निर्वाचन आयोग की प्रक्रिया पर सवाल: उच्च पदस्थ व्यक्तियों को नोटिस
निर्वाचन आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया
निर्वाचन आयोग की प्रक्रिया में विसंगतियाँ: निर्वाचन आयोग द्वारा मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान, आयोग के आयुक्त एस.एस. संधू को भी विसंगति का नोटिस प्राप्त हुआ है। यह स्थिति दर्शाती है कि इस प्रक्रिया की योजना कितनी अव्यवस्थित थी। यदि आयोग के प्रमुख अपने दस्तावेज सही नहीं करवा पाए, तो आम नागरिकों से ऐसी अपेक्षा करना कितना उचित है?
यह केवल संधू की बात नहीं है; कई प्रमुख व्यक्तियों जैसे विदेश मंत्री, पूर्व उप-राष्ट्रपति, और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीशों को भी ऐसे नोटिस मिले हैं। राष्ट्रीय राजधानी में 33 लाख से अधिक मतदाताओं को 'लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी' या 'नो मैपिंग' के आधार पर नोटिस भेजे गए हैं।
अन्य राज्यों में भी स्थिति गंभीर है। जब तक आम मतदाताओं की बात थी, तब तक इस मुद्दे पर चर्चा नहीं हुई। लेकिन जब यह उच्च पदस्थ व्यक्तियों तक पहुंचा, तो निर्वाचन आयोग को स्पष्टीकरण देने के लिए मजबूर होना पड़ा। आयोग ने कहा कि ऑटो-जनरेटेड नोटिस का अर्थ यह नहीं है कि मतदाता का नाम हटा दिया गया है।
हालांकि, यह प्रक्रिया मतदाताओं पर अतिरिक्त बोझ डालती है। क्या निर्वाचन आयोग का कर्तव्य नहीं है कि वह अधिकतम मतदाताओं को मतदान प्रक्रिया में शामिल करे? रसूखदार व्यक्तियों के पास दस्तावेजों को सही कराने के लिए सहायक तंत्र होता है, लेकिन करोड़ों मतदाता जो इस प्रक्रिया के कारण प्रभावित हुए हैं, उनकी समस्याओं का समाधान कौन करेगा?
