दिया था। आगे क्या होगा, यह देखना दिलचस्प होगा।
