दिल्ली में प्रदर्शन: 2011 और 2026 के बीच समानताएँ
दिल्ली में विरोध प्रदर्शन की पृष्ठभूमि
दिल्ली, देश की राजधानी, एक बार फिर से विरोध प्रदर्शनों का गवाह बन रही है। लगभग 15 साल का अंतर है, और सत्ता में परिवर्तन भी हुआ है। 2011 में कांग्रेस की सरकार थी, जबकि अब भारतीय जनता पार्टी सत्ता में है। फिर भी, विरोध की लहरें समान हैं। उस समय भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठी थी, और अब पेपर लीक के मुद्दे पर लोग सड़कों पर हैं। सत्ताधारी पार्टी ने कई गलतियाँ की हैं, जिससे विरोध को नियंत्रित करना मुश्किल हो गया है। हाल ही में प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज ने यह संकेत दिया है कि बीजेपी भी वही गलतियाँ कर रही है जो कांग्रेस ने 2011 में की थीं।
प्रदर्शन की अनदेखी
दिल्ली में हो रहे प्रदर्शनों को शुरू में नजरअंदाज करना, संवाद स्थापित न करना और स्थिति को बिगड़ने देना, ये सब बातें 2011 में भी देखी गई थीं। दोनों बार, विरोध प्रदर्शन किसी पारंपरिक संगठन के बैनर तले नहीं हुए, जिससे सत्ताधारी पार्टी ने इसे हल्के में लिया। जब तक स्थिति की गंभीरता समझ में आई, तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
प्रारंभिक गलतियाँ
दोनों आंदोलनों में यह देखा गया कि नए बैनर तले प्रदर्शन शुरू हुए। 2011 में इंडिया अगेंस्ट करप्शन के बैनर तले आंदोलन शुरू हुआ था, जिसे कांग्रेस ने खारिज कर दिया था। नतीजतन, आंदोलन को समय मिला और यह व्यापक हो गया। इस बार भी, जब NEET पेपर लीक के खिलाफ प्रदर्शन शुरू हुए, तो सरकार ने इसे हल्के में लिया।
संवाद की कमी
2011 में अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान सरकार ने संवाद स्थापित करने में देरी की। इसी तरह, वर्तमान में भी प्रदर्शनकारियों से बातचीत नहीं की गई। जब प्रदर्शन तेज हुए, तब जाकर सरकार ने स्थिति को संभालने की कोशिश की।
सरकार का अड़ियल रवैया
अन्ना आंदोलन के समय भी सरकार ने प्रदर्शनकारियों की बात नहीं मानी। इस बार भी, नीट पेपर लीक के बाद सरकार ने इसे टालने की कोशिश की। जब दबाव बढ़ा, तब सीबीआई जांच का आदेश दिया गया।
ट्रिगर प्वाइंट
अन्ना आंदोलन के समय सरकार ने एक बड़ा ट्रिगर प्वाइंट दिया जब अन्ना को गिरफ्तार किया गया। इसी तरह, हाल ही में सोनम वांगचुक को उठाने से भीड़ में वृद्धि हुई। यह दर्शाता है कि 2011 और 2026 में सत्ताधारी पार्टी की गलतियाँ समान हैं।
