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दिल्ली कोर्ट ने सोनिया गांधी के खिलाफ FIR की मांग पर निचली अदालत का आदेश रद्द किया

दिल्ली की एक अदालत ने सोनिया गांधी पर FIR दर्ज करने की मांग से जुड़े मामले में निचली अदालत के आदेश को रद्द कर दिया है। यह मामला 1980 की मतदाता सूची में उनके नाम को लेकर उठाया गया था। अदालत ने मामले को फिर से ACJM कोर्ट को भेजते हुए निर्देश दिया कि सभी पक्षों को सुनने के बाद विस्तृत आदेश पारित किया जाए। जानें इस मामले की पूरी जानकारी और अदालत की टिप्पणियाँ।
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दिल्ली कोर्ट का नया आदेश

दिल्ली की एक अदालत ने सोनिया गांधी पर FIR दर्ज करने की मांग से संबंधित मामले में निचली अदालत के निर्णय को रद्द कर दिया है। पहले, निचली अदालत ने FIR दर्ज करने की याचिका को खारिज कर दिया था। यह याचिका 1980 की मतदाता सूची में सोनिया गांधी के नाम को लेकर उठाई गई थी। अब, अदालत ने इस मामले को फिर से ACJM कोर्ट को भेज दिया है, जहां नए आदेश के साथ मामले पर विचार किया जाएगा।


निचली अदालत का आदेश

द्वारका कोर्ट के विशेष जज विशाल गोगने ने कहा कि निचली अदालत का आदेश बिना पर्याप्त कारणों के दिया गया था। उन्होंने निर्देश दिया कि मामले में सभी पक्षों को सुनने के बाद विस्तृत आदेश पारित किया जाए। अगली सुनवाई की तारीख 29 सितंबर निर्धारित की गई है।


मामले का विवरण

यह मामला विकास त्रिपाठी द्वारा दायर याचिका से संबंधित है, जिसमें उन्होंने सोनिया गांधी के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की मांग की थी। उनका आरोप है कि सोनिया गांधी का नाम 1980 में नई दिल्ली विधानसभा क्षेत्र की मतदाता सूची में शामिल किया गया, जबकि उन्होंने भारतीय नागरिकता 1983 में प्राप्त की थी।


शिकायतकर्ता के आरोप

विकास त्रिपाठी ने यह भी कहा कि सोनिया गांधी का नाम 1982 में मतदाता सूची से हटाया गया और फिर 1983 में दोबारा जोड़ा गया। उन्होंने आरोप लगाया कि मतदाता सूची में नाम जोड़ने के लिए फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया, जिसके आधार पर FIR दर्ज करने की मांग की गई।


कोर्ट की टिप्पणियाँ

विशाल गोगने ने कहा कि आरोपों के स्पष्ट कारण देना आवश्यक है। अदालत को यह देखना होगा कि क्या किसी गैर-नागरिक का नाम वोटर लिस्ट में गलत तरीके से जोड़ा गया है। उन्होंने कहा कि निचली अदालत ने 1980, 1982 और 1983 की मतदाता सूचियों पर ठीक से चर्चा नहीं की।


ACJM कोर्ट का निर्णय

दिल्ली कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह खुद ACJM की जगह लेकर FIR दर्ज करने के अनुरोध पर निर्णय नहीं ले सकती। अदालत ने कहा कि FIR दर्ज करने का अधिकार मजिस्ट्रेट के पास है, इसलिए मामले को ACJM के पास वापस भेजा गया है। ACJM को आरोपों के आधार पर उचित आदेश पारित करना होगा।