दलाई लामा का भारत में शरण: तिब्बत से भागने की कहानी
दलाई लामा का भारत में आगमन
नई दिल्ली - मार्च 1959 में, जब चीन की सेना दलाई लामा तेनजिन ग्यात्सो का पीछा कर रही थी, तब उन्होंने अपने कुछ सहयोगियों के साथ अरुणाचल प्रदेश के तवांग में शरण ली। भारतीय सेना और स्थानीय प्रशासन ने उन्हें तुरंत सुरक्षा प्रदान की और बाद में उन्हें असम ले जाया गया। भारत में आने के कुछ हफ्तों बाद, दलाई लामा की मुलाकात तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से हुई, जहां यह आधिकारिक रूप से घोषित किया गया कि भारत ने उन्हें शरण दी है।
दलाई लामा का प्रारंभिक जीवन और तिब्बत में स्थिति
दलाई लामा तेनजिन ग्यात्सो का जन्म 6 जुलाई 1935 को तिब्बत के तक्तसेर गांव में हुआ। तिब्बती परंपरा के अनुसार, उन्हें दो साल की उम्र में उनके पूर्ववर्ती 13वें दलाई लामा के पुनर्जन्म के रूप में मान्यता दी गई। दलाई लामा करुणा के बोधिसत्व के अवतार माने जाते हैं। 1950 में, जब तिब्बत चीन के खतरे में था, उन्हें राजनीतिक सत्ता संभालने के लिए कहा गया। 1954 में, उन्होंने बीजिंग में चीनी नेताओं से बातचीत की।
तिब्बत से भागने की घटना
10 मार्च 1959 को, चीनी जनरल झांग चेनवू ने दलाई लामा को एक कार्यक्रम में आमंत्रित किया, जिसमें शर्त रखी गई कि उनके साथ कोई तिब्बती सैनिक नहीं होगा। इस शर्त ने ल्हासा में चिंता पैदा कर दी। 17 मार्च को, नेचुंग ओरेकल से परामर्श के बाद, दलाई लामा को तुरंत तिब्बत छोड़ने का निर्देश मिला। उसी रात, उन्होंने एक साधारण सैनिक के वेश में ल्हासा से भागने का निर्णय लिया।
भारत में निर्वासन और योगदान
दलाई लामा और उनके अनुयायी 31 मार्च 1959 को भारतीय सीमा पर पहुंचे, जहां भारतीय सेना ने उनकी सुरक्षा की। दलाई लामा के आगमन से पहले भी कई तिब्बती भारत में शरण ले चुके थे। 1960 से, दलाई लामा धर्मशाला में निवास कर रहे हैं, जिसे 'छोटा ल्हासा' कहा जाता है। उन्होंने तिब्बत के मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र से अपील की और कई प्रस्ताव पारित कराए। 1963 में, उन्होंने तिब्बत के लिए एक मसौदा संविधान जारी किया।
