दिल्ली हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय: नाबालिग पत्नी के मामले में मुस्लिम पर्सनल लॉ की सुरक्षा नहीं
दिल्ली हाईकोर्ट का POCSO मामले पर निर्णय
दिल्ली हाईकोर्ट का निर्णय: दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत विवाह को वैध मानने से किसी व्यक्ति को 18 वर्ष से कम उम्र की पत्नी के साथ शारीरिक संबंध बनाने के मामले में POCSO और BNS के तहत आपराधिक कार्रवाई से छूट नहीं मिलती। न्यायमूर्ति संजीव नरूला ने यह स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत कानून बच्चों की सुरक्षा से संबंधित आपराधिक कानूनों को दरकिनार नहीं कर सकते। अदालत ने आरोपी के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द करने से इनकार कर दिया, हालांकि यह भी स्पष्ट किया कि इस स्तर पर आरोपी को दोषी नहीं ठहराया गया है और मामले का अंतिम निर्णय ट्रायल कोर्ट द्वारा सबूतों के आधार पर किया जाएगा।
मामले का संक्षिप्त विवरण
याचिकाकर्ताओं के अनुसार, दोनों ने दिसंबर 2024 में विवाह किया था। उस समय महिला की उम्र लगभग 16 वर्ष 3 महीने थी, जबकि पुरुष की उम्र लगभग 28 वर्ष थी। याचिका में कहा गया कि यह विवाह दोनों की इच्छा और परिवारों की सहमति से हुआ था। इसके बाद दोनों एक साथ रहने लगे और महिला गर्भवती हो गई। सरकारी अस्पताल में इलाज के दौरान उसकी उम्र का पता चला, जिसके बाद पुलिस ने FIR दर्ज की। FIR में BNS की धारा 64(1) और POCSO एक्ट की धारा 6 के तहत आरोप लगाए गए।
याचिकाकर्ताओं की दलीलें
याचिका में यह तर्क दिया गया कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार, युवावस्था प्राप्त कर चुकी मुस्लिम लड़की विवाह करने में सक्षम मानी जाती है। इसलिए, यदि विवाह वैध माना जाता है, तो पति-पत्नी के बीच बने शारीरिक संबंध को आपराधिक मामला नहीं माना जाना चाहिए। महिला ने भी विवाह को अपनी इच्छा से हुआ बताया और आरोपी के पक्ष में राहत की मांग की थी।
हाईकोर्ट का दृष्टिकोण
हाईकोर्ट ने विवाह की वैधता और आपराधिक कानून के तहत जिम्मेदारी को अलग-अलग मुद्दे माना। अदालत ने कहा कि भले ही मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत विवाह को वैध माना जाए, इससे 18 वर्ष से कम उम्र की पत्नी के साथ शारीरिक संबंध को POCSO या BNS के दायरे से बाहर नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि शादी से किसी नाबालिग की कानूनी उम्र नहीं बदलती। यदि कोई लड़की विवाह के समय 16 वर्ष की है, तो विवाह के बाद भी कानून की नजर में उसकी उम्र 16 वर्ष ही रहेगी।
18 वर्ष से कम उम्र का बच्चा
POCSO एक्ट के तहत 18 वर्ष से कम उम्र के व्यक्ति को बच्चा माना जाता है। कानून में बच्चे के साथ निर्धारित प्रकार के यौन कृत्यों को अपराध माना गया है और बच्चे की सहमति को वयस्कों की कानूनी सहमति के बराबर नहीं माना जाता। अदालत ने इसी आधार पर कहा कि परिवार की सहमति, विवाह या लड़की की अपनी सहमति जैसे तथ्य POCSO के तहत निर्धारित उम्र की सीमा को नहीं बदल सकते। हाईकोर्ट ने BNS की धारा 63 का भी उल्लेख किया। अदालत के अनुसार, 18 वर्ष से कम उम्र की महिला के साथ शारीरिक संबंध के मामले में वैवाहिक अपवाद भी लागू नहीं होता।
FIR रद्द करने की याचिका पर कोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने मामले में दर्ज FIR को रद्द करने की याचिका खारिज कर दी। साथ ही पुलिस के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई और मुआवजे की मांग को भी स्वीकार नहीं किया गया। इस मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि नाबालिग विवाह और POCSO को लेकर अलग-अलग मामलों में अदालतों के सामने अलग परिस्थितियां रही हैं।
