धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा: छात्रों के आंदोलन का प्रभाव
शिक्षा मंत्री का इस्तीफा और छात्रों की खुशी
शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने छात्रों के व्यापक विरोध के बीच अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। जंतर-मंतर पर छात्रों के बीच खुशी की लहर दौड़ गई है। कॉकरोच जनता पार्टी ने भी इस इस्तीफे पर खुशी व्यक्त की और छात्रों ने एकता के नारे लगाए। धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पत्र में कहा, 'मैंने देश और छात्रों के हित में इस्तीफा दिया है।'
उन्होंने आगे लिखा, 'पिछले 10 दिनों की घटनाओं से मैं दुखी था।' यह सवाल उठता है कि मोदी सरकार, जो आमतौर पर दबाव में नहीं झुकती, इस बार क्यों झुकी? क्या सरकार के पास इस्तीफे के अलावा कोई विकल्प नहीं था? आइए, इस पूरे मामले को समझते हैं।
मोदी सरकार का इस्तीफा देने का इतिहास
कहा जाता है कि मोदी सरकार में इस्तीफे नहीं होते हैं। यह सरकार किसी भी दबाव में नहीं झुकती। हालांकि, यह दावा सही नहीं है। 17 अक्टूबर 2018 को एमजे अकबर ने #MeToo अभियान के बाद मंत्री पद से इस्तीफा दिया था। उन पर कई महिला पत्रकारों के यौन उत्पीड़न का आरोप था।
अब सवाल यह है कि धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देने के लिए मजबूर क्यों होना पड़ा? अगर उन्हें इस्तीफा देना था, तो पहले क्यों नहीं दिया? आखिरकार, 49 दिनों बाद सरकार को क्यों झुकना पड़ा?
सोनम वांगचुक का समर्थन और आंदोलन की शुरुआत
6 जून को कॉकरोच जनता पार्टी ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन शुरू किया। शुरुआत में भीड़ कम थी, लेकिन 28 जून को सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने आंदोलन का समर्थन किया और अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की। 18 जून को दिल्ली पुलिस ने उन्हें धरनास्थल से हटाया और सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया। यह घटना निर्णायक साबित हुई, जिससे देश में संदेश गया कि सोनम वांगचुक के साथ अन्याय हुआ है।
पुलिस कार्रवाई और आंदोलन का उग्र होना
20 जुलाई को कॉकरोच जनता पार्टी ने 'संसद चलो' मार्च शुरू किया, जो उग्र हो गया। छात्रों और पुलिस के बीच हिंसक झड़पें हुईं, जिसमें कई छात्रों पर लाठियां चलाई गईं। सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो ने आंदोलन को और भड़काया। इस घटना के बाद सरकार पर दबाव बढ़ा और पुलिस को नरमी बरतने की सलाह दी गई।
सरकार की चिंताएं और आंदोलन का विस्तार
जंतर-मंतर के बाद छात्रों का आंदोलन अन्य शहरों में भी फैलने लगा। मुंबई में भारी हंगामा हुआ और बिहार में उग्र प्रदर्शनों ने सरकार की चिंता बढ़ा दी। छोटे शहरों में भी प्रदर्शन बढ़ने लगे, जिससे सरकार की चिंताएं और बढ़ गईं।
कॉकरोच जनता पार्टी और छात्रों ने सरकार के सामने केवल इस्तीफे को विकल्प रखा। सरकार ने छात्रों के धैर्य का परीक्षण किया, लेकिन आंदोलन और उग्र होता गया। आंदोलनकारियों ने स्पष्ट कर दिया कि बिना इस्तीफे के कुछ भी स्वीकार नहीं किया जाएगा।
नेतृत्वविहीन आंदोलन और सरकार की स्थिति
हालांकि कॉकरोच जनता पार्टी प्रदर्शन का नेतृत्व कर रही थी, लेकिन कोई एक नेता छात्रों पर नियंत्रण नहीं रखता था। विभिन्न गुट जंतर-मंतर में मौजूद थे, जिससे सरकार को झुकने पर मजबूर होना पड़ा। सरकार नहीं चाहती थी कि दिल्ली के संवेदनशील क्षेत्र में कानून-व्यवस्था की कोई बड़ी चुनौती खड़ी हो।
अंतरराष्ट्रीय उदाहरण और सरकार की चिंताएं
पिछले दो वर्षों में श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल में छात्रों के आंदोलनों ने सरकारों के लिए बड़ी चुनौतियां खड़ी की हैं। जंतर-मंतर में कुछ प्रदर्शनकारियों ने बांग्लादेश और श्रीलंका बनाने की धमकी दी।
धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पत्र में कहा, 'मैं देश की युवाशक्ति को भ्रम के कुचक्र में फंसने नहीं दूंगा।' उन्होंने यह भी कहा कि देश की एकता बनी रहे और छात्रों का भविष्य कानूनी पेचीदगियों में न उलझे, इसी सोच के चलते उन्होंने इस्तीफा दिया।
