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तसलीमा नसरीन की 19 साल बाद बांग्लादेश वापसी: एक साहित्यिक यात्रा

प्रसिद्ध लेखिका तसलीमा नसरीन ने 19 साल बाद बांग्लादेश में कदम रखा है। उनकी वापसी को लेकर उन्होंने खुशी और दर्द दोनों का अनुभव साझा किया। कोलकाता में एक महत्वपूर्ण साहित्यिक कार्यक्रम से पहले, तसलीमा ने कहा कि यह उनकी आवाज की वापसी का प्रतीक है। इस यात्रा के पीछे की कहानी, बांग्लादेश और बंगाल छोड़ने के कारण, और उनके साहित्यिक कार्यक्रम में भाग लेने की उम्मीदों के बारे में जानें।
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तसलीमा नसरीन की बांग्लादेश वापसी

प्रसिद्ध लेखिका तसलीमा नसरीन ने शुक्रवार को 19 साल बाद बांग्लादेश में कदम रखा। 1994 में बांग्लादेश छोड़ने के बाद, वह कोलकाता में बस गई थीं। उनके एक पुस्तक के विवाद के कारण उन्हें फिर से कोलकाता छोड़ना पड़ा। अब, उनकी वापसी को लेकर उन्होंने कहा कि यह खुशी और दर्द दोनों का अनुभव है। कोलकाता एयरपोर्ट पर उनका स्वागत हुआ, जहां उन्होंने कहा कि यह उस आवाज की वापसी का प्रतीक है जिसे कट्टरपंथियों ने दबाने की कोशिश की थी।


साहित्यिक कार्यक्रम से पहले की यात्रा

तसलीमा का यह आगमन एक महत्वपूर्ण साहित्यिक कार्यक्रम से पहले हुआ है, जिसे पश्चिम बंगाल की नई बीजेपी सरकार के तहत आयोजित किया जा रहा है। नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर तसलीमा ने हाथ जोड़कर लोगों का अभिवादन किया और कहा, 'वापस आकर मुझे बहुत अच्छा लग रहा है।' यह उनकी नवंबर 2007 के बाद कोलकाता की पहली यात्रा है। उस समय उन्हें अपनी रचनाओं के विरोध में हिंसक प्रदर्शनों के कारण शहर छोड़ना पड़ा था।


तसलीमा की भावनाएं

बांग्लादेश से निर्वासन के बाद, तसलीमा ने कोलकाता को हमेशा अपने घर जैसा बताया। वह रवींद्र सदन में कट्टरपंथ-विरोधी साहित्यिक कार्यक्रम में भाग लेंगी, जहां उम्मीद है कि वह कविता का पाठ करेंगी। इस कार्यक्रम में मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी और अन्य प्रमुख लेखक भी शामिल होंगे। हालांकि, यह कार्यक्रम एक साहित्यिक आयोजन के रूप में देखा जा रहा है, लेकिन पश्चिम बंगाल में बीजेपी सरकार बनने के बाद यह राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो गया है।


तसलीमा की वापसी का महत्व

अपनी यात्रा से पहले, तसलीमा ने कहा, 'मुझे ऐसा लगता है जैसे मैं अपने ही देश लौट रही हूं।' उन्होंने यह भी कहा कि वह 'खुशी, लेकिन साथ ही दर्द' के साथ लौट रही हैं। उन्होंने याद किया कि कोलकाता ने उन्हें घर, दोस्त और अपनापन दिया था, लेकिन बाद में उन्हें वहां से जाने के लिए मजबूर होना पड़ा।


बांग्लादेश और बंगाल छोड़ने का कारण

तसलीमा ने 1994 में अपने उपन्यास 'लज्जा' के कारण जान से मारने की धमकियों के चलते बांग्लादेश छोड़ा। 2004 में वह कोलकाता में बस गईं, लेकिन नवंबर 2007 में उनकी आत्मकथा 'द्विखंडितो' के कुछ हिस्सों पर हिंसक विरोध के कारण उन्हें फिर से शहर छोड़ना पड़ा। इस किताब पर पहले से ही प्रतिबंध था। विरोध बढ़ने पर, तत्कालीन सरकार ने उन्हें शहर छोड़ने के लिए कहा।


वापसी की कोशिशें

करीब दो दशकों तक उनकी वापसी संभव नहीं हो सकी, जबकि लेखकों और नागरिक समाज ने समय-समय पर उनकी वापसी की अपील की। यह मुद्दा पिछले साल फिर से चर्चा में आया, जब बीजेपी के सांसद ने संसद में उनकी वापसी सुनिश्चित करने की मांग की। उन्होंने तसलीमा को इस्लामी कट्टरपंथ के खिलाफ एक निर्भीक आवाज बताया।