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नेपाल में Gen-Z आंदोलन के एक साल बाद कानूनी विवाद

नेपाल में Gen-Z आंदोलन को एक साल पूरा होने पर कानूनी मामलों की वापसी को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। 1,700 से अधिक आरोपियों में से केवल 300 के मामलों को वापस लिया जाएगा, जिससे युवाओं में असंतोष फैल गया है। रिटायर्ड जस्टिस बाबूराम रेगमी की समिति ने स्पष्ट किया है कि गंभीर आरोपों वाले मामलों को वापस नहीं लिया जा सकता। इस स्थिति ने बालेन सरकार को राजनीतिक संकट में डाल दिया है, जबकि आंदोलनकारी युवाओं ने इसे विश्वासघात करार दिया है। जानें इस मुद्दे पर और क्या हो रहा है।
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नेपाल में Gen-Z आंदोलन का एक साल पूरा

काठमांडू: नेपाल में ऐतिहासिक Gen-Z आंदोलन को एक वर्ष पूरा होने पर कानूनी मामलों की वापसी को लेकर नया विवाद उत्पन्न हो गया है। केपी शर्मा ओली के शासन में मेटा बैन के खिलाफ उठे युवा आंदोलन के दौरान 1,700 से अधिक लोगों पर आरोप लगाए गए थे, लेकिन केवल 300 मामलों को ही वापस लेने का निर्णय लिया गया है। रिटायर्ड जस्टिस बाबूराम रेगमी की अध्यक्षता में बनी उच्चस्तरीय समिति की सिफारिश के बाद आंदोलन से जुड़े युवाओं और छात्र नेताओं में असंतोष फैल गया है। बालेन सरकार ने मामलों की समीक्षा और वापसी की प्रक्रिया के लिए इस समिति का गठन किया था।


सामान्य प्रदर्शनकारियों को राहत

ई-कांतिपुर की रिपोर्ट के अनुसार, सोशल मीडिया बैन के खिलाफ हुए विरोध-प्रदर्शन के दौरान कुल 445 मामले दर्ज किए गए थे, जिसमें 1,778 लोगों को आरोपी बनाया गया था। बाबूराम रेगमी समिति ने स्पष्ट किया है कि राहत केवल उन मामलों में दी जा सकती है जो शांतिपूर्ण प्रदर्शनों से संबंधित हैं। समिति के निष्कर्षों के अनुसार, जिन प्रदर्शनकारियों पर पुलिसकर्मियों पर जानलेवा हमले, हथियार छीनने या सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के आरोप हैं, उनके खिलाफ गंभीर आपराधिक मुकदमे वापस नहीं लिए जा सकते।


लूटपाट और हिंसा के आरोप

नेपाल सरकार के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, दर्ज मुकदमों में से 1,400 से अधिक लोगों पर सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और सुरक्षा बलों पर हमले के गंभीर आरोप हैं। इनमें से 53 आरोपियों के खिलाफ अदालतों में नियमित ट्रायल शुरू हो चुका है। समिति का तर्क है कि अदालत में विचाराधीन मामलों में कार्यपालिका सीधे हस्तक्षेप नहीं कर सकती।


राजनीतिक धर्मसंकट में बालेन सरकार

रेगमी समिति की सिफारिश ने बालेन सरकार को राजनीतिक संकट में डाल दिया है। ओली सरकार के पतन के बाद बनी सुशीला कार्की की अंतरिम सरकार ने प्रदर्शनकारियों के साथ समझौता किया था, जिसमें सभी मुकदमे बिना शर्त वापस लेने का आश्वासन दिया गया था। इसके बाद बालेन सरकार के गृह मंत्री सुडान गुरुंग ने भी कहा था कि सरकार इन मामलों को वापस लेने की प्रक्रिया पर काम कर रही है।


Gen-Z नेताओं का विरोध

समिति की सिफारिशों के बाद आंदोलनकारी युवाओं ने इसे सरकार का विश्वासघात बताया है। आंदोलन के प्रमुख चेहरों में से एक, सरिश्मा थापा ने मीडिया से कहा कि पुलिस ने प्रदर्शनकारियों की आवाज दबाने के लिए मनगढ़ंत धाराएं लगाई थीं। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या स्वतंत्र जांच समिति ने निष्पक्षता से जांच की या केवल पुलिस की बनाई चार्जशीट को आधार बनाया। थापा के अनुसार, 1,400 से अधिक युवाओं को कानूनी जाल में फंसाए रखना सरकार और आंदोलनकारियों के बीच हुए समझौते की भावना पर सीधा हमला है।