दिल्ली पुलिस का ऐतिहासिक प्रदर्शन: 1966 में बदलाव की कहानी
दिल्ली पुलिस का प्रदर्शन
सोमवार को दिल्ली पुलिस अचानक सुर्खियों में आ गई। कुछ दिन पहले जब पुलिस प्रदर्शनकारियों को रोक रही थी, उसी समय उनके अपने जवान और अधिकारी भी प्रदर्शन में शामिल हो गए। इस प्रदर्शन के प्रमुख चेहरे ACP मनस्वी वशिष्ठ को निलंबित कर दिया गया है। आमतौर पर, पुलिस के लोग प्रदर्शन नहीं करते, लेकिन यह पहली बार नहीं है जब दिल्ली पुलिस के जवानों ने ऐसा किया है। पहले भी, दिल्ली पुलिस के जवानों ने कुछ ऐतिहासिक प्रदर्शन किए हैं। इनमें से एक प्रदर्शन 1966 में हुआ था, जिसके परिणामस्वरूप कई महत्वपूर्ण बदलाव आए। एक बड़ा बदलाव यह था कि निचली रैंक के जवानों को हाफ पैंट से मुक्ति मिली, जिसके बाद सभी पुलिसकर्मी फुल पैंट में नजर आने लगे।
दिल्ली पुलिस की वर्दी में बदलाव
आज, दिल्ली पुलिस को खाकी वर्दी में देखा जा सकता है, जिसमें पैंट और शर्ट दोनों हल्के खाकी रंग की होती हैं। दूसरी वर्दी में गहरे खाकी रंग की कमीज और जैकेट होती है, जबकि पैंट हल्के खाकी रंग की होती है। शर्ट हाफ या फुल हो सकती है, लेकिन सभी पुलिसकर्मी फुल पैंट ही पहनते हैं। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि 1966 से पहले निचली रैंक के पुलिसकर्मी हाफ पैंट पहनते थे। पुरानी फिल्मों में भी ऐसे पुलिसकर्मियों को देखा जा सकता है। 1966 के आंदोलन के बाद ही इस पर बदलाव किया गया।
1966 का ऐतिहासिक प्रदर्शन
इतिहास में बहुत कम मौके आए हैं जब पुलिस के जवान प्रदर्शन पर उतरे हों। 1966 में, दिल्ली पुलिस के लगभग 7,000 जवान वर्दी पहनकर सड़कों पर उतरे थे। उनकी मुख्य मांगें थीं: काम के निश्चित घंटे, बेहतर कार्य स्थितियां और जीवन स्तर में सुधार। इसके अलावा, उन्होंने यूनियन बनाने का अधिकार भी मांगा। उस समय इंदिरा गांधी नई प्रधानमंत्री बनी थीं और सत्ता संभालने की कोशिश कर रही थीं।
प्रदर्शन करने वाले पुलिसकर्मियों में ज्यादातर निचली रैंक के कर्मचारी थे, जिन्होंने दिल्ली पुलिस यूनियन नामक संगठन बनाने की घोषणा की। इस यूनियन के बैनर तले 12 किलोमीटर लंबा पैदल मार्च राष्ट्रपति भवन तक निकाला गया। इंदिरा गांधी की सरकार इस प्रदर्शन से चौंक गई और तुरंत कार्रवाई करने का प्रयास किया।
प्रदर्शन का परिणाम
इंदिरा गांधी चाहती थीं कि प्रदर्शनकारियों को तुरंत खदेड़ दिया जाए, लेकिन सीमा सुरक्षा बल के महानिदेशक के एफ रुस्तमजी ने बातचीत की कोशिश की, जो बेनतीजा रही। यह प्रदर्शन लगभग एक साल तक चला। अंततः, जस्टिस जी डी खोसला की अध्यक्षता में 1968 में खोसला आयोग ने पुलिसकर्मियों के काम के घंटे कम करने और उनके कार्य स्थितियों में सुधार की सिफारिश की। हालांकि, केंद्र सरकार ने यूनियन बनाने की अनुमति नहीं दी, और आज भी दिल्ली पुलिस का कोई यूनियन नहीं है।
पुलिस की पुरानी वर्दी
पुराने समय में, केवल अधिकारियों को फुल पैंट पहनने की अनुमति थी, जबकि कांस्टेबल हाफ पैंट पहनते थे। एसएचओ फुल पैंट और पगड़ी पहनते थे, जबकि महिला कांस्टेबल साड़ी और ब्लाउज पहनती थीं। माउंटेड पुलिसकर्मी घोड़े और ऊंट पर गश्त करते थे और वे चुस्त पायजामे जैसे फुल पैंट पहनते थे। खोसला कमीशन की सिफारिशों के आधार पर, जब बदलाव हुए, तब निचली रैंक के पुलिसकर्मियों को भी फुल पैंट पहनने की अनुमति दी गई।
